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    BHU में गलत तरीके से निलंबन व निष्कासन का दावा:डॉ ओम शंकर मामले की जांच करेंगे रिटायर्ड जस्टिस, BHU ने गठित की जांच समिति

    6 hours ago

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    BHU प्रशासन पर पिछले दो दशकों में शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ कथित रूप से अवैध अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का गंभीर आरोप लगाया गया है। इस संबंध में सोमवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान डॉ. ओम शंकर ने दावा किया कि RTI (सूचना के अधिकार) से प्राप्त दस्तावेजों में कई महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा हुआ है। हालांकि उनके दावों के 8 घंटे बाद बीएचयू ने अपना पक्ष रखने हुए बताया कि उनके मामले की जांच अब रिकार्ड जज देखेंगे। साथ ही उनको जांच में सहयोग करने की अपील की गई है। अब पहले जानिए ओमशंकर ने क्या कहा डॉ. ओम शंकर के अनुसार केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियम-1964 और सीसीएस (सीसीए) नियम 1965 को विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद ने कभी औपचारिक रूप से लागू नहीं किया। इसके बावजूद बीते करीब 20 वर्षों में इन्हीं नियमों के आधार पर 500 से अधिक शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ निलंबन, निष्कासन तथा अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई। हालांकि उनके दावों के उन्हाेंने कहा, आरटीआई के जरिए प्राप्त जानकारी के अनुसार इन नियमों को लागू करने से संबंधित कार्यकारी परिषद का कोई प्रस्ताव, संकल्प या विधिक संशोधन उपलब्ध नहीं है। आरोप है कि 13 जुलाई 2007 को तत्कालीन रजिस्ट्रार द्वारा जारी एक पत्र को आधार बनाकर इन नियमों को लागू दिखाया गया, जबकि इसके लिए आवश्यक प्रशासनिक और विधिक स्वीकृति नहीं ली गई थी। डॉ. ओमशंकर ने कहा कि यदि यह तथ्य सही है तो बीते दो दशकों में सैकड़ों शिक्षकों और कर्मचारियों के साथ अन्याय हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस व्यवस्था के कारण कई लोगों को अनुचित तरीके से प्रताड़ित किया गया और उनकी सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अब जानिए, क्या है BHU प्रशासन का पक्ष प्रो. ओम शंकर सिंह के प्रेस कांफ्रेंस के करीब चार घंटे बाद अपना पक्ष भी रखा। जन संपर्क कार्यालय की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार बताया गया है कि कार्डियोलॉजी विभाग में कार्यरत प्रो. ओम शंकर के खिलाफ अवज्ञा तथा विश्वविद्यालय के खिलाफ आधारहीन बयानबाज़ी के संदर्भ में जांच चल रही है। न्यायाधीश (सेवानिवृत्त), इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा प्रो. ओम शंकर के खिलाफ पहले से चल रही एक अन्य जांच समिति के भी जांच अधिकारी नियुक्त किये गए हैं। यह जांच पहले विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ आचार्य द्वारा की जा रही थी लेकिन उनके प्रतिनियुक्ति पर जाने के कारण अब नए जांच अधिकारी की नियुक्ति की गई है। ⁠प्रो. ओम शंकर से उनके विरुद्ध जारी जांच में सहयोग करने की बात कही गई है। यह भी बताया गया है कि प्रो. ओम शंकर के आचरण, नियम विरुद्ध गतिविधियों तथा विश्वविद्यालय की छवि को नुकसान पंहुचाने के कारण विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई के तहत वे 5 मार्च 2014 से 26 अगस्त 2015 तक निलंबित रहे थे। विश्वविद्यालय द्वारा गठित की गई जांच की रिपोर्ट के आधार पर विश्वविद्यालय द्वारा अप्रैल 2015 में भी उन्हें दंडित किया गया था।
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