Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    बाँके सिद्ध की गुफा में हुआ श्रीराम से साक्षात्कार:अयोध्या में आकर रम गए गोमती दास, सिद्ध संतों के सुमेरु की पुण्यतिथि आज

    1 hour ago

    1

    0

    अयोध्या के सिद्ध संतों की माला के सुमेरु आचार्य गोमती दास महाराज ने बाँके सिद्ध की गुफा में श्रीराम से साक्षात्कार किया।चित्रकूट में कठिन तप कर श्रीहनुमान का दर्शन किया।तप करते हुए संपूर्ण भारत का भ्रमण कर जब अयोध्या आएं तो यहीं पर रम गए। उप नर श्रीराम मन्दिर में वैराग्य की एक नव्यतम मूर्त्ति की निष्ठा, उसके भजन और कैंकर्य से प्रसन्न मन्दिर के सिद्ध आचार्य स्वामी तुलसीदास महाराज की कृपा जैसे छलक पड़ती है। युवक साधु ने निवेदन किया कि पूज्य आप इस दास को अंगीकार करें। भगवान श्रीराम के मन्त्रराज की दीक्षा प्रदान करके अपनी कृपा प्रदान करें। किन्तु आज्ञा होती है कि नहीं, हमारा सेवाकाल पूरा होने को है, यह शरीर अधिक रहने वाला नहीं है। तुम्हें शीघ्र ही गुरु-वियोग हो जाएगा, सो ठीक नहीं। महंत सरयू दास से ली श्रीराम मंत्र की दीक्षा तुम स्थान के महंत सरयूदास जी के चेला बनो। वे सभी प्रकार से श्रेष्ठ हैं। ऐसा ही हुआ। स्वामी सरयूदास महाराज ने दीक्षा दी और कृपापात्र को गुरु का दिया हुआ नाम मिला गोमती दास। धारा अमृतसर से सरयूतट की ओर मोड़ दी थी सरयूदास महाराज ने शिष्य को श्रीगोमती दास नाम देकर मानो उसी समय उसकी धारा अमृतसर से सरयूतट की ओर मोड़ दी थी। तीर्थाटन-देशाटन करते हुए पेशावर-लाहौर-मुल्तान-पुष्कर और प्रयाग आदि से योग-ध्यान तप एवं ज्ञान की मधुकरी करते हुए ज गोमतीदास जी बाँके सिद्ध की गुफा में जमे तो श्रीरघुवीर के अनुग्रह-विग्रह का प्रसाद पाकर ही थमे। जानकीवर शरण महाराज ने उनको अपनी परंपरा का सम्बन्ध पत्र दिया चित्रकूट से अयोध्या और श्रीहनुमत्-निवास तक की यात्रा में उनको श्रीराम के साथ उनकी जन्मस्थली की ओर मानों प्रेम के अगाध रस की ओर डुबोने वाली रही । रसिकाचार्य जानकीवर शरण महाराज ने उनको अपनी परंपरा का सम्बन्ध पत्र प्रदान किया। इसके बाद उपासना-अनुराग और अनन्यता की एक कथा घटित हुई। गोमतीदास की शिष्य-परम्परा ‘शरण’ होकर चली जबकि स्वामी रामवल्लभाशरण जी महाराज की शिष्य-परम्परा ‘दास’ होकर चली। विक्रम संवत 1988 में स्वामी श्रीगोमतीदास महाराज ने इस नश्वर शरीर का त्याग कर दिया । 95 वर्ष बाद भी आज जब उनकी पुण्यतिथि मनायी जा रही है तो दशकों बाद उसी तिथि पर नित्य धाम आए उनके उत्तराधिकारी शिष्य महान्त रघुननदशरण के साथ ही मनायी जा रही है। कोई ‘पुण्यतिथि’ मानो आमन्त्रित करती है कि वंशज अपनी पूर्वज-परम्परा की ओर देखें हनुमत निवास के वर्तमान आचार्य डॉ मिथिलेश नंदिनी शरण कहते हैं कि पीढ़ियों पहले अर्थात् हमारी कालगणना के ईसवी होने से पूर्व, विचारों के धागे से विश्वास की जो चादरें बुनी गयी थीं, उन्होंने अब तक हमें नग्नता से बचा रखा है। स्मृतियों के सीमान्त तक जो कुछ उजाला है और जिससे हम थोड़ा-बहुत देख पाते हैं, वह उजाला उनके जलने का प्रमाण है जो पूर्वज कहलाते हैं। जिनके वंशज होने से हम गर्व में रहते हैं, बहुधा उनके विषय में सोचने-समझने का ध्यान नहीं रहता। जीवन है ही ऐसा..जाने कहाँ जाने-पहुँचने को आतुर। किन्तु कोई ‘पुण्यतिथि’ मानो आमन्त्रित करती है कि वंशज अपनी पूर्वज-परम्परा की ओर देखें। उनके होने में अपने होने की चरितार्थता खोजें।
    Click here to Read more
    Prev Article
    हरियाणा में ज्वेलरी शॉप लूटने वाले बदमाश का एनकाउंटर:पैर में लगी गोली, लूट-हत्या के 11 केस दर्ज; फरीदाबाद में लूटा था ₹64 लाख का सोना
    Next Article
    लखीमपुर-खीरी की छोटी काशी गोला में चैती मेला:प्रशासन ने व्यवस्थाओं का लिया जायजा, सुरक्षा-सुविधा सुनिश्चित

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment