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    बाराबंकी के थे ईरान के सुप्रीम-लीडर खामेनेई के गुरु खुमौनी:इनके पूर्वजों ने 1830 में छोड़ दिया था गांव, खुमैनी के वंशज आज भी यहीं रहते हैं

    3 hours ago

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    ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद उत्तर प्रदेश का बाराबंकी जिला आज चर्चा में है। खामेनेई के गुरू रूहोल्लाह खुमैनी के पूर्वज बाराबंकी के पूर्वज इसी जिले के किंटूर गांव से थे। यहां के लोग दावा करते हैं कि ईरान की 1979 की इस्लामी क्रांति में इस गांव के वंशजों की भागीदारी रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बाराबंकी के लोग ईरान की धार्मिक यात्रा पर नवाबों के साथ शामिल थे। ईरान में इस्लामिक क्रांति के प्रमुख चेहरों में से रूहोल्लाह खुमैनी के दादा सैयद अहमद मुसावी, 18वीं-19वीं शताब्दी के दौरान बाराबंकी के इसी किंतूर गांव में रहते थे। खामेनेई की मौत के बाद गांव में रह रहे उनके गुरू रूहोल्लाह खुमैनी के वंशज सैय्यद निहाल मियां ने इसे 'बहुत दुखद' बताया। कहा कि खामेनेई का सरोकार मजहब-मिल्लत से ऊपर उठकर केवल इंसानियत से था। वहीं, डॉ. रेहान काजमी ने इजरायली हमले में अयातुल्लाह खामेनेई की मौत को 'शहादत' बताते हुए गम का माहौल बताया। उन्होंने इसे ऐसी क्षति करार दिया जिसकी भरपाई असंभव है, क्योंकि उन्होंने पूरी दुनिया को इंसानियत का पैगाम दिया था। कैसे हुई खामेनेई की शुरुआत खामेनेई के गुरु रूहोल्लाह खुमैनी के दादा सैयद अहमद मुसावी का जन्म 1800 के दशक की शुरुआत में किंटूर में हुआ था। पढ़ाई-लिखाई पूरी करने के बाद 1830 में सैयद अहमद मुसावी ब्रिटिश भारत से इराक के नजफ शहर धार्मिक यात्रा पर निकले। नजफ में उन्होंने शिया धर्म और इल्म अर्जित किया और वहां से ईरान के खुमैन शहर पहुंच गए। अहमद मुसावी ने अपनी हिंदुस्तानी पहचान को कायम रखने के लिए अपने नाम के आगे ‘हिंदी’ जोड़ा। उनके पूर्वजों का यह उपनाम आज भी इतिहास में दर्ज है। उन्होंने ईरान में बड़ा घर खरीदा और शादी की। उनकी पत्नी सकीनेह थीं, जिनके साथ तीन बेटियां और एक बेटा हुआ। उनका बेटा सैयद मुस्तफा बाद में रुहोल्लाह खुमैनी के पूर्वज बने। ईरान में स्थायी बसावट और धार्मिक योगदान सैयद अहमद मुसावी का मशहद में जाना ईरानी धार्मिक समाज में खामेनेई परिवार के उठान की शुरुआत था। मुसावी परिवार शिया इस्लाम के सातवें इमाम, इमाम मूसा अल-काज़िम, के वंशज थे और पारंपरिक रूप से धार्मिक नेतृत्व के लिए सम्मानित थे। 1869 में कर्बला में सैयद अहमद मुसावी का निधन हो गया। उनके विचार और शिक्षा उनके वंशजों को आगे की राह दिखाते रहे। उनके पोते रूहोल्लाह खुमैनी ने 1979 में ईरान की क्रांति का नेतृत्व किया, जिसने शाह की सत्ता को समाप्त कर दिया और ईरान को इस्लामी गणराज्य बनाया। 1979 की ईरानी क्रांति और खुमैनी 1979 में रुहोल्लाह खुमैनी की वापसी ने ईरान में क्रांति की आग भड़काई। शाह की सत्ता खत्म हुई और ईरान एक इस्लामिक गणराज्य बन गया। खुमैनी सुप्रीम लीडर बने और उनके विचारों ने न केवल ईरान, बल्कि पूरी दुनिया में शिया इस्लाम की गूंज को और तेज किया। अयातुल्ला अली खामेनेई का उदय ईरान में खुमैनी की क्रांति के दौरान अयातुल्ला अली खामेनेई उभरे। उनका जन्म 17 जुलाई 1939 को मशहद में हुआ। खामेनेई ने खुमैनी के विचारों से प्रेरित होकर क्रांति में भाग लिया और उनके करीबी सहयोगी बने। 1989 में खुमैनी की मृत्यु के बाद अली खामेनेई को सुप्रीम लीडर चुना गया। भले ही खामेनेई का भारत से कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन उनके गुरु खुमैनी के पूर्वज भारत से ईरान गए थे। किंटूर गांव का ऐतिहासिक महत्व बाराबंकी जिले का किंटूर गांव छोटा सा है, लेकिन इसका किरदार ईरान के इतिहास में बड़ा है। यहां से सैयद अहमद मुसावी ने खुमैन तक का सफर तय किया और उनकी शिक्षा व विचारधारा ने वंशजों को आगे बढ़ाया। आज भी गांव के लोग ईरान के समर्थन में खड़े हैं और इजरायल के खिलाफ अपनी राय रखते हैं। किंटूर के कुछ शिया परिवार जैसे काजमी परिवार आज भी अपने पूर्वजों के ईरान से संबंध को याद रखते हैं। 70 वर्षीय सैयद निहाल काजमी का कहना है कि उनके परदादा मुफ्ती मोहम्मद कुली मुसावी और सैयद अहमद मुसावी चचेरे भाई थे। -------------------------------------------------- ये खबर भी पढ़ेंः- अमेरिका-इजराइल हमले में ईरानी सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत:बेटी-दामाद, बहू-पोती भी मारी गईं; ईरान की सेना बोली- थोड़ी देर में सबसे खतरनाक हमला करेंगे अमेरिका-इजराइल के हमले में ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है। ईरान की मीडिया तसनीम और फार्स समाचार एजेंसियों ने इसकी पुष्टि की है। हमले में खामेनेई की बेटी, दामाद, पोती और बहू भी मारे गए हैं। ईरान में 40 दिन का राजकीय शोक और सात दिनों की सार्वजनिक छुट्टियों की घोषणा की गई है। पढ़ें पूरी खबर…
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