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    बिस्मिल्लाह खां की 20वीं पुण्यतिथि आज:मकबरे पर कुरानख्वानी के बाद पढ़ा गया फातेहा, शहनाई बजाकर दी श्रद्धाजंलि

    3 hours ago

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    भारत रत्न और शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की 20वीं पुण्यतिथि पर शुक्रवार को वाराणसी के दरगाह फातमान स्थित उनके मकबरे पर श्रद्धांजलि सभा हुई। परिजनों ने सबसे पहले कुरानख्वानी की और इसके बाद फातेहा पढ़ा। उस्ताद के चाहने वालों और संगीत प्रेमियों ने भी मकबरे पर पहुंचकर पुष्प अर्पित किए और उन्हें याद किया। इस मौके पर उनके प्रपौत्र आफाक हैदर और उनके साथियों ने शहनाई पर श्रद्धांजलि पेश की। उस्ताद की याद में शहनाई पर नौहा ‘मारा गया है तीर से बच्चा रबाब का’ बजाया गया। शहनाई की धुन सुनकर वहां मौजूद कई लोग भावुक हो गए। इसके बाद मकबरे पर पुष्प अर्पित कर उस्ताद को नमन किया गया। देखिए तस्वीरें… मकबरे पर शहनाई से दी श्रद्धांजलि उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की पुण्यतिथि पर सुबह से ही दरगाह फातमान स्थित उनके मकबरे पर परिजनों और संगीत प्रेमियों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। परिवार के लोगों ने कब्र पर कुरानख्वानी की और फातेहा पढ़ा। इसके बाद उस्ताद के प्रपौत्र आफाक हैदर ने साथियों के साथ शहनाई बजाकर उन्हें याद किया। शहनाई की धुनों के जरिए उस्ताद को श्रद्धांजलि दी गई। इस दौरान उनके चाहने वालों ने मकबरे पर फूल चढ़ाए। ‘दादा हुजूर रोज बालाजी मंदिर के पास करते थे रियाज’ आफाक हैदर ने बताया कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का काशी से गहरा लगाव था। वह रोज गंगा स्नान करने के बाद बालाजी मंदिर के पास बैठकर शहनाई का रियाज किया करते थे। उन्होंने बताया कि जब तक उस्ताद स्वस्थ रहे, बालाजी मंदिर के पास उनका रियाज जारी रहा। आफाक के मुताबिक, उस्ताद को दूसरे देशों की ओर से वहां की नागरिकता लेने के प्रस्ताव भी मिले थे, लेकिन उनका भारत और काशी से ऐसा जुड़ाव था कि उन्होंने देश छोड़ना स्वीकार नहीं किया। सेना के सम्मान के साथ दरगाह फातमान में दफन हुए थे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का 21 अगस्त 2006 को लंबी बीमारी के बाद निधन हुआ था। निधन के बाद उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। सेना के सम्मान के साथ उन्हें वाराणसी की दरगाह फातमान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया था। उस्ताद की शहनाई ने भारतीय संगीत को दुनियाभर में पहचान दिलाई। उनकी पुण्यतिथि पर हर साल संगीत प्रेमी और उनके चाहने वाले उन्हें श्रद्धांजलि देने मकबरे पर पहुंचते हैं। इस बार भी शहनाई की धुनों और दुआओं के बीच उन्हें याद किया गया।
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