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    CSJMU के फाइन आर्ट्स में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आगाज:भारतीय कला की निरंतरता और वैश्विक पहचान पर मंथन

    2 hours ago

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    छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) के इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स में शुक्रवार को दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 'भारतीय कला में विविधता, निरंतरता और वैश्विक परिप्रेक्ष्य' का भव्य शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी और सुप्रसिद्ध चित्रकार सुहास बहुलकर ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय कला महज सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना और जीवन पद्धति का प्रतिबिंब है। आधुनिकता के साथ लोक कलाओं का समन्वय जरूरी प्रति कुलपति प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि आज के भारतीय कलाकार अपनी आत्मचेतना को जागृत कर रहे हैं। वे लोक और पारंपरिक कलाओं को आधुनिक स्वरूप में ढालकर नए आयाम स्थापित कर रहे हैं। उन्होंने गर्व के साथ साझा किया कि फाइन आर्ट्स विभाग से निकले कलाकार आज पूरी दुनिया में विश्वविद्यालय का गौरव बढ़ा रहे हैं। वहीं, मुख्य अतिथि सुहास बहुलकर ने भारतीय कला की प्राचीनता और उसकी अटूट परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कलाकारों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि 'चित्रकूट में राम दर्शन' केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि कला की वह पाठशाला है जिसे हर कलाकार को देखना चाहिए और उससे प्रेरणा लेनी चाहिए। प्राचीन शैलचित्रों से वैश्विक पहचान तक का सफर बीजवक्ता प्रो. शांति स्वरूप सिन्हा ने कला के ऐतिहासिक सफर को रेखांकित किया। उन्होंने प्रागैतिहासिक शैलचित्रों से लेकर अजंता की गुफाओं के भित्ति चित्रों और चोलकालीन शिव तांडव मूर्तियों का उदाहरण देते हुए बताया कि भारतीय कला की निरंतरता ही आज उसे वैश्विक स्तर पर विशिष्ट पहचान दिला रही है। इसी क्रम में मुख्य वक्ता डॉ. अवधेश मिश्र ने कहा कि कला का स्वभाव निरंतर बहना है। समकालीन कलाकार अपनी स्वतंत्र शैली के माध्यम से ज्ञान के आदान-प्रदान को और अधिक सशक्त बना रहे हैं, जिससे कला के बदलते स्वरूप को समझा जा सकता है। तकनीक और परंपरा के संगम पर जोर बीएचयू के प्रो. मनीष अरोड़ा ने कला के भविष्य पर चर्चा करते हुए कहा कि पारंपरिक कलाओं को वर्तमान तकनीक से जोड़ना समय की मांग है। इससे कला विधाएं समाज के हर वर्ग तक आसानी से पहुंच सकेंगी। चित्रकूट से आए डॉ. जयशंकर मिश्रा ने लोक कलाओं को जनमानस के उल्लास का प्रतीक बताया। इससे पूर्व, संस्थान के निदेशक डॉ. मिठाई लाल ने अतिथियों का स्वागत किया। अंत में डॉ. मंतोष यादव ने आभार व्यक्त किया। उद्घाटन के बाद दो शोध सत्र आयोजित हुए। बताया गया कि 28 फरवरी को ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से आठ अलग-अलग सत्रों में शोध पत्रों का वाचन किया जाएगा। कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रो. शुभम शिवा, डॉ. राज कुमार त्रिपाठी, तनीषा वधावन और जे.बी. यादव समेत पूरी टीम का विशेष सहयोग रहा।
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