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    डॉ. मोहन भागवत बोले- शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवसाय नहीं:धूल का एक कण भी धर्म से अलग नहीं हो सकता, लखनऊ में छात्रों से संवाद किया

    6 hours ago

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    लखनऊ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा- शिक्षा और स्वास्थ्य मूलभूत आवश्यकताएं हैं, इन्हें व्यवसाय नहीं बनाया जा सकता। दोनों क्षेत्र समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुलभ होने चाहिए। पश्चिमी देशों ने भारत की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को हटाकर अपनी प्रणाली थोपी, ताकि उन्हें “काले अंग्रेज” तैयार करने में सुविधा हो। अंग्रेजों ने जो बिगाड़ा, उसे सुधारने की आवश्यकता है। उन्होंने शोधार्थियों से आह्वान किया कि वे भारत को समझने के लिए अपने ज्ञान और शोध को प्रामाणिकता के साथ आगे बढ़ाएं। अज्ञानता के आधार पर भारत को नहीं समझा जा सकता। भागवत बुधवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में शोधार्थी संवाद कार्यक्रम में छात्रों को संबोधित कर रहे थे। 2 तस्वीरें देखिए… मोहन भागवत की 5 बड़ी बातें… 1. संघ का लक्ष्य- परम वैभव सम्पन्न भारत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य भारत को परम वैभव सम्पन्न बनाना है। “मैं और मेरा परिवार” तक सीमित सोच से ऊपर उठकर पूरे राष्ट्र के लिए सोचना होगा। संघ समाज की एकता और गुणवत्ता की चिंता करता है। संघ को समझना है तो उसके कार्य को अनुभव करना होगा। केवल पढ़कर उसे नहीं समझा जा सकता। संघ किसी के विरोध में नहीं है। उसे लोकप्रियता या शक्ति की लालसा नहीं है। 2. शोध की भूमिका पर दिया जोर: भारत की दिशा और दशा बदलने में शोध की महत्वपूर्ण भूमिका है। सत्यपरक और प्रामाणिक शोध समाज के सामने आना चाहिए। शोधार्थी उत्कृष्टता, निष्ठा और निःस्वार्थ भाव से राष्ट्रहित में कार्य करें। संघ को लेकर कई प्रकार के दुष्प्रचार होते हैं, ऐसे में शोधार्थियों की जिम्मेदारी है कि वे तथ्य आधारित अध्ययन प्रस्तुत करें। 3.वैश्वीकरण बनाम बाजारीकरण: वैश्वीकरण बाजारीकरण तक सीमित हो गया है, जो खतरनाक है। भारत “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना में विश्वास करता है, जहां पूरा विश्व एक परिवार है। जब तक सभी सुखी नहीं होंगे, तब तक कोई भी व्यक्ति वास्तव में सुखी नहीं हो सकता। जीवन उपभोगवादी नहीं, बल्कि संयम और त्याग पर आधारित होना चाहिए। भारत के पास वैश्विक समस्याओं के समाधान मौजूद हैं, लेकिन विश्वगुरु बनने के लिए सभी क्षेत्रों में शक्तिशाली बनना आवश्यक है। 4. धर्म और आचरण की व्याख्या की: धर्म का स्वरूप शाश्वत है। सृष्टि जिन नियमों से संचालित होती है। वही धर्म है। धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि धूल का एक कण भी धर्म से अलग नहीं हो सकता। आचरण देश और काल के अनुसार बदल सकता है, लेकिन धर्म का मूल स्वरूप स्थायी रहता है। धर्म हमें सबके साथ मिलकर जीना सिखाता है। 5.पर्यावरण संरक्षण का संदेश: पेड़ लगाना, जल संरक्षण करना और एकल उपयोग प्लास्टिक से बचना जैसे छोटे कदम भी बड़ा योगदान दे सकते हैं। उन्होंने आधुनिक तकनीक का उपयोग पर्यावरण संरक्षण के लिए करने की अपील की और कहा कि प्रकृति के प्रति मित्र भाव रखना ही भारतीय संस्कृति का मूल है।
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