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    डिग्री से पहले 'जिंदगी' बचाना जरूरी:IIT में सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ शुरू, 10 काउंसलर्स 24 घंटे तैनात; ईमेल पर भी दे सकेंगे जानकारी

    11 hours ago

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    देश के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में शुमार आईआईटी कानपुर इन दिनों एक बड़ी समस्या से जूझ रहा है और वह है मानसिक दबाव और बढ़ती आत्महत्याएं। पिछले ढाई साल में कैंपस के भीतर 10 होनहारों का जिंदगी को गले लगाने के बजाय मौत को चुनना न केवल प्रशासन बल्कि केंद्र सरकार के लिए भी चिंता का विषय बन गया है। इस 'डेथ वेव' को थामने के लिए संस्थान ने अब अपनी रणनीति बदल दी है। अब डॉक्टर छात्रों के आने का इंतजार नहीं करेंगे, बल्कि 'सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ एंड वेलबीइंग' के जरिए छात्र खुद ओपन फोरम पर अपनी बात बेझिझक रख सकेंगे। वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. आलोक बाजपेई का मानना है,कि आईआईटी कोई अलग द्वीप नहीं है, यह इसी समाज का हिस्सा है। जहां पिछले कुछ दशकों में सूचनाओं का अंबार, बेतहाशा पैसा और आसमान छूती महत्वाकांक्षाओं ने एक 'क्योस' पैदा कर दिया है। आज के दौर में जिसे हम मानसिक बीमारी कह रहे हैं, दरअसल वह 'जीवन जीने का संघर्ष' है। बुद्ध और गांधी के समय भी संघर्ष था, लेकिन तब लोगों में बर्दाश्त करने की क्षमता और रेजिलिएंस (लड़ने की शक्ति) सिखाई जाती थी। आज हमारा एजुकेशन सिस्टम बच्चों को सिर्फ पैकेज और सफलता के अरमान दे रहा है, लेकिन जिंदगी जीना नहीं सिखा रहा। 4 साल कोचिंग की भट्टी में खुद को झोंकने के बाद जब छात्र यहां आते हैं, तो उन पर परिवार की उम्मीदों और खुद को साबित करने का इतना बोझ होता है कि वे अपनी भावनाएं व्यक्त करना ही भूल जाते हैं। सिर्फ एकेडमिक प्रेशर ही एकमात्र वजह नहीं कैंपस में बढ़ती घटनाओं के बाद अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या पढ़ाई का बोझ जान ले रहा है? इस पर विशेषज्ञों का कहना है कि एकेडमिक प्रेशर सभी के लिए एक समान है और बहुसंख्यक छात्र इसमें अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। असल समस्या सपोर्ट सिस्टम की कमी और छात्रों का 'एक्सप्रेसिव' न होना है। कई छात्र अपने व्यक्तिगत कारणों, परवरिश के दौरान बनी मानसिक स्थितियों या अकेलेपन के कारण टूट जाते हैं। इसी को देखते हुए अब संस्थान ने हॉस्टल्स में जाकर छात्रों से संवाद करने की योजना बनाई है। यदि छात्र सेंटर तक नहीं आ पा रहे, तो मनोवैज्ञानिक खुद उनके कमरों के पास पहुंचकर उनसे बात करेंगे। विभागवार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं ताकि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लगी 'कलंक' की मुहर को हटाया जा सके। खुल गया है वेलबीइंग सेंटर, 24 घंटे तैनात हैं 10 काउंसलर्स वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. आलोक बाजपेई ने बताया कि,संस्थान ने 1 दिसंबर से 'सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ एंड वेलबीइंग' को विस्तार दिया है। अब यहां सिर्फ छात्र ही नहीं, बल्कि फैकल्टी और कर्मचारी भी काउंसिलिंग करा सकते हैं। वर्तमान में 10 प्रोफेशनल काउंसलर्स की टीम 24 घंटे सेवा में मुस्तैद है। छात्र अपनी बात ई-मेल के जरिए भी साझा कर सकते हैं। 7 फरवरी को आयोजित पहले ओपन फोरम में करीब 100 छात्रों की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया है कि युवा अब बात करना चाहते हैं। डॉ. बाजपेई के अनुसार, पिछले दो महीनों में इस सक्रियता की वजह से कई छात्र समय रहते मदद के लिए आगे आए हैं, जिससे संभावित हादसों को टालने में मदद मिली है। इंसानियत और सहानुभूति ही सबसे बड़ी दवा वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. आलोक बाजपेई कने बताया कि,हर व्यक्ति के पीछे एक मनोचिकित्सक खड़ा नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह निजता का उल्लंघन होगा। असली बदलाव तब आएगा जब छात्र एक-दूसरे का सहारा बनेंगे। अगर कोई साथी रो रहा है या परेशान है, तो उसकी मदद करना एक बुनियादी मानवीय गुण है, इसके लिए किसी मेडिकल डिग्री की जरूरत नहीं है। जीवन में करियर और सफलता से पहले एक अच्छा इंसान बनना जरूरी है। कैंपस के माहौल को बेहतर बनाने के लिए अब सहानुभूति (Empathy) को ही मुख्य हथियार बनाया जा रहा है ताकि मेधावी छात्र अपनी चमक बिखेरने से पहले खामोश न हो जाएं। ढाई साल में कैंपस ने खोए ये 10 लोग आईआईटी कानपुर में सुसाइड की घटनाओं ने पूरे देश को चौंकाया है। सिलसिलेवार तरीके से देखें तो पिछले कुछ महीनों में मौतों का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। 19 दिसंबर 2023 को स्टाफ डॉ. पल्ल्वी चिल्का की मौत से शुरू हुआ यह सिलसिला थमा नहीं। इसके बाद 10 और 18 जनवरी 2024 को विकास मीणा (M.Tech) और प्रियंका जायसवाल (PhD) ने दम तोड़ा। अक्टूबर 2024 में प्रगति और फरवरी 2025 में अंकित यादव जैसे शोधार्थियों की मौत ने रिसर्च के दबाव पर सवाल उठाए। अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच सॉफ्टवेयर डेवलपर दीपक चौधरी, बीटेक छात्र धीरज सैनी और जय सिंह मीना ने भी मौत को गले लगा लिया। साल 2026 की शुरुआत भी दुखद रही। जहां 21 जनवरी को ईशराम और हाल ही में 14 फरवरी को एक जूनियर टेक्नीशियन की जान चली गई।
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