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    गले में दर्द और बुखार को न समझें सामान्य:रिफ्रेशर कोर्स में डॉक्टर बोले- लापरवाही से बच्चों में बढ़ रहा 'रूमेटिक हार्ट डिजीज' का खतरा

    3 hours ago

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    बच्चों में अक्सर होने वाले गले के संक्रमण, बुखार और जोड़ों के दर्द को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह 'रूमेटिक फीवर' के लक्षण हो सकते हैं, जो आगे चलकर बच्चों के हृदय वाल्व को नुकसान पहुंचाकर उन्हें कम उम्र में ही रूमेटिक हार्ट डिजीज का मरीज बना सकता है। शहर में आयोजित इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के 43वें रिफ्रेशर कोर्स में देश भर के नामचीन डॉक्टरों ने बदलती बीमारियों और नई तकनीकों पर अपनी बात रखी। गले का बैक्टीरिया सीधे दिल पर करता है वार वाल्व डिजीज विशेषज्ञ डॉ. जेड. एस. मेहरवाल ने आगाह किया कि स्ट्रेप्टोकोकल नामक बैक्टीरिया के संक्रमण से होने वाला बुखार बच्चों के दिल के लिए बेहद घातक है। लगातार सूजन के कारण दिल के वाल्व संकुचित हो जाते हैं, जिससे छोटी उम्र में ही हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। भारत में यह समस्या घने और गंदगी वाले क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों में अधिक देखी जाती है। समय रहते कल्चर जांच और डॉक्टरी सलाह लेकर इस खतरे से बचा जा सकता है। बच्चों में मोबाइल बना रहा 'मोटापा महामारी' रिफ्रेशर कोर्स के दौरान मोटापे पर चिंता जताते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि कोरोना के बाद देश में मोटापा एक महामारी की तरह उभरा है। डॉ. मनीष खेतान के अनुसार, इसकी सबसे बड़ी वजह बच्चों की मोबाइल से बढ़ती दोस्ती है। मोबाइल के अधिक प्रयोग से शारीरिक गतिविधि पूरी तरह खत्म हो गई है और बच्चे किसी भी समय ऑनलाइन जंक फूड मंगवाकर खा रहे हैं। 25 से ज्यादा बीएमआई के साथ ही यदि पुरुष की कमर 102 सेमी और महिला की कमर 88 सेमी से अधिक है, तो इसे गंभीर मोटापा माना जाता है। इसके कारण शरीर में बीपी, शुगर, कोलेस्ट्रॉल और कैंसर सहित 239 प्रकार की बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। डिजिटल घड़ी से होगी दिल की निगरानी हृदय रोगियों के लिए अब नई तकनीक राहत बनकर आई है। डॉ. विवेका कुमार ने शहर में 'कार्डियक केयर मॉडल' की शुरुआत करने की घोषणा की। इसके तहत एक खास डिजिटल डिवाइस की मदद से अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी हृदय रोगियों की निगरानी बेहतर तरीके से हो सकेगी। इस डिवाइस को हाथ में घड़ी की तरह बांधा जा सकेगा, जो लगातार मरीज के दिल का हाल अपडेट करती रहेगी। पैर में सुन्नपन और आंखों की जांच जरूरी प्रयागराज से आए डॉ. मनीष टंडन ने बताया कि 34 सप्ताह से पहले जन्मे या दो किलो से कम वजन वाले बच्चों की आंखों की जांच अनिवार्य रूप से करानी चाहिए, ताकि उन्हें दृष्टि हानि से बचाया जा सके। वहीं, डॉ. विकास कक्कड़ ने आगाह किया कि अगर पैरों में लगातार सुन्नपन या चीटियां रेंगने जैसा महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज न करें। यह 'डायबिटिक फुट' की शुरुआत हो सकती है। इसके अलावा, नेत्र रोगों की नई तकनीकों पर चर्चा के लिए आज शहर में 'कनिकाकान' का आयोजन भी किया जा रहा है, जिसमें एम्स दिल्ली सहित देशभर के विशेषज्ञ जुटेंगे।
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