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    हाईकोर्ट ने बरेली SSP को पहले फटकारा फिर खेद जताया:याचिकाकर्ता पर 50 हजार जुर्माना, बंदी प्रत्यक्षीकरण की दूसरी याचिका में पहली याचिका छिपाने का मामला

    2 hours ago

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    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली के एसएसपी अनुराग आर्य के प्रति पहले की गई सख्त मौखिक टिप्पणियों पर खेद जताया है। कोर्ट को बाद में पता चला कि याचिकाकर्ता ने उसी घटनाक्रम से जुड़ी अपनी पुरानी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की जानकारी छिपाई थी। कोर्ट ने कहा कि यदि यह तथ्य शुरुआत में सामने आ जाता तो एसएसपी के प्रति ऐसी सख्ती नहीं दिखाई जाती। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने ओमेंद्र यादव की ओर से दाखिल दोनों बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं खारिज कर दीं। साथ ही याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया। उसे एक महीने के भीतर यह रकम बरेली के एसएसपी को देने का निर्देश दिया गया है। हर याचिका पर 25 हजार का जुर्माना कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ने साफ नीयत से अदालत का रुख नहीं किया और जरूरी तथ्य छिपाकर गलत जानकारी पेश की। दोनों याचिकाओं पर 25-25 हजार रुपए, कुल 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया है। निर्धारित समय में रकम जमा नहीं करने पर इसे भू-राजस्व के बकाए की तरह वसूल कर एसएसपी को भुगतान किया जाएगा। एसएसपी के हलफनामे पर उठाए थे सवाल मामले में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि बरेली पुलिस ने उसे 8 से 13 मई 2026 तक अवैध हिरासत में रखा और 13 मई को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया। उसने कथित हिरासत की पुष्टि के लिए थाने की सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराने की मांग की थी। राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि भारी बारिश और तूफान के कारण शॉर्ट सर्किट हुआ, जिससे सीसीटीवी सिस्टम और डीवीआर खराब हो गए। 26 मई को समकक्ष पीठ ने एसएसपी को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह बताने का निर्देश दिया था कि कैमरे कैसे बंद हुए और इसकी जानकारी उन्हें कब मिली। एसएसपी ने हलफनामा दाखिल कर 8 से 13 मई के बीच की फुटेज उपलब्ध नहीं होने का कारण बताया। 27 अक्टूबर को कोर्ट ने स्पष्टीकरण पर सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि हलफनामे में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि तूफान से थाने के अंदर लगे कैमरे कैसे प्रभावित हुए। साथ ही, 13 से 15 मई के बीच हुए नुकसान से पहले के दिनों की रिकॉर्डिंग कैसे प्रभावित हुई, इसका भी संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की थी कि एसएसपी ने झूठा हलफनामा दाखिल किया हो सकता है। इसके बाद उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होकर सवालों का जवाब देने का निर्देश दिया गया था। दूसरी याचिका में पहली का जिक्र नहीं किया 30 अक्टूबर के आदेश में पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता ने 26 मई को दूसरी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी, जबकि पहली याचिका में राज्य सरकार 18 मई को जवाबी हलफनामा दाखिल कर चुकी थी। इसके बावजूद दूसरी याचिका में पहले की याचिका का कोई उल्लेख नहीं किया गया। कोर्ट के मुताबिक, दूसरी याचिका में 13 मई के रिमांड आदेश के बाद हिरासत में रखे जाने का हवाला देकर रिहाई मांगी गई थी। पहली याचिका में कथित अवैध हिरासत की तारीख, स्थान और समय के बारे में भी स्पष्ट दावा नहीं किया गया था। याचिकाकर्ता के वकील ऐसी कोई विशिष्ट दलील नहीं बता सके, जिससे कथित अवैध हिरासत की अवधि स्थापित हो सके। पीठ ने कहा कि दूसरी याचिका के जरिए पहली याचिका की कमियों को दूर करने की कोशिश की गई, लेकिन पहले से याचिका दाखिल होने का तथ्य छिपा लिया गया। कोर्ट बोला- एसएसपी के प्रति सख्ती अनुचित थी खंडपीठ ने कहा कि यदि सरकारी वकील के कार्यालय ने शुरुआत में ही पुरानी याचिका और तथ्य छिपाने की जानकारी दे दी होती तो एसएसपी को अदालत की नाराजगी का सामना नहीं करना पड़ता। कोर्ट ने एसएसपी के प्रति की गई मौखिक सख्ती पर ईमानदारी से खेद जताया। पीठ ने कहा कि एसएसपी को ऐसी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा, जो उचित नहीं थीं। इसके लिए याचिकाकर्ता के साथ सरकारी अधिवक्ता का कार्यालय भी जिम्मेदार है, क्योंकि उसे शुरुआत में ही अदालत को पूरी स्थिति से अवगत कराना चाहिए था। अंत में कोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए कुल 50 हजार रुपए का जुर्माना एसएसपी को देने का आदेश दिया।
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