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    हिमाचल विधानसभा में गूंजा एप्पल इम्पोर्ट ड्यूटी का मामला:राठौर बोले- 1.50 लाख परिवारों की रोजी पर संकट, अमेरिका से तुलना गलत

    14 hours ago

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    हिमाचल प्रदेश की एप्पल इंडस्ट्री पर इम्पोर्ट ड्यूटी कम करने से मंडरा रहे संकट का मामला आज विधानसभा में गूंजा। ठियोग से विधायक कुलदीप राठौर ने प्राइवेट मेंबर डे पर इम्पोर्ट ड्यूटी में कटौती का विरोध किया। सदन में लंबी चर्चा के बाद यह संकल्प पारित हो गया और इसे केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। कुलदीप राठौर ने कहा कि ट्रेड डील के कारण राज्य के 1.50 लाख से ज्यादा परिवारों की रोजी-रोटी छिन जाएगी। अमेरिका के साथ प्रस्तावित बाइलेटरल ट्रेड एग्रीमेंट को एक डिप्लोमैटिक और आर्थिक कामयाबी के तौर पर पेश किया जा रहा है। मगर भारत के छोटे सेब किसानों के लिए, यह बहुत बुरा साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि हिमाचल की GDPमें सेब का ₹5,000 करोड़ से ज्यादा का योगदान रहता है। राज्य में सेब उगाने वाले के एक किसान के पास औसतन 1 से 2 एकड़ जमीन होती है। ये छोटे, परिवार द्वारा चलाए जाने वाले बाग हैं जो पूरी तरह से मौसमी इनकम पर निर्भर हैं। वहीं अमेरिका के वाशिंगटन राज्य में सेब के बाग का औसत साइज लगभग 100 एकड़ है। ऐसे में हिमाचल के बागवान अमेरिकी सेब से कैसे कंपीटिशन कर पाएंगे। अमेरिका में सेब हाई-डेंसिटी क्लोनल रूट स्टॉक पर उगाए जाते हैं, जिससे प्रति हेक्टेयर 50 से 80 टन पैदावार होती है,जबकि प्रदेश में ज्यादातर बाग अभी भी पारंपरिक सीडलिंग रूट-स्टॉक पर निर्भर हैं, जिससे प्रति हेक्टेयर मुश्किल से 6 से 7 टन पैदावार होती है। केंद्र ने इन देशों के सेब पर आयात शुल्क घटाया दरअसल, केंद्र सरकार ने अमेरिका और न्यूजीलैंड के सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत और यूरोपीय यूनियन (EU) के लिए 20 प्रतिशत कर दी है। इम्पोर्ट ड्यूटी कम होने से अब विदेशी सेब सस्ते दामों पर भारतीय बाजार में उपलब्ध होगा। इससे हिमाचल के साथ साथ जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड के सेब उद्योग पर भी संकट खड़ा हो गया है। हिमाचल का प्रीमियम सेब बुरी तरह होगा प्रभावित कुलदीप राठौर ने बताया कि वाशिंगटन एप्पल के भारतीय बाजार में आने से हिमाचल का प्रीमियम सेब बुरी तरह प्रभावित होगा। इससे न केवल प्रीमियम सेब के दाम गिरेंगे, बल्कि कोल्ड स्टोर में रखे सेब पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा। अभी अमेरिका-न्यूजीलैंड और EU के लिए इम्पोर्ट ड्यूटी घटाई गई गई है। अब इनकी आड़ में दूसरे देश भी इम्पोर्ट ड्यूटी कम करने का दबाव डालेंगे। हिमाचल के बागवान सचिवालय का घेराव कर चुके बता दें कि हिमाचल के बागवान इस फैसले के खिलाफ दो महीने पहले सचिवालय के बाहर प्रदर्शन कर चुके हैं। बागवानों का आरोप है कि केंद्र सरकार आयात शुल्क बढ़ाने के बजाय चरणबद्ध तरीके से अलग-अलग देशों के लिए इसे कम कर रही है, जिससे उनकी आजीविका पर संकट गहराता जा रहा है। इस वजह से बागवान ज्यादा चिंतित बागवानों की चिंता की एक बड़ी वजह उत्पादन लागत और उत्पादकता में अंतर भी है। हिमाचल में प्रति हेक्टेयर 7 से 8 मीट्रिक टन सेब उत्पादन होता है, जबकि अमेरिका, न्यूजीलैंड और चीन जैसे देशों में यह 60 से 70 मीट्रिक टन तक पहुंच जाता है। वहीं, हिमाचल में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण प्रति किलो सेब उत्पादन की लागत करीब 27 रुपए आती है। ऐसे में बागवानों को लाभ तभी मिल पाता है, जब उनका सेब कम से कम 50 से 100 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बिके। अन्य देश भी भारत पर आयात शुल्क कम करने का बनाएंगे दबाव विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका, न्यूजीलैंड और EU को दी गई रियायतों के बाद अब अन्य देश भी भारत पर आयात शुल्क कम करने का दबाव बना सकते हैं। इससे भारतीय बाजार में विदेशी सेब की हिस्सेदारी बढ़ेगी और स्थानीय उत्पादकों के लिए प्रतिस्पर्धा और कठिन हो जाएगी। ‌BJP ने कांग्रेस पर निशाना साधा भाजपा विधायक डॉ. जनक राज ने कहा कि प्रदेश के सेब बागवानों को डराने और गुमराह करने के लिए कांग्रेस पार्टी पूरी तरह झूठ पर आधारित राजनीति कर रही है। उन्होंने कहा कि FTA को लेकर कांग्रेस जिस प्रकार की बयानबाजी कर रही है, उसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। डॉ. जनक ने कहा कि भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा सेब आयातक है और 2024-25 में लगभग 5.57 लाख मीट्रिक टन सेब का आयात हुआ, जो घरेलू उत्पादन का करीब 21.9% है। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने ऐसी नीतियां बनाई हैं जिससे हिमाचल के सेब उत्पादकों के हित पूरी तरह सुरक्षित रहें। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूरोपियन यूनियन (EU) के साथ हुए समझौते में सेब आयात के लिए सीमित कोटा (TRQ) रखा गया है, जो मौजूदा आयात से भी कम है और इसे 10 वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा। साथ ही न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) ₹80 प्रति किलो निर्धारित किया गया है, जिससे सस्ते विदेशी सेब भारतीय बाजार में प्रवेश नहीं कर पाएंगे।
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