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    'हीमोफीलिया के इलाज में नॉन फैक्टर थेरेपी ज्यादा असरदार':एक्सपर्ट बोले- इंसुलिन की तर्ज पर शरीर में इंजेक्ट होगी दवा, कॉन्क्लेव में जुटे कई विशेषज्ञ

    1 hour ago

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    हीमोफीलिया मरीजों का इलाज फैक्टर थेरेपी से होता था। इसमें शरीर में खून का थक्का बनाने वाले क्लॉटिंग फैक्टर की कमी को फैक्टर थेरेपी के जरिए दूर किया जाता था। इस थेरेपी के बावजूद मरीजों में ब्लीडिंग के समस्या सामने आ जाती थी। ऐसे में अब नॉन फैक्टर थेरेपी पर फोकस ज्यादा है। इस थेरेपी को शुगर के मरीजों में दी जाने वाली इन्सुलिन की तर्ज पर बॉडी में इंजेक्ट किया जाता है। और अहम बात ये है कि इसके जरिए शरीर में ब्लीडिंग की समस्या से निजात भी मिल जाता है। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि नॉन फैक्टर थेरेपी आज की डेट में ज्यादा कारगर है। ये कहना है KGMU के क्लिनिकल हेमेटोलॉजी विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष डॉ.एसपी वर्मा का। रविवार को लखनऊ के निजी होटल में यूपी-हीमोफीलिया कॉन्क्लेव 2026 के दौरान वो बोल रहे थे। उन्होंने दावा किया कि लांग टर्म में फैक्टर थेरेपी के मुकाबले नॉन फैक्टर थेरेपी ज्यादा किफायती भी साबित होगी। जोड़ों को बचाना जरूरी डॉ.एसपी वर्मा ने कहा कि बार-बार होने वाली ब्लीडिंग से जोड़ों को स्थाई नुकसान हो सकता है। समय पर प्रोफिलैक्सिस देने से जोड़ों और मांसपेशियों को सुरक्षित रखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यूपी में ज्यादातर मरीज अभी भी ब्लीडिंग होने के बाद ऑन-डिमांड उपचार लेते हैं। व्यवस्था को प्रोफिलैक्सिस की ओर ले जाने के लिए बजट बढ़ाने, क्लॉटिंग फैक्टर की नियमित उपलब्धता और नए उपचार विकल्पों को अपनाने की जरूरत है। ब्लीडिंग रोकने के लिए पहले से इलाज जरूरी RMLIMS के पूर्व निदेशक और सीनियर क्लिनिकल हेमेटोलॉजिस्ट प्रो.एके त्रिपाठी ने कहा कि मरीजों को ब्लीडिंग होने के बाद इलाज देने की व्यवस्था से आगे बढ़ना होगा। मरीजों को ऐसा उपचार मिलना चाहिए, जिससे ब्लीडिंग होने की संभावना ही कम हो। हीमोफीलिया को मधुमेह और हाई ब्लड प्रेशर जैसी लंबे समय तक नियंत्रित की जाने वाली बीमारी की तरह मैनेज करने की जरूरत है। नियमित रिप्लेसमेंट उपचार से जटिलताओं को काफी हद तक रोका जा सकता है। यूपी में 7700 मरीज चिन्हित एक्सपर्ट्स के मुताबिक 2026 तक भारत में करीब 28 हजार हीमोफीलिया मरीजों का निदान और पंजीकरण हुआ है। इनमें 24 हजार से ज्यादा मरीज हीमोफीलिया ए से पीड़ित हैं। हालांकि अनुमानित मरीजों की संख्या करीब 1.36 लाख हो सकती है। यूपी में करीब 7,700 मरीजों का निदान हो चुका है, जिनमें लगभग 5,500 मरीज हीमोफीलिया ए से पीड़ित हैं। हीमोफीलिया के मरीजों को इसलिए होती हैं ब्लीडिंग हीमोफीलिया में शरीर में खून का थक्का बनाने वाले क्लॉटिंग फैक्टर की कमी होती है। इसके कारण चोट लगने पर या कई बार बिना चोट के भी ज्यादा ब्लीडिंग हो सकता है। बार-बार जोड़ों में ब्लीडिंग होने से हड्डियों और मांसपेशियों को नुकसान पहुंच सकता है और मरीज की चलने-फिरने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
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