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    Human Composting को Australia के New South Wales ने दी कानूनी मंजूरी, जानिए कैसे बनती है खाद

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    (पाओला ए मगनी - मर्डोक यूनिवर्सिटी, पिया इंटरलैंदी - कर्टिन यूनिवर्सिटी) पर्थ, 26 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) आपकी मृत्यु के बाद आपके शरीर का क्या होना चाहिए? यह ऐसा विषय नहीं है, जिस पर आमतौर पर चर्चा होती हो। लेकिन एक समय ऐसा आता है, जब यह निर्णय लेना ही पड़ता है।ऑस्ट्रेलिया में परंपरागत रूप से शव के अंतिम संस्कार के लिए दफनाने और दाह संस्कार के विकल्प रहे हैं। पर्यावरण पर इनके प्रभाव, कब्रिस्तानों में जगह की कमी और अधिक टिकाऊ विकल्पों की तलाश ने अन्य तरीकों में भी रुचि बढ़ाई है। इनमें प्राकृतिक तरीके से दफनाना या अन्य तरीके से शव का दाह संस्कार शामिल हैं।अब न्यू साउथ वेल्स मानव शरीर के अंतिम संस्कार के एक अन्य तरीके को कानूनी अनुमति देने वाला ऑस्ट्रेलिया का पहला राज्य बन गया है। इसे ‘ह्यूमन कंपोस्टिंग’ कहा जाता है। तकनीकी रूप से इसे ‘नेचुरल ऑर्गेनिक रिडक्शन’ और कानूनी तौर पर ‘टेरामेशन’ नाम दिया गया है।इस प्रक्रिया में सूक्ष्मजीवों की मदद से मानव अवशेषों को खाद जैसे पदार्थ में बदला जाता है। मानव शरीर को खाद में बदलने का विचार असामान्य या असहज लग सकता है। लेकिन यह प्रक्रिया वास्तव में कैसे काम करती है?क्या यह मौजूदा तरीकों से बेहतर विकल्प है? इन सवालों के जवाब के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि अपघटन कैसे होता है और प्रकृति में इसकी क्या भूमिका है। इतिहास में मनुष्यों ने मृतकों के शरीर को सुरक्षित रखने, संरक्षित करने और उन्हें वस्त्र पहनाने के लिए अलग-अलग परंपराएं विकसित की हैं।कुछ लोग चाहते हैं कि शरीर जल्दी मिट्टी में मिल जाए, जबकि दूसरे उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने को प्राथमिकता देते हैं। प्राचीन दफन पात्रों और भव्य कब्रों से लेकर ताबूतों, कफन और शव को रासायनिक पदार्थों से संरक्षित करने की परंपराओं तक, इन तौर-तरीकों में सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं झलकती हैं। ये परंपराएं शरीर के अपघटन की प्रक्रिया को भी प्रभावित करती हैं।मृत्यु के कुछ समय बाद ही अपघटन शुरू हो जाता है। कोशिकाओं के टूटने के साथ ही शरीर के भीतर पहले से मौजूद सूक्ष्मजीव और आसपास के वातावरण से आने वाले सूक्ष्मजीव ऊतकों को विघटित करने लगते हैं। मक्खियों और भृंगों जैसे मृत जीवों को खाने वाले कीट अनुकूल तापमान, नमी और शरीर तक पहुंच मिलने पर मुलायम ऊतकों को काफी तेजी से खा सकते हैं।प्रकृति में यह जैविक पदार्थों के पुनर्चक्रण और पोषक तत्वों को पर्यावरण में वापस पहुंचाने का एक तरीका है। शरीर पूरी तरह यूं ही गायब नहीं हो जाता। उसके रूपांतरण में कितना समय लगेगा और यह किस हद तक होगा, यह परिस्थितियों, अपनाई गई प्रक्रियाओं और इस्तेमाल की गई सामग्रियों पर निर्भर करता है।पारंपरिक दफन प्रक्रिया में आमतौर पर शव को ताबूत में रखकर जमीन में करीब 1.5 से 2.7 मीटर की गहराई पर दफनाया जाता है। शव को किस तरह तैयार किया गया है और पर्यावरण की परिस्थितियां कैसी हैं, इसके आधार पर अपघटन में कई साल या यहां तक कि कई दशक भी लग सकते हैं। उत्तरी इटली के कब्रिस्तानों से निकालकर जांचे गए 408 मानव शवों पर किए गए हमारे शोध में पाया गया कि बंद पत्थर की कब्रों में रखे शवों को पूरी तरह कंकाल बनने में 40 साल से अधिक समय लग सकता है।कंकाल बनने की प्रक्रिया अपघटन का अंतिम चरण है, जिसमें सभी मुलायम ऊतक समाप्त हो जाते हैं और केवल हड्डियां बचती हैं। इसके विपरीत, रेतीली या बजरी वाली मिट्टी में दफनाए गए शव 10 साल से भी कम समय में कंकाल में बदल गए। पारंपरिक दफन प्रक्रिया को लेकर कब्रिस्तानों में जगह की कमी, ताबूतों के पर्यावरणीय प्रभाव, शव को संरक्षित करने वाले रसायनों और यहां तक कि कपड़ों के रेशों से होने वाले प्रभावों पर भी चिंता जताई जाती है।ज्यादातर ताबूतों के भीतर प्लास्टिक की परत होती है। आधुनिक पर्यावरण-अनुकूल दफन पद्धतियों के विकसित होने से बहुत पहले से ही ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी समुदायों की अपनी दफन परंपराएं रही हैं। इनमें विराडजुरी समुदाय की ऐसी परंपराएं शामिल हैं, जिनमें कब्रों की पहचान के लिए पेड़ों पर नक्काशी की जाती थी।इन परंपराओं का गहरा सांस्कृतिक महत्व है और ये समुदाय के अपनी भूमि से संबंधों को दर्शाती हैं। प्राकृतिक या हरित दफन प्रक्रिया में शव को संरक्षित करने के लिए रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसके बजाय कफन या साधारण जैविक रूप से विघटित होने वाले ताबूत का उपयोग किया जाता है, जिससे शरीर मिट्टी में प्राकृतिक रूप से विघटित हो सके।हालांकि, अपघटन के दौरान जमीन धंस सकती है और कुछ ऐसे पदार्थ निकल सकते हैं, जो आसपास के पौधों को प्रभावित करते हैं। इसलिए नई कब्र के ठीक ऊपर पेड़ लगाना उचित नहीं माना जाता। कुछ कब्रिस्तानों में कब्रों पर निशान लगाने को लेकर भी प्रतिबंध हैं और ऑस्ट्रेलिया में इस तरह की सुविधाओं की उपलब्धता अलग-अलग है।टेरामेशन में नियंत्रित परिस्थितियों के भीतर प्राकृतिक अपघटन की प्रक्रिया को तेज किया जाता है। शव को प्राकृतिक कफन में लपेटकर लकड़ी के छोटे टुकड़ों, सूखे भूसे और अल्फाल्फा जैसी जैविक सामग्रियों से भरे विशेष रूप से तैयार पात्र में रखा जाता है। ये सामग्रियां सूक्ष्मजीवों द्वारा ऊतकों को विघटित करने के लिए जरूरी नमी और हवा का प्रवाह बनाए रखने में मदद करती हैं।करीब 55 से 70 डिग्री सेल्सियस तापमान के साथ नमी और ऑक्सीजन को नियंत्रित रखा जाता है। इससे अपघटन की प्रक्रिया तेज होती है और रोग पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने में मदद मिलती है। पात्र की बनावट के आधार पर उसे समय-समय पर 360 डिग्री तक घुमाया जाता है या धीरे-धीरे एक तरफ से दूसरी तरफ हिलाया जाता है, ताकि प्रक्रिया तेज हो सके।दो से तीन महीने के भीतर इस प्रक्रिया से लगभग एक घन मीटर पोषक तत्वों से भरपूर खाद जैसा पदार्थ तैयार हो जाता है, जो पौधों की वृद्धि में मदद कर सकता है। हालांकि, शरीर का हर हिस्सा पूरी तरह विघटित नहीं होता। हड्डियों और दांतों को अलग से छोटे टुकड़ों में तोड़ने की जरूरत पड़ सकती है।इसके अलावा, दांतों के प्रत्यारोपण, सर्जरी में इस्तेमाल किए गए स्क्रू, कृत्रिम जोड़ और सिलिकॉन प्रत्यारोपण जैसी कृत्रिम सामग्रियों को भी हटाना पड़ता है। दाह संस्कार के बाद बचे अवशेषों के मामले में भी ऐसी सामग्रियों को हटाने की जरूरत होती है। टेरामेशन की शुरुआत अमेरिका में कैटरीना स्पेड ने की थी।उन्होंने 2014 में ‘अर्बन डेथ प्रोजेक्ट’ शुरू किया और बाद में ‘रिकंपोज’ नाम से पर्यावरण-अनुकूल अंतिम संस्कार सेवा की स्थापना की। अमेरिका के 14 राज्यों में अब मानव कंपोस्टिंग की अनुमति है। ऑस्ट्रेलिया में भी इस तरह की पहली सुविधाएं स्थापित करने की योजनाओं पर काम चल रहा है।हालांकि, वहां टेरामेशन की शुरुआत 2029 से पहले होने की संभावना नहीं है। न्यू साउथ वेल्स में नया कानून इस प्रक्रिया का रास्ता खोलता है, लेकिन इसे व्यावहारिक विकल्प बनाने के लिए विस्तृत नियमों, विशेष सुविधाओं और पर्याप्त मांग की जरूरत होगी। कौन-सा विकल्प बेहतर है?इस सवाल का कोई आसान जवाब नहीं है। पारंपरिक दफन, प्राकृतिक दफन, दाह संस्कार, पानी के जरिए अंतिम संस्कार (एक्वामेशन) और टेरामेशन, सभी तरीकों के अपने पर्यावरणीय फायदे और नुकसान हैं। इन सभी तरीकों के पर्यावरण-अनुकूल होने के दावों की गहन जांच जरूरी है।फिलहाल, इनके प्रभावों की तुलना करने के लिए पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा, शरीर के पोषक तत्वों का मिट्टी में वापस लौटना जरूरी नहीं कि हमारे जीवनकाल में पर्यावरण पर पड़े प्रभावों की भरपाई कर दे। अंततः, चाहे मृत्यु के बाद शरीर राख में बदले, जमीन में दफन रहे या खाद के रूप में मिट्टी में लौट जाए, वह प्रकृति के चक्र का हिस्सा है।सवाल यह नहीं है कि शरीर का अपघटन होगा या नहीं, बल्कि यह है कि वह कैसे, कहां और कितनी तेजी से होगा। मृत्यु के बाद शरीर के साथ क्या किया जाए, यह बेहद व्यक्तिगत निर्णय है। जीवित रहते हुए अपनी इच्छाओं पर चर्चा करना, उपलब्ध विकल्पों की सही जानकारी लेना और पहले से तैयारी करना यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है कि व्यक्ति की इच्छा का सम्मान हो।इससे उस समय प्रियजनों को भी मानसिक रूप से स्थिति स्वीकार करने और दुख से उबरने में मदद मिल सकती है।
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