Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    जस्टिस भुइयां बोले- प्रदर्शनकारियों पर अफसरों का हमला बेहद दुखद:पुलिस का रवैया बदलना जरूरी; कस्टडी में मौत और फर्जी एनकाउंटर गंभीर अपराध

    10 hours ago

    1

    0

    सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने जंतर-मंतर प्रदर्शन में पुलिसकर्मियों पर प्रदर्शनकारियों से मारपीट के आरोपों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जब आईपीएस अधिकारी खुद प्रदर्शनकारियों पर हमला करते दिखाई देते हैं, तो यह बेहद दुखद है। जस्टिस भुइयां ने कहा कि पुलिस से जिस निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है, वह कहीं गायब होती दिख रही है। पुलिस को अपना रवैया बदला होगा। साथ ही उन्होंने कहा कि हिरासत में मौत और फर्जी एनकाउंटर गंभीर अपराध हैं। जस्टिस भुइयां ने कहा कि सड़क पर तैनात पुलिसकर्मी आम लोगों के लिए राज्य की शक्ति का प्रतीक होता है। किसी परेशानी में नागरिक मदद के लिए पुलिस के पास जाता है, इसलिए पुलिस पर भरोसा बनाए रखना जरूरी है। जस्टिस भुइयां ने हिरासत में मौत और यातना पर जताई चिंता जस्टिस भुइयां ने हिरासत में यातना और मौत के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सभ्य समाज में हिरासत में मौत बेहद गंभीर अपराध है। किसी भी स्थिति में पुलिस किसी व्यक्ति के साथ यातना या अमानवीय व्यवहार नहीं कर सकती। उन्होंने 1997 के डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल मामले का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तारी के बाद भी नागरिकों के मौलिक अधिकार खत्म नहीं होते। उन्होंने सवाल किया कि क्या पुलिस की गिरफ्तारी के बाद किसी व्यक्ति का जीवन का अधिकार खत्म हो जाता है? उन्होंने कहा, इसका जवाब साफ है- नहीं। जस्टिस भुइयां ने कहा कि डीके बसु मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और पूछताछ के दौरान पुलिस के लिए कई नियम तय किए थे। मानवाधिकारों के उल्लंघन पर पीड़ित को मुआवजा देने की बात भी कही गई थी। उन्होंने कहा कि जब सरकारी अधिकारी ही कानून तोड़ते हैं, तो लोगों का कानून पर भरोसा कम होता है और अराजकता बढ़ती है। सभ्य समाज में ऐसी स्थिति स्वीकार नहीं की जा सकती। जस्टिस भुइयां बोले- राजनीतिक दखल से पुलिस की स्वतंत्रता कमजोर होती है जस्टिस भुइयां ने पुलिस सुधार और राजनीतिक हस्तक्षेप के खतरे पर चिंता जताई। उन्होंने 1977 में बने राष्ट्रीय पुलिस आयोग का जिक्र किया, जिसने पुलिस व्यवस्था और नागरिकों के अधिकारों पर कई सुझाव दिए थे। आयोग ने मई 1981 में अपनी अंतिम रिपोर्ट दी थी। उन्होंने कहा कि आयोग ने पुलिस के खिलाफ शिकायतों की जांच और पुलिस को पेशेवर स्वतंत्रता देने की सिफारिश की थी, लेकिन इन्हें लागू नहीं किया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में प्रकाश सिंह मामले में पुलिस सुधारों के निर्देश दिए। इनमें राज्य सुरक्षा आयोग, DGP का न्यूनतम कार्यकाल, पुलिस जांच को अलग करना और पुलिस शिकायत प्राधिकरण बनाने जैसे निर्देश शामिल थे। जस्टिस भुइयां ने कहा कि राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव पुलिस का गलत इस्तेमाल करवा सकता है और कानून का शासन कमजोर कर सकता है। जस्टिस भुइयां ने मणिपुर में जारी हिंसा पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि प्रतिभा और संस्कृति से समृद्ध इस राज्य में शांति अब भी दूर है। उन्होंने कहा कि पुलिस, मणिपुर राइफल्स, असम राइफल्स, अर्धसैनिक बलों और सेना की बड़ी मौजूदगी के बावजूद हिंसा जारी है। उन्होंने कहा कि मणिपुर की स्थिति भारत समेत सभी के लिए एक सबक है। ---------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… SC बोला- लॉ स्टूडेंट्स पर बार काउंसिल एक्शन नहीं ले सकता, CJI को बुलाने के विरोध के बाद छात्रों का एनरोलमेंट रोका था सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI के पास लॉ स्टूडेंट्स के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि छात्रों के आचरण पर कार्रवाई करने का अधिकार उनके यूनिवर्सिटी या संबंधित शैक्षणिक संस्थान के पास है। पूरी खबर पढ़ें…
    Click here to Read more
    Prev Article
    भास्कर अपडेट्स:नासिक में आश्रम स्कूल की 7 साल की छात्रा की मौत, खाने-पानी की जांच कराई गई
    Next Article
    खबर हटके- 11 साल से बाल खा रही थी लड़की:कॉकरोच के दूध पर रिसर्च, IG नोबेल मिला; गर्लफ्रेंड को आईफोन देने के लिए बना गांजा तस्कर

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment