Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    जैविक पिता अपने नाजायज़ बेटे को गोद ले सकता है:हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम' के तहत हाईकोर्ट का फैसला

    14 hours ago

    1

    0

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956' के तहत किसी हिंदू पुरुष को अपने ही नाजायज़ बेटे को गोद लेने से इसलिए नहीं रोका जा सकता, क्योंकि वह बच्चे का जैविक पिता है। जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने 1970 में कथित तौर पर किए गए एक दत्तक ग्रहण (गोद लेने की प्रक्रिया) से जुड़ी दूसरी अपील पर फैसला सुनाते हुए यह बात कही। कोर्ट ने निचली अदालतों के इन फैसलों को सही ठहराया कि मूल वादी (राम केश) को बडलू ने कानूनी रूप से गोद लिया था, जो उसका जैविक पिता भी है। जानिये क्या है मामला मामले के अनुसार यह विवाद बडलू की कृषि भूमि से जुड़ा है। वादी का दावा है कि हालांकि उसकी माँ की शादी बुध राम से हुई, लेकिन बडलू ही उसका जैविक पिता है। उसके अनुसार, बाद में बडलू ने उसे 8 नवंबर, 1970 को गोद ले लिया। वादी ने 18/19 जून, 1973 की उन बिक्री डीड को भी चुनौती दी, जो कथित तौर पर बडलू ने प्रतिवादियों के पक्ष में निष्पादित की हैं। उसने आरोप लगाया कि प्रतिवादी बडलू को इलाज के लिए ले गए और धोखाधड़ी से बिक्री डीड हासिल कर ली और उसने उन्हें रद्द करने की मांग की। प्रतिवादियों ने गोद लेने की बात से इनकार किया और कहा कि बिक्री डीड असली है और बडलू ने अपनी मर्जी से और पैसे के बदले उसे निष्पादित किया। उनका तर्क है कि चूंकि वादी बडलू का जैविक बेटा है, इसलिए बडलू के लिए उसे गोद लेना कानूनी रूप से असंभव है। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने पाया कि वादी बडलू का गोद लिया हुआ बेटा है और बिक्री डीड अमान्य है। पहली अपीलीय अदालत ने इन निष्कर्षों की पुष्टि की। इसके बाद मामला दूसरी अपील के रूप में हाईकोर्ट पहुंचा। नाजायज़ बच्चे के लिए क्या प्रावधान हाईकोर्ट के सामने बुद्धिराम की याचिका पर मुख्य सवाल यह था कि क्या बडलू, वादी का जैविक या कथित पिता होने के नाते उसे कानूनी रूप से गोद ले सकता था, खासकर तब जब वादी एक नाजायज़ बच्चा है। हाईकोर्ट की टिप्पणियां 'हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम' की धारा 10 का हवाला देते हुए, जिसमें गोद लिए जा सकने वाले व्यक्तियों के बारे में बताया गया, कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान किसी नाजायज़ बच्चे को केवल नाजायज़ होने के आधार पर बाहर नहीं करता। कानूनी अयोग्यता की लिस्ट में नाजायज़ होने का ज़िक्र कोर्ट ने यह बात कही: "धारा 10, जो गोद लिए जा सकने वाले लोगों के बारे में बताती है, किसी नाजायज़ बच्चे को सिर्फ़ उसके नाजायज़ होने के आधार पर बाहर नहीं रखती... कानूनी अयोग्यता की लिस्ट में नाजायज़ होने का ज़िक्र कहीं नहीं है... इस एक्ट में ऐसा कोई साफ़ नियम नहीं है, जो किसी हिंदू पुरुष को अपने ही नाजायज़ बेटे को गोद लेने से रोकता हो।" कोर्ट ने साफ़ किया कि बच्चे को गोद देने वाले व्यक्ति की क्षमता और बच्चे को गोद लेने वाले व्यक्ति की क्षमता अलग-अलग बातें हैं। इसलिए गोद लेने की वैधता की जाँच उस तारीख़ पर लागू कानूनी ज़रूरतों के आधार पर की जानी चाहिए, जिस दिन गोद लिया गया। कोर्ट ने वादी की माँ की उसे गोद देने की क्षमता पर भी बात की। कोर्ट ने देखा कि 1970 में लागू कानून के तहत नाजायज़ बच्चे की असली मां को यह अधिकार है कि वह बच्चे को उस व्यक्ति को गोद दे सके जो उसे गोद लेना चाहता था। कोर्ट ने पाया कि दोनों अदालतों द्वारा स्वीकार किए गए सबूतों से यह साबित होता है कि वादी की असली माँ ने उसे बदलू को गोद दिया और बदलू ने उसे गोद लिया। असली पिता और गोद भी लिया इसलिए कोर्ट ने यह फ़ैसला सुनाया: "इस तरह गोद लेने की प्रक्रिया को सिर्फ़ इसलिए अमान्य करने का कोई कारण नहीं है कि बदलू वादी का असली पिता भी है।" हाईकोर्ट ने पाया कि 1956 के एक्ट की धारा 11(vi) इस मामले में बहुत अहम है। इस नियम के तहत ज़रूरी है कि बच्चे को असल में गोद दिया और लिया जाए, और ऐसा बच्चे को उसके जन्म वाले परिवार से गोद लेने वाले परिवार में भेजने के इरादे से किया जाए। कोर्ट ने यह बात कही: "जिस व्यक्ति ने वादी को गोद लिया, वह उसका सगा पिता है - इस बात से गोद लेने की रस्म कानूनी रूप से बेकार नहीं हो जाती।" कोर्ट के अनुसार, अहम बात यह है कि क्या दोनों पक्षों का इरादा गोद लेने वाले पिता और गोद लिए गए बेटे का कानूनी रिश्ता बनाने का है और क्या कानूनी शर्तें पूरी की गईं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला लक्ष्मण सिंह कोठारी बनाम श्रीमती रूप कंवर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने आगे कहा कि "बच्चे को देना और लेना गोद लेने की प्रक्रिया का मुख्य हिस्सा है" और बच्चे के हस्तांतरण को साबित करने के लिए वास्तव में बच्चे को देने और लेने की क्रिया होनी चाहिए। कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज किया कि गोद लेने का कोई दस्तावेज़ (डीड) न होना मामले को खत्म कर देता है। गोद लेने की प्रक्रिया 1970 में हुई, जबकि 1976 में धारा 16 में किए गए संशोधन से एक विशेष प्रावधान लागू हुआ। इस प्रावधान के तहत 1 जनवरी 1977 या उसके बाद गोद लेने के मामलों में बच्चे को देने और लेने के एकमात्र मान्य सबूत के तौर पर रजिस्टर्ड दस्तावेज़ की ज़रूरत थी। यह प्रावधान भविष्य के मामलों के लिए था, इसलिए मौजूदा गोद लेने के मामले पर लागू नहीं होता। इस प्रकार, बेंच ने कहा कि 1970 में गोद लेने के मामले में बच्चे को देने और लेने की बात को कानूनी रूप से मान्य सबूतों के ज़रिए साबित किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने पाया कि गोद लेने की प्रक्रिया को सही ठहराते हुए ज़िला जज ने 1956 के कानून की धारा 9(4) का गलत इस्तेमाल किया। बच्चा गोद लिया और दिया गया कोर्ट ने समझाया कि धारा 9(4) उन खास मामलों से संबंधित है, जहां कोई अभिभावक कोर्ट की पूर्व अनुमति से बच्चे को गोद देता है। ऐसी स्थितियां तब होती हैं, जब दोनों माता-पिता की मृत्यु हो गई हो, उन्होंने संसार त्याग दिया हो, बच्चे को छोड़ दिया हो, या वे अक्षम हों, या फिर माता-पिता का पता न हो। बेंच ने कहा कि इसलिए "मौजूदा मामले में केवल इसलिए उस प्रावधान को लागू करने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि वादी नाजायज़ है"। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि धारा 9(4) का गलत हवाला देने से गोद लेने की प्रक्रिया अमान्य नहीं हो गई, क्योंकि सबूतों से स्वतंत्र रूप से यह साबित हो गया था कि बच्चे को गोद लेने के लिए दिया और लिया गया। दूसरा मुद्दा बडलू द्वारा अपीलकर्ताओं (मूल प्रतिवादियों) के पक्ष में किए गए रजिस्टर्ड सेल डीड (बिक्री विलेख) से संबंधित है। निचली अदालतों ने पाया कि यह कोई असली और स्वेच्छा से किया गया लेन-देन नहीं है और अपीलकर्ताओं द्वारा बताई गई कीमत (कंसीडरेशन) संतोषजनक ढंग से साबित नहीं हुई। हाईकोर्ट ने उन एक जैसे निष्कर्षों को बरकरार रखा और कहा कि दस्तावेज़ के रजिस्टर्ड होने का मतलब यह नहीं है कि उसे चुनौती नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि उसे सबूतों और आस-पास की परिस्थितियों पर विचार करने और यह तय करने का अधिकार है कि लेन-देन धोखाधड़ी वाला था और उसे रद्द किया जा सकता है। इसलिए अदालत ने दूसरी अपील खारिज की और निचली अदालतों के फैसलों और आदेशों को बरकरार रखा।
    Click here to Read more
    Prev Article
    उन्नाव में तेज रफ्तार ट्रक ने किसान को रौंदा, मौत:खेत से साइकिल से लौट रहे थे, पहिया किसान के ऊपर से निकला
    Next Article
    भाजपा पश्चिम की क्षेत्रीय कार्यसमिति की सूची घोषित:2027 चुनाव को देखते हुए पार्टी ने साधा जातीय समीकरण, पूरी लिस्ट देखिए

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment