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    झांसी में जलेगा होलिका का पुतला, कोतवाल देंगे दाग:गोद में बैठेंगे भक्त प्रह्लाद, पहले होगा धर्म संवाद, फिर भक्ति की शक्ति से जलेगी होलिका

    2 hours ago

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    झांसी में इस बार होली का उत्सव पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ मनाया जा रहा है। लकड़ी जलाने की परंपरा को पीछे छोड़ते हुए आयोजकों ने अब घास और रद्दी कागज से बने होलिका के पुतलों का दहन शुरू किया है। ये पुतले शहर के चतुर्यना मोहल्ले में तैयार किए जा रहे हैं, जहां मूर्तिकार चंदन पिछले चार वर्षों से इस नई पहल को आगे बढ़ा रहे हैं। घास और रद्दी से तैयार हो रही होलिका मूर्तिकार चंदन ने बताया कि चार साल पहले उन्होंने पहली बार घास से होलिका का पुतला तैयार किया था। इसे आयोजकों ने काफी पसंद किया। इसके बाद से हर साल इसी तरह के पुतले बनाए जा रहे हैं। होलिका के पुतले को घास, पुआल और रद्दी कागज से तैयार किया जाता है, जिससे लकड़ी की खपत कम होती है और पर्यावरण को नुकसान भी कम पहुंचता है। इन पुतलों की कीमत 3,000 से 5,000 रुपये तक होती है। चंदन पहले माता दुर्गा और भगवान गणेश की मूर्तियां बनाते थे, लेकिन चार साल पहले उन्हें होलिका और भक्त प्रह्लाद के पुतले बनाने का प्रस्ताव मिला। इसके बाद से उन्होंने इसे ही अपनी विशेषता बना लिया। उनका कहना है कि अब पुतला दहन का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इन इलाकों में जलाए जाते हैं पुतले शहर के झोकनाबाग, लक्ष्मीगेट, घासमंडी, गोविंद चौराहा, नारायण धर्मशाला और पुलिस लाइन में होलिका के पुतलों का दहन किया जा रहा है। इन स्थानों पर हर साल बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर होलिका दहन का कार्यक्रम देखते हैं। झोकनाबाग से हुई शुरुआत चंदन कलाकार के अनुसार, पुतला दहन की शुरुआत झोकनाबाग से हुई थी। यहां सबसे बड़ा पुतला दहन आयोजित होता है। पुतले में आकर्षक लाइटिंग की जाती है और इस बार खास तौर पर साउंड सिस्टम भी लगाया गया है, जिसमें होलिका और भक्त प्रह्लाद के संवाद सुनाए जाएंगे। संवाद के बाद विधिवत रूप से पुतले का दहन किया जाएगा। 160 साल पुरानी परंपरा: घासमंडी की होली झांसी में सबसे पुरानी होली घासमंडी में जलाई जाती है। समिति अध्यक्ष अशोक कुमार अग्रवाल के अनुसार, यहां 160 साल से भी अधिक समय से होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है। बताया जाता है कि झांसी के राजा गंगाधर राव स्वयं यहां होली में दाग लगाने आते थे। एक बार उनके बीमार पड़ने पर उन्होंने अपने कोतवाल को होलिका दहन के लिए भेजा था। तभी से यह परंपरा बन गई और आज तक शहर कोतवाली के कोतवाल ही इस होली को दाग लगाते हैं।
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