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    कानपुर में 5 साल में 1297 बच्चे लापता:यूपी में एक दिन में 22 बच्चे हो रहे चोरी; बच्चा चोर गैंग अस्पताल-मंदिर में सबसे अधिक एक्टिव

    7 hours ago

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    यूपी में एक दिन में करीब 22 बच्चे चोरी हो रहे हैं। पिछले 5 सालों में 41623 बच्चे चोरी हुए हैं। जिसमें 39646 बरामद किए गए। वहीं 1977 बच्चे अभी तक गायब हैं। जिनका पुलिस अभी तक पता नहीं लगा पाई है। कानपुर पुलिस कमिश्नरेट में 1297 बच्चे चोरी हुए। जिसमें अभी भी 36 बच्चों का सुराग नहीं लग सका है। चोरी करने वाले गैंग में ज्यादातर महिलाएं शामिल हैं। सबसे पहले पढ़िए कानपुर की बच्चा चोरी की 3 घटनाएं यूपी में काशी, अयोध्या, मथुरा से ज्यादा बच्चे हुए गायब यूपी के अयोध्या, मथुरा और काशी से ज्यादातर बच्चे गायब हो रहे हैं। पिछले 5 सालों के आंकड़े देखे तो पता चलेगा कि 2020 से 2025 तक वाराणसी कमिश्नरेट कुल 2936 बच्चे गायब हुए है। जबकि 79 बच्चों को अभी तक पता नहीं चला है। जबकि मथुरा में 1550 बच्चे गायब हुए। इसमें 1522 बच्चे बरामद हो गए लेकिन 28 बच्चे अभी भी लापता हैं। वहीं अयोध्या में 1006 बच्चे गायब हुए। इसमें 773 बच्चे बरामद हुए जबकि 33 बच्चे अभी भी लापता हैं। कानपुर जोन में 4422 बच्चे गायब हुए कानपुर जोन में पिछले 5 साल में 4422 बच्चे लापता हुए। इसमें 4231 बच्चे बरामद हुए। जबकि 191 अभी भी लापता हैं। कानपुर देहात की बात करें तो यहां से 440 बच्चे गायब हुए। इसमें 426 बच्चे मिल गए लेकिन 14 बच्चे अभी भी लापता हैं। इटावा में 478 बच्चे गायब हुए। इसमें 467 बच्चे मिल गए लेकिन 11 बच्चे अभी भी लापता हैं। अधिकतर बच्चा चोर गैंग के लोग बच्चों को धार्मिक शहर, मंदिर, रेलवे और बस स्टेशन और अस्पतालों से बच्चों को निशाना बनाते हैं। कई बार अस्पतालों के कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आती रही है। इसके बाद ये लोग ऐसे लोगों को बच्चों को देते है। जिनके बच्चे नहीं होते हैं। अब समझिए क्यों चोरी हो रहे बच्चे भारत में हर 8 मिनट में एक बच्चा चोरी होता है। ऐसे में बच्चों की तस्करी और चोरी रोकना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यूपी चाइल्ड ट्रैफ़िकिंग मामले में टॉप पर है। गरीबी, बेरोजगारी होने की वजह से ये गैंग बच्चों को अपना निशाना बनाते हैं। यूपी में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अस्पताल से बच्चों की चोरी को लेकर भले ही इतनी गंभीर टिप्पणी की हो, लेकिन अस्पताल आजकल बच्चों की तस्करी के बड़े माध्यम बन चुके हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। अस्पतालों में इन अपराधों के लिए छोटे-मोटे गिरोह नहीं, बल्कि कई बार अस्पताल प्रशासन तक की भूमिका रहती है। उससे भी गंभीर बात ये है कि कई बार अभिभावक भी पैसों के लालच में बाल तस्करी में शामिल हो जाते हैं। कानून बनने के बाद ही ऐसी घटनाएं रुकेंगी लखनऊ के लॉ कॉलेज के प्रोफेसर अब्दुल हफीज गांधी बताते हैं कि भारत में बाल तस्करी के लिए अलग से कोई कानून ना होना भी इस समस्या को रोक पाने में बाधक है। अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम जैसे कानून हैं, लेकिन ये केवल वेश्यावृत्ति पर केंद्रित हैं। इसके अलावा किशोर न्याय अधिनियम और बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम उपलब्ध जरूर हैं लेकिन अपर्याप्त हैं। गृह मंत्रालय बाल तस्करी से संबंधित दिशानिर्देश तो जारी करता है लेकिन उस पर अमल करने का काम राज्य सरकार का है। यूपी में इन दिशा-निर्देशों का कैसा पालन हो रहा है ये आंकड़ों और सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी से स्पष्ट है। जब तक एक अलग कानून और जिम्मेदारी नहीं तय की जाएगी। इस श्राप से मुक्ति नहीं मिलेगी। ---------------------------------- ये खबर भी पढ़ें…
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