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    कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का विकल्प नहीं, लेकिन शुरुआती पहचान में मददगार: अध्ययन

    20 hours ago

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    ऑकलैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित चैटबॉट मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का विकल्प नहीं बन सकते। हालांकि, अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं की शुरुआती पहचान करने और लोगों को समय रहते सहायता उपलब्ध कराने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। वर्तमान में दुनिया भर में एआई चैटबॉट लोगों के लिए साथी, सलाहकार और भावनाएं साझा करने के माध्यम के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं और लोग मानसिक तनाव व भावनात्मक सहयोग के लिए इनका सहारा ले रहे हैं।अध्ययन के अनुसार, उपयोगकर्ता व्यक्तिगत समस्याओं पर चर्चा करने, भावनात्मक समर्थन पाने और अपनी मानसिक स्थिति को समझने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये चैटबॉट लोगों के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं रखते। न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में, जहां मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में लंबी प्रतीक्षा सूची की समस्या है, वहां ये चैटबॉट तत्काल बातचीत का एक विकल्प उपलब्ध कराते हैं। हालांकि, तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ इसकी सीमाओं को समझना भी आवश्यक है।शोधकर्ताओं का मानना है कि मौजूदा एआई चैटबॉट जटिल सवालों के जवाब देने से लेकर रिश्तों से जुड़ी सलाह देने तक कई काम कर सकते हैं और उनकी बातचीत काफी हद तक मानवीय महसूस होती है। उचित तरीके से इस्तेमाल किए जाने पर ये उपकरण चिंता और अवसाद के लक्षणों को कम करने में मददगार हो सकते हैं। यह लोगों को कठिन परिस्थितियों को अलग नजरिये से देखने के लिए प्रेरित कर 'कॉग्निटिव रीफ्रेमिंग' का अभ्यास कराने में भी सहायक हो सकता है।इसके बावजूद, शोधकर्ताओं, चिकित्सकों और नियामकों ने गंभीर चिंताएं भी जताई हैं। उनका कहना है कि एआई कभी-कभी गलत सलाह दे सकता है, हानिकारक धारणाओं को मजबूत कर सकता है और संकट के संकेतों को पहचानने में विफल हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, एआई भले ही संवेदनशील प्रतीत हो, लेकिन वह व्यक्ति की वास्तविक परिस्थितियों और भावनाओं को मनुष्यों की तरह नहीं समझ सकता और न ही इस पर पेशेवरों जैसी कोई नियामकीय जवाबदेही लागू होती है। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में भरोसा, सहानुभूति और मानवीय जुड़ाव की अहम भूमिका होती है, इसलिए अधिकांश विशेषज्ञ इसे केवल एक सहयोगी उपकरण मानते हैं।ऑकलैंड विश्वविद्यालय का '2डीएन' शोध समूह इस बात का अध्ययन कर रहा है कि क्या एआई आवाज के उतार-चढ़ाव, बोलने के तरीके, शब्दों के चयन और चेहरे के भावों जैसे 'डिजिटल बायोमार्कर' के आधार पर अवसाद के शुरुआती लक्षणों की पहचान कर सकता है। इस शोध का उद्देश्य चिकित्सकों का स्थान लेना नहीं, बल्कि ऐसे उपकरण विकसित करना है जो शुरुआती जांच और निगरानी में मदद कर सकें। शोधकर्ताओं ने इसकी तुलना उन वियरेबल डिवाइस से की है जो हृदय की असामान्य गतिविधियों का पता लगा सकते हैं, लेकिन हृदय रोग विशेषज्ञ का विकल्प नहीं होते।विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में तकनीक की भूमिका बढ़ेगी, लेकिन इसके लिए आंकड़ों की गोपनीयता, सुरक्षा और सूचित सहमति सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक है। एआई प्रशिक्षण के आंकड़ों में मौजूद पक्षपात भी विभिन्न समुदायों के लिए इसके प्रभाव को बदल सकता है। इसके अलावा, लोगों का एआई पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना भी एक बड़ी चिंता है। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का भविष्य संभवतः तकनीक द्वारा पैटर्न पहचानने की क्षमता और मनुष्यों की सहानुभूति व चिकित्सकीय निर्णय क्षमता के संतुलित समन्वय पर निर्भर करेगा।
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