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    M Jagadesh Kumar ने कहा, सिर्फ डिग्री देने तक सीमित न रहें उच्च शिक्षण संस्थान

    11 hours ago

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    पद्म पुरस्कार से सम्मानित शिक्षाविद एम जगदेश कुमार ने बृहस्पतिवार को कहा कि आज के छात्र ही 2047 में देश के नीति-निर्माता होंगे और उनके फैसलों की गुणवत्ता आज की शिक्षा व्यवस्था की स्थिति पर निर्भर करेगी। आईआईएम-कलकत्ता के शासी निकाय के वर्तमान अध्यक्ष और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के पूर्व अध्यक्ष कुमार ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को केवल डिग्री देने वाले संस्थानों से आगे बढ़कर काम करने की जरूरत पर बल दिया। वह इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आइसीएमएआई) द्वारा विकसित भारत के लिए जेन-जी को तराशना विषय पर आयोजित छात्र सम्मेलन में अपनी पढ़ाई पूरी कर चुके (उत्तीर्ण) विद्यार्थियों को संबोधित कर रहे थे।उन्होंने कहा, भारत का भविष्य आप जैसे युवाओं द्वारा तय किया जाएगा, जिनकी संख्या लगभग 40 करोड़ है। जहां देश और दुनिया भर में बहुत सी चीजें हो रही हैं, वहीं हमारे देश के करोड़ों जेन-जी युवा वर्तमान में अपनी पढ़ाई, अपने स्टार्ट-अप शुरू करने, नयी प्रौद्योगिकी विकसित करने और देश को एक मजबूत अर्थव्यवस्था बनाने में लगे हुए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 की समीक्षा समिति की अध्यक्षता कर रहे कुमार ने कहा कि 2047 तक आज के छात्र 40-45 वर्ष की उम्र के होंगे और वे उद्यमी, देश की वित्तीय प्रणाली को संभालने वाले कॉस्ट अकाउंटेंट, वैज्ञानिक, शिक्षक या अन्य पेशेवर हो सकते हैं।उन्होंने कहा, 2047 में वे जिस तरह के फैसले लेंगे, उसकी गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि हम आज अपनी शिक्षा प्रणाली में क्या कर रहे हैं। यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) में प्रोफेसर रहने के अपने अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि नीतियों की सफलता या विफलता संस्थानों की क्षमता पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि किसी भी संस्थान की सफलता के लिए नेतृत्व की गुणवत्ता और बदलती व्यवस्था के अनुरूप ढलने की शिक्षकों की क्षमता बेहद महत्वपूर्ण होती है।कुमार ने कहा, यही कारण है कि हम कहते हैं कि हमारी शिक्षा प्रणाली, हमारे विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को महज डिग्री बांटने वाले संस्थानों की भूमिका से बाहर निकलना चाहिए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्र केवल डिग्री लेकर न निकलें, बल्कि उनके पास अपने व्यावहारिक कार्यों का पोर्टफोलियो (कार्यों का लेखा-जोखा) भी हो। उन्होंने कहा, जब छात्र बाहर निकलकर यह कह सकें कि यह मेरी सोच थी, जिसे मैंने डिजाइन किया, बनाया और जांचा।इसमें मैं असफल हुआ, लेकिन असफलता से सीखकर मैंने सुधार किया... देश को ऐसे ही रचनात्मक और नवाचारी छात्रों की जरूरत है।
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