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    मेरठ SSP अपने ऑफिस में फरियादियों की भीड़ देख भड़के:3 थानेदारों की फोन पर क्लास लगाई, जांच कराने के आदेश दिए

    10 hours ago

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    मेरठ में थानों पर शिकायतों के निस्तारण की खराब स्थिति सोमवार को SSP कार्यालय में सामने आई। लिसाड़ीगेट, इंचोली और कंकरखेड़ा से बड़ी संख्या में फरियादी अपनी शिकायतें लेकर पहुंचे। यह देखकर SSP बीबी जीटीएस मूर्ति नाराज हो गए। उन्होंने तीनों थानेदारों को फोन पर फटकार लगाई और उनके खिलाफ प्रारंभिक जांच (PE) के आदेश दिए। एक साल पुराने ठगी के मामले का निस्तारण नहीं होने पर जनसुनवाई प्रभारी संतोष कुमार सिंह के खिलाफ भी जांच के आदेश दिए गए। एसएसपी की इस कार्रवाई ने थानों में शिकायतों के निस्तारण और पुलिस कार्यालय की जनसुनवाई व्यवस्था, दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह भी है कि जब थानों में फरियादियों की समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा तो उनकी निगरानी करने वाला तंत्र क्या कर रहा है? शिकायतों का समय से निस्तारण नहीं होने पर जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है? पौने दो घंटे की बैठक, खड़े रहे फरियादी सोमवार होने के कारण एसएसपी कार्यालय में सुबह से ही फरियादियों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। एसएसपी बीबी जीटीएस मूर्ति, एसपी क्राइम अवनीश कुमार और सीओ कैंट संजय गुप्ता लोगों की शिकायतें सुन रहे थे। इसी बीच एडीजी जोन भानु भास्कर की ऑनलाइन बैठक शुरू हो गई। पुलिस अधिकारी बैठक में शामिल हो गए और फरियादियों की सुनवाई एक अधिकारी के जिम्मे छोड़ दी गई। दरवाजे पर खड़े होकर सुनाई पड़ी शिकायत बैठक करीब पौने दो घंटे तक चली। इस दौरान शिकायत लेकर पहुंचे लोगों की भीड़ बढ़ती गई। बैठक समाप्त होने के बाद एसएसपी अपने कक्ष से बाहर निकले तो दरवाजे पर फरियादियों की भीड़ देखकर हैरान रह गए। उन्होंने करीब 20 मिनट तक कक्ष के बाहर खड़े होकर लोगों की शिकायतें सुनीं। लेकिन शिकायतों की संख्या और लोगों की भीड़ बढ़ती देख उन्हें वापस अपनी सीट पर बैठकर दोबारा जनसुनवाई शुरू करनी पड़ी। एक घंटे में सुनी 100 से ज्यादा शिकायत एसएसपी के सामने करीब 100 शिकायतें रखी गई थीं। वह एक-एक कर शिकायतों को देख रहे थे, लेकिन फरियादियों के आने का सिलसिला थम नहीं रहा था। इसी दौरान तीन थानों से आए फरियादियों की संख्या और शिकायतों की प्रकृति को लेकर उन्होंने संबंधित थानेदारों से जवाब तलब किया। तीन थानों के फरियादियों को देख चढ़ा पारा पुलिस ऑफिस पर जनसुनवाई के दौरान अधिकांश सभी थानों से शिकायत पहुंचती है। लिसाड़ीगेट, इंचोली और कंकरखेड़ा थानों से बड़ी संख्या में फरियादियों के एसएसपी कार्यालय पहुंचने पर एसएसपी ने नाराजगी जताई। उन्होंने फोन पर तीनों थानेदारों से बात कर शिकायतों की स्थिति पर सवाल किए और उन्हें फटकार लगाई। एसएसपी बोले- निलंबन में ही कराओगे आमद लिसाड़ीगेट के थानेदार दलवीर सिंह ने खुद को अंडर ट्रांसफर बताया तो एसएसपी और नाराज हो गए। उन्होंने तल्ख लहजे में कहा कि कहीं ऐसा न हो कि दूसरे जनपद में भी निलंबन पर ही आमद दर्ज करानी पड़े। इसके बाद एसएसपी ने मौके पर ही अपने रीडर को बुलाया और तीनों थानेदारों के खिलाफ प्रारंभिक जांच खोलने के आदेश दे दिए।जांच के दायरे में आने वाले थानेदारों में लिसाड़ीगेट के दलवीर सिंह, इंचोली के कर्मवीर सिंह और कंकरखेड़ा के जितेंद्र सिंह शामिल हैं। पुरानी शिकायत पर जनसुनवाई प्रभारी घिरे एसएसपी जनसुनवाई कर ही रहे थे कि गुरुग्राम से आए एक होटल कर्मचारी ने ठगी से जुड़े एक साल पुराने मामले की शिकायत उनके सामने रख दी। उस शिकायत से लेकर अब तक दो एसएसपी बदल चुके थे। इतने लंबे समय तक मामले का निस्तारण नहीं होने की बात सामने आने पर एसएसपी ने जनसुनवाई प्रभारी संतोष कुमार सिंह से जवाब मांगा। जनसुनवाई प्रभारी ने अपनी ओर से सफाई देने की कोशिश की, लेकिन एसएसपी ने उन्हें भी फटकार लगाई और उनके खिलाफ प्रारंभिक जांच के आदेश दे दिए। इस तरह थानों के स्तर पर शिकायतों के निस्तारण के साथ ही एसएसपी कार्यालय की जनसुनवाई व्यवस्था भी जांच के दायरे में आ गई। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जनसुनवाई प्रभारी की जिम्मेदारी केवल शिकायतें प्राप्त करने तक सीमित नहीं हो सकती। शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई, संबंधित थाने से जवाब लिया गया या नहीं और फरियादी को राहत मिली या नहीं, इन बिंदुओं की निगरानी भी व्यवस्था का अहम हिस्सा है। शिकायतों का निस्तारण या सिर्फ प्रार्थना पत्रों की गिनती एसएसपी कार्यालय में सोमवार को सामने आई स्थिति ने पुलिस की जनसुनवाई व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए। अगर तीन थानों के फरियादी बड़ी संख्या में जिला पुलिस प्रमुख के कार्यालय पहुंच रहे हैं, तो यह जांचना जरूरी है कि संबंधित थानों पर उनकी शिकायतों के साथ क्या हुआ। क्या शिकायतों पर कार्रवाई नहीं हुई, क्या फरियादियों को बार-बार बुलाया गया या फिर उन्हें समाधान के लिए वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचना पड़ा? दूसरा सवाल पुलिस कार्यालय की निगरानी व्यवस्था को लेकर है। जनसुनवाई में दर्ज शिकायतों का नियमित फॉलोअप होता है तो एक साल पुराने मामले के निस्तारण में देरी कैसे हुई?
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