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    मस्जिदों में नमाज का क्या विवाद, क्यों हाईकोर्ट सख्त:बरेली-संभल के बाद बदायूं के केस में कोर्ट ने प्रशासनिक आदेश को रद्द किया

    6 hours ago

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    यूपी में इन दिनों मस्जिदों, निजि जमीनों पर नमाज को लेकर हंगामा, मुकदमे और कार्रवाई का मामला लगातार इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच रहा है। पहले बरेली का विवाद सुर्खियों में आया। फिर संभल में मस्जिद में नमाजियों की संख्या सीमित करने का केस हाईकोर्ट पहुंचा। अब नया मामला बदायूं का सामने आया है। यहां भी मस्जिद में नमाज के रोक के प्रशासनिक आदेश को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। धार्मिक आजादी, मौलिक अधिकार के इन मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए अफसरों को कड़ी फटकार लगाई है। बरेली के मामले में अवमानना का मामला मानते हुए कोर्ट ने डीएम-एसएसपी को हाईकोर्ट ने तलब किया। इसके बाद संभल के मामले में तो कोर्ट ने तख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि नमाजियों की संख्या प्रशासन तय नहीं कर सकता। ऐसे अफसर या तो इस्तीफा दे दें या फिर अपना तबादला कराके कहीं और चले गए। इसी तरह बदायूं के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मस्जिद में नमाज पढ़ने पर रोक लगाने वाले प्रशासनिक आदेश को रद कर दिया। कोर्ट ने कहा- निजी संपत्ति पर स्थित मस्जिद में नमाज पढ़ने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, और यह अधिकार मौलिक है। हाईकोर्ट ने कहा- कानून व्यवस्था को समस्या हो तो अधिकारी समाधान करें। तीनों ही मामलों में कोर्ट ने यूपी सरकार को आदेश दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वो यह सुनिश्चित करे कि हर हाल में कानून का राज कायम रहे। अब यह मामले खासतौर पर सुर्खियों में हैं। अब जानिये बदायूं का मामला बदायूं की मस्जिद में नमाज पर रोक का आदेश रद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बदायूं स्थित मस्जिद में नमाज पढ़ने पर रोक लगाने वाले प्रशासनिक आदेश को रद कर दिया। कोर्ट ने कहा- निजी संपत्ति पर स्थित मस्जिद में नमाज पढ़ने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, और यह अधिकार मौलिक है। न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ तथा न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने अलीशेर और एक अन्य की याचिका निस्तारित करते हुए कहा कि अधिकारियों को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोकने की अनुमति नहीं है। अगर कानून और व्यवस्था की समस्या होती है तो अधिकारियों को इसका समाधान करना होगा। संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर इस याचिका में मांग की गई थी कि याची तथा मुस्लिम समुदाय को मस्जिद में नमाज पढ़ने से नहीं रोका जाए और सुरक्षा दें। मस्जिद गांव बेहट जावी तहसील बिलसी में वक्फ मस्जिद रजा के नाम से है और याची की संपत्ति पर है। इसका खसरा नंबर 1081 (पुराना नंबर 432) है। याची के अधिवक्ता ने कहा कि निजी संपत्ति पर धार्मिक प्रार्थना सभा करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। इस क्रम में इलाहाबाद हाई कोर्ट के मारानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज बनाम यूपी राज्य और अन्य का हवाला दिया गया। इसमें कहा गया है कि निजी संपत्ति पर धार्मिक गतिविधियों के लिए अनुमति की जरूरत नहीं है। संभल केस में कहा-क़ानून-व्यवस्था नहीं संभाल सकते तो इस्तीफ़ा दें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मस्जिद में नमाजियों की संख्या सीमित नहीं कर सके। कोर्ट ने संभल प्रभासन पर तल्ख टिप्प्णी करते हुए उन्हें अपनी ड्यूटी का एहसास कराया। कोर्ट ने एक मस्जिद में नमाज़ियों की संख्या सीमित करने के स्थानीय प्रशासन के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि नमाज़ियों की संख्या कैसे तय की जा सकती है। अगर अधिकारी क़ानून-व्यवस्था सुनिश्चित नहीं कर सकते तो इस्तीफ़ा दे दें या फिर तबादला करवा लें। हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वो यह सुनिश्चित करे कि हर हाल में कानून का राज कायम रहे। कोर्ट ने कहा कि अगर वे अधिकारी उन्हें लगता है कि वे कानून का राज लागू करने में सक्षम नहीं हैं, तो इस्तीफा देकर चले जाएं। या फिर कहीं और जाकर ड्यूटी करें। कोर्ट ने कहा कि राज्य का कर्तव्य है कि वो यह सुनिश्चित करे कि हर समुदाय निर्धारित पूजा स्थल पर शांतिपूर्वक पूजा-अर्चना कर सके। मामले में मुनाज़िर खान ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर इस मामले केा उठाया था। कोर्ट को बताया गया कि उस जगह पर केवल बीस नमाज़ियों को ही अनुमति दी गई है जो वहां नमाज़ अदा कर सकते हैं। जबकि याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि परिसर के अंदर नमाज़ अदा करने के लिए इससे कहीं ज़्यादा लोग आ सकते है क्योंकि अभी रमज़ान का महीना चल रहा है और काफी संख्या में रोजेदार नमाज अदाक करते आते हैं। हाईकोर्ट अब इस मामले में 16 मार्च को सुनवाई करेगी। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीज़न बेंच ने यह आदेश दिया है। बरेली मामले में डीएम-एसएसपी हाईकोर्ट में तलब इलाहाबाद हाईकोर्ट घर के भीतर नमाज अदा करने से रोकने के मामले में बरेली के जिला मजिस्ट्रेट और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को 23 मार्च को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वे उपस्थित नहीं होते तो गैर-जमानती वारंट जारी किया जाएगा। साथ ही कोर्ट ने याची को 24 घंटे सशस्त्र सुरक्षा प्रदान करने का भी निर्देश दिया है। याचिकाकर्ता को 24 घंटे दो हथियारबंद गार्ड दें यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने दिया है। कोर्ट ने हसीन खान की सुरक्षा के लिए दो हथियारबंद गार्ड तैनात करने को कहा है, जो इस मामले में फैसला आने तक 24 घंटे हसीन खान के साथ हर जगह जाएंगे। कोर्ट ने कहा कि हसीन खान के शरीर या उनकी संपत्ति पर होने वाली हिंसा की कोई भी घटना प्रथमदृष्टया राज्य की शह पर मानी जाएगी। कोर्ट ने जारी किया था अवमानना नोटिस कोर्ट ने इस मामले में पिछली सुनवाई पर बरेली के डीएम और एसएसपी को एक पुराने आदेश की अवहेलना करने के आरोप में अवमानना नोटिस जारी किया था। बरेली निवासी तारिक खान ने याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि गत 16 जनवरी को स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें उनके निजी आवास के अंदर नमाज अदा करने की अनुमति नहीं दी। यह कार्रवाई उच्च न्यायालय के उस पूर्व आदेश का उल्लंघन है, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि निजी परिसर में प्रार्थना के लिए प्रशासन की अनुमति अनिवार्य नहीं है। डीएम व एसएसपी की ओर से डिस्चार्ज अर्जी दाखिल की गई। साथ ही कोर्ट में घर के मालिक हसीन खान का बयान दर्ज किया गया। अनपढ़ हसीन खान ने कोर्ट को बताया कि वह अपने घर में परिवार के साथ नमाज पढ़ रहे थे, तभी पुलिस उसे उठा ले गई। ​उसे आरिफ प्रधान और मुख्तयार ने धमकाया कि यदि उसने कोर्ट में सच बोला तो उसके घर पर बुलडोजर चला दिया जाएगा। उसे जबरन गांव के बाहर ले जाकर पुलिस की मौजूदगी में सादे कागजों पर अंगूठा लगवाया गया।
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