Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    मुस्लिम भी नाबालिग की अभिरक्षा लें कानून का सहारा:हाईकोर्ट ने कहा- मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आने वाले राहत पाने के हकदार

    3 hours ago

    2

    0

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मुस्लिम कानून से शासित होने वाले पक्षकार भी अपने नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम का सहारा ले सकते हैं। न्यायमूर्ति अनिल कुमार की एकलपीठ ने श्रीमती रिजवाना द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अधिनियम एक सामान्य कानून है जो धर्म पर ध्यान दिए बिना सभी व्यक्तियों पर लागू होता है और मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आने वाले लोग भी इसके माध्यम से राहत पाने के हकदार हैं। रिजवाना दो बच्चों के लिए कोर्ट पहुंची थी मामले के तथ्यों के अनुसार, याची रिजवाना ने अपने दो नाबालिग बच्चों—10 वर्षीय अबू हसन और 5 वर्षीय कनीज फातिमा—की अभिरक्षा के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। याची का तर्क था कि मुस्लिम कानून के अनुसार सात वर्ष से कम आयु के बालक और नाबालिग लड़की की अभिरक्षा का अधिकार मां के पास होता है। चूंकि अधिनियम की धारा 6 के प्रावधानों के चलते मुस्लिम पक्षकारों पर 'संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम' प्रभावी नहीं होता, इसलिए अभिरक्षा का विवाद केवल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए ही तय किया जा सकता है। वर्ग, धर्म के व्यक्ति को अदालत जाने से नहीं रोकती कोर्ट ने कहा कि 'संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम' की धारा 6 किसी भी वर्ग ,धर्म के व्यक्ति को अदालत जाने से नहीं रोकती, बल्कि यह विभिन्न श्रेणियों के अभिभावकों को मान्यता देने का काम करती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 'अभिभावक' शब्द की परिभाषा काफी व्यापक है और इसमें बच्चे की 'अभिरक्षा का अधिकार भी शामिल है। कहा गया कि व्यक्तिगत कानून केवल अदालत का मार्गदर्शन कर सकते हैं, लेकिन अभिरक्षा तय करने का सबसे प्रमुख आधार बच्चे का कल्याण ही होता है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत परिवार न्यायालय को नाबालिगों की संरक्षकता और अभिरक्षा से जुड़े मामलों पर निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। कोर्ट ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका एक संक्षिप्त प्रक्रिया है, जिसमें साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन और बच्चों के कल्याण की गहन जांच संभव नहीं है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह उचित राहत के लिए सक्षम परिवार न्यायालय के समक्ष अपनी बात रखे।
    Click here to Read more
    Prev Article
    किसान की बेटी खुशबू रानी बनीं असिस्टेंट कमिश्नर:यूपीपीसीएस में 21वीं रैंक हासिल कर सोनभद्र का नाम किया रोशन
    Next Article
    उन्नाव गंगा पुल पर कार-डीसीएम में टक्कर, VIDEO:एक किलोमीटर लंबा जाम, एयरबैग खुलने से बचे लोग

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment