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    मृत व्यक्ति के नाम आयकर नोटिस जारी करना शून्य:हाईकोर्ट ने नोटिस, पुनर्मूल्यांकन आदेश रद्द किए; संसद को कानून सुधारने का सुझाव

    7 hours ago

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    इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके नाम आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत पुनर्मूल्यांकन का नोटिस जारी नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि मृत व्यक्ति के नाम जारी ऐसा नोटिस कानून की नजर में शून्य है। कोर्ट ने यह भी कहा कि बाद में कानूनी उत्तराधिकारी को कार्यवाही में शामिल कर देने से भी इस मूलभूत कानूनी त्रुटि को ठीक नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने मृतक के नाम जारी आयकर नोटिस के साथ-साथ उसके आधार पर की गई पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही और कर मांग को भी निरस्त कर दिया। न्यायालय ने कानून में मौजूद इस खामी को दूर करने के लिए संसद को आवश्यक संशोधन पर विचार करने का सुझाव दिया है। कोर्ट ने अपने निर्णय की प्रति केंद्रीय वित्त मंत्रालय को भेजने का भी निर्देश दिया। यह महत्वपूर्ण फैसला न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति एके चौधरी की खंडपीठ ने आशा दुबे की याचिका स्वीकार करते हुए सुनाया। पति की मौत के एक साल बाद भेजा गया नोटिस मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता आशा दुबे के पति संजय दुबे का जनवरी 2024 में निधन हो गया था। इसके बावजूद, आयकर विभाग ने मार्च 2025 में उनके नाम धारा 148 के तहत नोटिस जारी कर दिया। विभाग का आरोप था कि ओमैक्स समूह के ठिकानों पर हुई तलाशी के दौरान 27.44 लाख रुपये के कथित नकद लेनदेन का पता चला था। आरोप था कि यह रकम याची के पति ने फ्लैट खरीदने के लिए नकद भुगतान के रूप में दी थी। बाद में आयकर विभाग ने आशा दुबे को मृतक का कानूनी उत्तराधिकारी मानते हुए कार्यवाही आगे बढ़ाई और करीब 39.67 लाख रुपये की कर देयता तय कर दी। कोर्ट ने कहा- यह सिर्फ तकनीकी गलती नहीं इसके खिलाफ दाखिल याचिका में दलील दी गई कि जब नोटिस जारी किया गया, उस समय संबंधित व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी थी। इसलिए मृत व्यक्ति के नाम जारी नोटिस ही कानूनन वैध नहीं हो सकता। न्यायालय ने याची की दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि मृत व्यक्ति के नाम जारी नोटिस को बाद में कानूनी उत्तराधिकारी को पक्षकार बनाकर वैध नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि कार्यवाही की बुनियाद से जुड़ी मूलभूत कानूनी खामी है। न्यायालय ने यह भी कहा कि इस मामले ने आयकर कानून में ऐसी कमी को उजागर किया है, जिससे कर विभाग और सार्वजनिक राजस्व को नुकसान की संभावना बन सकती है। हालांकि, न्यायालय कानून में नए शब्द जोड़कर या उसके दायरे का विस्तार कर इस कमी को दूर नहीं कर सकता। कानून में संशोधन करना संसद का विशेषाधिकार है।
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