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    नसीमुद्दीन ने सपा जॉइन की, बोले- सत्ता बदलनी है:अखिलेश साथ लेकर ऑफिस पहुंचे; औवेसी की धार कुंद करने का पहला कदम

    3 hours ago

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    कभी बसपा के कद्दावर नेता रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने सपा का दामन थाम लिया है। अखिलेश यादव उन्हें साथ लेकर लखनऊ के सपा कार्यालय पहुंचे और पार्टी की सदस्यता दिलाई। इनके साथ 15758 लोग सपा से जॉइन की। नसीमुद्दीन ने कहा- मैं पार्टी में सबसे जूनियर हूं। सब मेरे सीनियर हैं। मैं किसी भी पार्टी में रहा, नेता आपको (अखिलेश) मानता था। आपने कभी भी हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई की बात नहीं की, सबकी बात की। फिर शायरी पढ़ी- हयात लेके चलो कायनात लेके चलो, चलो तो सारे जमाने को साथ लेके चलो.. नसीमुद्दीन ने 24 जनवरी को कांग्रेस से इस्तीफा दिया था। इसके बाद से ही उनके अगले कदम को लेकर अटकलें तेज थीं। माना जा रहा था कि वे चंद्रशेखर आजाद की पार्टी (आजाद समाज पार्टी) जॉइन करेंगे या फिर अपनी पार्टी बनाकर उससे समझौता करेंगे। हाल में उन्होंने चंद्रशेखर से मुलाकात भी की थी, लेकिन समीकरण बदले और बीते शुक्रवार को उन्होंने सपा जॉइन करने पर मुहर लगा दी। बसपा से राजनीति की शुरुआत करने वाले सिद्दीकी मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। वे यूपी में एक बड़े मुस्लिम चेहरे माने जाते हैं। आजम खान के जेल जाने के बाद सपा में उनके कद का कोई मुस्लिम चेहरा नहीं था, जिसकी भरपाई सपा नसीमुद्दीन के जरिए करना चाहती है। सपा ने क्यों खेला यह दांव 3 पॉइंट में समझिए 1- संदेश दिया—कौम की चिंता करने वाली सपा ही एकमात्र पार्टी सिद्दीकी पश्चिमी यूपी कांग्रेस के प्रांतीय अध्यक्ष भी रहे हैं। ऐसे में वहां के मुस्लिम वोटर्स में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। फिलहाल कांग्रेस के इमरान मसूद पश्चिमी यूपी में अधिक सक्रिय हैं। वह अक्सर सपा पर हमलावर रहते हैं। पश्चिमी यूपी में बसपा भी मुस्लिमों के बीच अपनी सक्रियता बढ़ा रही थी। ऐसे में सपा नसीमुद्दीन के जरिए इसकी काट करेगी। नसीमुद्दीन के माध्यम से सपा मुस्लिमों को यह संदेश भी देना चाहती है कि इस कौम की असली चिंता करने वाली वही एकमात्र पार्टी है। 2- एमआईएम की धार कुंद करने का प्रयास वरिष्ठ पत्रकार एजाज हसन कहते हैं कि सपा के खिलाफ एक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश होती है कि सपा मुखिया मुस्लिमों के बारे में कम बोलते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि यह वोट बैंक उनसे छिटकने वाला नहीं है। बिहार और महाराष्ट्र में एमआईएम की मजबूत होती मौजूदगी से सपा नेताओं में भी यह अंदेशा है कि कहीं यूपी में उनके मुख्य वोट बैंक में सेंध न लग जाए। ऐसे में अखिलेश यादव चुनाव से पहले मुस्लिम नेताओं को पार्टी जॉइन कराकर यह संदेश देने की कोशिश करेंगे कि मुस्लिम वोट बैंक पूरी तरह से उन्हीं के साथ है। इसे ओवैसी की पार्टी की धार कुंद करने के रूप में भी देखा जा रहा है। 3- बुंदेलखंड से पश्चिमी यूपी तक असर नसीमुद्दीन सिद्दीकी की पहचान एक बड़े नेता के रूप में रही है। ऐसे में उनके सपा में आने से बुंदेलखंड से लेकर पश्चिमी यूपी तक इसका असर पड़ेगा। पश्चिमी यूपी, जहां मुस्लिम बहुल आबादी है और एमआईएम अपनी पैठ जमाने की कोशिश कर रही है, वहां इसकी काट के तौर पर नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पेश किया जा सकता है। अब क्यों दिया कांग्रेस से इस्तीफा, जानिए लोकसभा चुनाव में नहीं मिली थी तवज्जो कांग्रेस में नसीमुद्दीन की भूमिका और प्रभाव को लेकर असंतोष चल रहा था। 2024 लोकसभा चुनाव में भी उन्हें तवज्जो नहीं मिली थी। 2027 विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ नसीमुद्दीन कांग्रेस में अपने भविष्य को लेकर परेशान थे। कांग्रेस में सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद का कद जिस तेजी से बढ़ा है, उनकी गिनती प्रियंका के खास सिपहसालारों में होती है। इससे भी सिद्दीकी खासा परेशान थे। बीते दिनों अमौसी एयरपोर्ट पर राहुल गांधी को रिसीव करने के दौरान प्रमोद तिवारी और आराधना मिश्रा सहित अन्य नेताओं के आगे उन्हें एंट्री नहीं मिली थी। 24 जनवरी को नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने इस्तीफा दिया। इसमें लिखा- मैं कांग्रेस में जातिवाद की लड़ाई लड़ने आया था। 8 साल से जमीन पर काम नहीं कर पाया। मुझमें जंग लग रही थी। मैं राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी का सम्मान करता हूं। आगे भी करता रहूंगा, लेकिन पार्टी में मेरे लिए कोई काम नहीं था। मैं कांग्रेस में इसलिए शामिल हुआ था कि संप्रदायवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ सकूं, लेकिन अब ऐसा नहीं हो पा रहा था। अजय राय ने मनाने की कोशिश की, लेकिन नहीं माने सूत्रों के मुताबिक, इस्तीफे के बाद कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय उन्हें मनाने की कोशिश में जुटे थे, लेकिन फिलहाल सिद्दीकी ने अपना निर्णय बदलने से साफ मना कर दिया। कयास लग रहे थे कि क्या वे किसी नई पार्टी में जाएंगे या निर्दलीय राजनीति करेंगे। एक चर्चा यह भी थी कि वह चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी में शामिल हो सकते हैं, लेकिन सिद्दीकी ने सारे कयासों पर विराम लगाते हुए सपा में शामिल होने का निर्णय लिया। कांग्रेस पर क्यों नहीं हमलावर, अब वजह सामने आई नसीमुद्दीन कांग्रेस पर हमलावर नहीं थे। यहां तक कि कांग्रेस नेता राहुल, प्रियंका और सोनिया गांधी की तस्वीरें तक उनके आवास पर टंगी हैं। इसके अलावा कांशीराम की तस्वीर भी उनके आवास पर टंगी है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा था कि उनकी मंशा कांग्रेस को कमजोर करने की नहीं रही। अब सपा में शामिल होने की खबरों के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि वे क्यों कांग्रेस पर नरम रहे। यूपी में सपा और कांग्रेस का गठबंधन है। 2027 के विधानसभा चुनाव में भी यह गठबंधन बना रहेगा, इसका संकेत दोनों पार्टियों के राष्ट्रीय नेताओं की ओर से दिया जा चुका है। ऐसे में नसीमुद्दीन पहले से ही सजग थे और ऐसी कोई टिप्पणी कांग्रेस के प्रति नहीं कर रहे थे, जिससे कांग्रेस मुद्दा बनाए। नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बारे में पढ़िए रेलवे ठेकेदार से शुरू हुआ था करियर उत्तर प्रदेश की सियासत में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का नाम लंबे समय से चर्चित रहा है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी का जन्म 4 जून 1959 को हुआ। परिवार में कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी। मां की बीमारी के चलते सेना की नौकरी छोड़ने के बाद वे रेलवे की ठेकेदारी में सक्रिय हुए। 1990 के आसपास नसीमुद्दीन बसपा संस्थापक कांशीराम के संपर्क में आए। शुरुआत पालिका (नगर पालिका) चुनाव से हुई। 1984 में बसपा में शामिल हुए। 1991 में पहली बार बांदा विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। वे बसपा के पहले मुस्लिम विधायक थे। बसपा सरकार में मिनी सीएम कहलाते थे बसपा की सभी सरकारों में वे मंत्री बने। साल 2007–2012 की बसपा सरकार में नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पास 18 मंत्रालय थे और उन्हें मिनी सीएम कहा जाता था। नसीमुद्दीन बसपा में बहन मायावती के सबसे करीबी लोगों में गिने जाते थे। टिकट बंटवारे से लेकर वित्तीय मामलों और पार्टी संगठन में उनका दखल रहता था। 2012–2017 तक वे विपक्ष के नेता भी रहे। 2017 में मायावती ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया था। इसके बाद उन्होंने नई पार्टी बना ली। फिर 2018 में कांग्रेस में शामिल हुए थे। पार्टी ने उन्हें मुस्लिम चेहरे के तौर पर प्रमोट किया था। अब विधानसभा चुनाव से एक साल पहले उन्होंने कांग्रेस को भी अलविदा कह दिया। 24 जनवरी को कांग्रेस से इस्तीफा देने वाले नसीमुद्दीन का अब नया सियासी घर सपा बनने जा रही है। 15 फरवरी को अखिलेश यादव की मोजूदगी में वे समर्थकों के साथ सपा की सदस्यता ग्रहण करेंगे।
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