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    Nepal Floods में 389 लोगों की मौत, 290 भारतीयों समेत 1400 से अधिक लापता

    1 hour ago

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    शिरीष बी. प्रधान काठमांडू, 27 अगस्त नेपाल और तिब्बत में अचानक आई भीषण बाढ़ में मरने वालों की संख्या बृहस्पतिवार को बढ़कर 389 हो गई। वहीं, बचावकर्मी 290 भारतीय नागरिकों समेत लापता सैकड़ों लोगों का पता लगाने के लिए युद्धस्तर पर जुटे हुए हैं। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हिमनद के टूटने से चट्टानें खिसक गई और हिमस्खलन हुआ, जिसके कारण बुधवार को पानी, कीचड़ और मलबे का तेज बहाव मध्य नेपाल की ओर आया।इससे कई कस्बे और गांव तबाह हो गए, मकान, वाहन, सड़कें एवं पुल बह गए तथा जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा। भोटे कोशी नदी प्रणाली के उद्गम के पास एक नयी अवरोध झील बनने के बाद निचले इलाकों में फिर बाढ़ आने का खतरा बना हुआ है। प्राधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि यह प्राकृतिक अवरोधक टूटता है तो नदी और उसके निचले इलाकों में पानी का तेज बहाव एक और बार आ सकता है।नेपाल के प्राधिकारियों ने 910 लोगों के लापता होने की जानकारी दी है। बचावकर्मी कीचड़ और मलबे से भरे नदी क्षेत्रों में उनकी तलाश कर रहे हैं तथा अपने परिजनों का पता लगाने के लिए बड़ी संख्या में लोग अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। अधिकारियों ने बताया कि तिब्बत में भी 558 लोग लापता हैं।इस तरह सीमा के दोनों ओर लापता लोगों की कुल संख्या 1,468 है। इस आपदा के बाद भारत ने भी अपने नागरिकों का पता लगाने के प्रयास तेज कर दिए हैं। विदेश मंत्रालय ने कहा कि 290 भारतीय नागरिकों से अब भी संपर्क नहीं हो पाया है।मंत्रालय ने कहा कि उनका पता लगाने और उन्हें बचाने के लिए ‘‘तत्काल प्रयास’’ किए जा रहे हैं। विदेश मंत्रालय ने बताया कि अब तक 84 भारतीय नागरिकों को बचाया गया है। इनमें निर्माणाधीन त्रिशूली-एक नदी प्रवाह आधारित जलविद्युत परियोजना में कार्यरत 63 श्रमिक और तमिलनाडु के 21 लोग शामिल हैं।मंत्रालय के अनुसार, तिब्बत की ओर मौजूद करीब 200 भारतीय नागरिकों ने वहां से सुरक्षित निकाले जाने के लिए सहायता मांगी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने काठमांडू और बीजिंग में भारत के राजदूतों के साथ डिजिटल माध्यम से एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद कहा कि बाढ़ प्रभावित इलाकों में मौजूद भारतीयों की स्थिति और उनकी कुशलक्षेम का पता लगाने के लिए तत्काल प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मंत्रालय नेपाल के अधिकारियों, अन्य मंत्रालयों, राज्य सरकारों, टूर ऑपरेटरों और संबंधित प्राधिकारियों के साथ समन्वय कर रहा है।भारत ने नेपाल के लिए राहत सहायता भी बढ़ा दी है। बुधवार को 10 टन मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (एचएडीआर) सामग्री भेजने के बाद बृहस्पतिवार को एक सैन्य परिवहन विमान से 37.5 टन और एचएडीआर सामग्री, दवाएं एवं खाद्य सामग्री भेजी गई। इस तरह अब तक कुल 47.5 टन सहायता भेजी जा चुकी है।चीनी प्राधिकारियों के अनुमान के अनुसार, बृहस्पतिवार सुबह तक नयी अवरोधक झील में करीब 20 लाख घन मीटर पानी जमा हो चुका था और अगले तीन दिन में इसमें करीब 30 लाख घन मीटर और पानी आने की आशंका है। इससे प्राकृतिक अवरोध के टूटने को लेकर चिंता बढ़ गई है। यह झील छोचेन खोला और पुरेपु त्सांगपो नदियों के संगम के पास बनी है।ये नदियां तिब्बत से निकलती हैं और नेपाल में भोटे कोशी नदी तंत्र का हिस्सा बनती हैं। नेपाल के जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान विभाग ने कहा कि उसे चीनी प्राधिकारियों से इस झील के बारे में जानकारी मिली है और भोटे कोशी एवं त्रिशूली नदी क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बना हुआ है। विभाग ने लोगों से नदी किनारों से दूर रहने और सुरक्षित स्थानों पर रहने की अपील की है।यात्रियों, सुरक्षा कर्मियों और तलाश एवं बचाव दलों को भी सतर्क रहने की सलाह दी गई है। चीनी अधिकारी झील की स्थिति पर नजर रखे हुए हैं और संभावित बाढ़ का आकलन एवं जोखिम विश्लेषण कर रहे हैं। संचार और खोज उपकरणों से लैस चीन का एक बचाव दल ग्यिरोंग पहुंच गया है, ताकि नदी के ऊपरी हिस्से में बने अवरोध का आकलन किया जा सके।अधिकारियों को आशंका है कि इस अवरोध के कारण दूसरी आपदा आ सकती है तथा जारी बचाव अभियान और मुश्किल हो सकता है। नेपाल के सुरक्षाकर्मी अब तक प्रभावित जिलों से 800 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाल चुके हैं, जबकि हेलीकॉप्टर, ड्रोन और जमीनी दल अलग-थलग पड़ी बस्तियों, नदी किनारों और निचले इलाकों में तलाश अभियान चला रहे हैं। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास चट्टानों के खिसकने और हिमस्खलन तथा मलबे के तेज बहाव के बाद बाढ़ ने सबसे पहले राजधानी काठमांडू से करीब 160 किलोमीटर दूर रसुवा जिले में तबाही मचाई।पानी, कीचड़, चट्टानों और मलबे का तेज बहाव तिमुरे और रसुवागढ़ी समेत कई बस्तियों से होकर गुजरा और फिर भोटे कोशी एवं त्रिशूली नदी तंत्र के रास्ते निचले इलाकों की ओर बढ़ गया। नेपाल के प्राधिकारियों के शुरुआती आकलन और अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के संशोधित विश्लेषण में भूकंप के बजाय हिमनद के टूटने और मलबे के तेज बहाव को इस आपदा का कारण बताया गया है। बर्फ और चट्टानों का मलबा लेंडे नदी में गिरा, जिससे उसका प्रवाह अस्थायी रूप से रुक गया।बाद में प्राकृतिक अवरोध टूटने से पानी का तेज बहाव भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र के निचले इलाकों की ओर बढ़ गया। नेपाल के आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने कहा कि नेपाल-चीन सीमा के पास रसुवागढ़ी सीमावर्ती शहर से करीब 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में चट्टानों के खिसकने और हिमस्खलन के बाद लेंडे नदी में मलबे से भरी बाढ़ आई। उसने बताया कि यही बाढ़ बाद में तिमुरे से गुजरते हुए त्रिशूली नदी में पहुंची।यूएसजीएस ने बताया कि लंबी अवधि वाली भूकंपीय तरंगों के उसके विश्लेषण से पता चला कि जिस घटना को शुरुआत में 4.4 तीव्रता का भूकंप बताया गया था, वह वास्तव में हिमनद के टूटने और मलबे के बहाव से उत्पन्न हुई थी। अधिकारी तबाही के पूरे पैमाने का अब भी आकलन कर रहे हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने बृहस्पतिवार को नुवाकोट की बिदुर नगरपालिका का दौरा कर अचानक आई बाढ़ से प्रभावित इलाकों का जायजा लिया।इस बीच, चीन के प्रधानमंत्री ली क्विंग ने बृहस्पतिवार को बाढ़ प्रभावित ग्यिरोंग टाउनशिप का दौरा कर बचाव और राहत अभियान की समीक्षा की। चीन के सरकारी मीडिया के अनुसार, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की ‘वेस्टर्न थिएटर कमांड’ ने भी सैन्य बचाव अभियान में समन्वय के लिए प्रभावित इलाके में एक दल भेजा है। प्रभावित इलाकों से सामने आई तस्वीरों और वीडियो में तबाही का व्यापक मंजर दिखाई दिया।कई इमारतें बह गईं या कीचड़ और मलबे की मोटी परत के बीच खड़ी दिखाई दीं, वाहन मलबे में दब गए या बह गए, सड़कें टूट गईं और पुल बह गए। रसुवा और नुवाकोट जिलों में नदी किनारे की कई बस्तियां कीचड़, चट्टानों और मलबे से पट गई हैं। नेपाल के सड़क विभाग ने कहा कि नुवाकोट के बेत्रावती से रसुवागढ़ी के बीच 42 किलोमीटर लंबी पूरी सड़क कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त हो गई है और कई कंक्रीट के पुल बह गए हैं।नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीआरआरएमए) ने कहा कि बाढ़ से 35 सड़क पुल, 45 ‘सस्पेंशन’ (झूलानुमा) पुल और करीब 40 किलोमीटर सड़कें क्षतिग्रस्त हुई हैं, जिससे प्रभावित जिलों में आवागमन बुरी तरह बाधित हुआ है। त्रिशूली और देवीघाट जलविद्युत परियोजनाओं के साथ-साथ बिजली से जुड़े अन्य बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचा है। धादिंग में गलछी-बैरेनी सड़क को फिर से खोलने के प्रयास किए जा रहे हैं।रसुवा में अचानक आई बाढ़ के बाद यह सड़क बंद हो गई थी। यह मार्ग काठमांडू और नेपाल के अन्य हिस्सों के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है और क्षेत्रीय नाकेबंदी एवं आपदा राहत अभियानों के दौरान भारी और हल्के वाहनों की आवाजाही के लिए भी अहम है। व्यापक तबाही के कारण बचाव अभियान बेहद मुश्किल हो गया है।सुरक्षाकर्मी और स्थानीय अधिकारी भोटे कोशी और त्रिशूली नदियों में बहकर आए लोगों की तलाश में नदी किनारों और निचले इलाकों को खंगाल रहे हैं तथा शव बरामद कर रहे हैं। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने बृहस्पतिवार को अमेरिका, ब्रिटेन और कई अन्य देशों के शीर्ष अधिकारियों से फोन पर बातचीत की। खनाल के कार्यालय ने बताया कि इन देशों ने नेपाल के साथ एकजुटता जताई और तलाश एवं बचाव कार्यों में सरकार की मदद करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।नेपाल पुलिस के प्रवक्ता अबी नारायण काफले ने कहा कि चितवन से अब तक 132 शव बरामद किए गए हैं और यह बाढ़ प्रभावित जिलों में बरामद किए गए शवों की सबसे अधिक संख्या हैं। रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा, तनहूं और नवलपरासी जिलों से भी शव बरामद किए गए हैं। अधिकारियों ने बताया कि नेपाल सेना के कम से कम 44 कर्मी, नेपाल पुलिस के 28 कर्मी और सशस्त्र पुलिस बल के 13 कर्मी अब भी लापता हैं।जलविद्युत परियोजनाओं और सीमा शुल्क कार्यालयों में काम करने वाले करीब 160 लोगों के भी लापता होने की सूचना है। काठमांडू के त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल में अधिकारियों ने वहां लाए गए लोगों की सूची लगाई है, ताकि परिवार यह पता लगा सकें कि उनके परिजनों को बचाया गया है या उनका इलाज चल रहा है। मृतकों की तस्वीरें भी प्रदर्शित की गई हैं और लापता लोगों का विवरण दर्ज करने के लिए अलग काउंटर बनाए गए हैं।चितवन के भरतपुर अस्पताल में भी ऐसा ही दृश्य है, जहां लोग अपने परिजनों की तलाश कर रहे हैं। अधिकारियों को लगातार बढ़ती शवों की संख्या से निपटने में मुश्किल हो रही है और खबरों के अनुसार शवगृह में भी जगह कम पड़ रही है। अधिकारियों ने बृहस्पतिवार को रसुवा में फंसे 27 विदेशी पर्यटकों को बचाया।इनमें 11 भारतीय, चार दक्षिण कोरियाई, दो इतालवी और दो अमेरिकी नागरिक शामिल हैं। नेपाल पर्यटन बोर्ड के अनुसार, शेष आठ लोगों की राष्ट्रीयता की पुष्टि नहीं हो सकी है। नेपाल सेना ने उन्हें हेलीकॉप्टर से काठमांडू पहुंचाया।प्रभावित भारतीय पर्यटकों में से अधिकतर तिब्बत में कैलाश मानसरोवर या नेपाल के बागमती प्रांत में गोसाईंकुंड की यात्रा पर गए थे। यह आपदा हाल के कई वर्षों में नेपाल की संभवत: सबसे भीषण आपदाओं में से एक है। क्षतिग्रस्त सड़कों, बह चुके पुलों, कीचड़ और मलबे की मोटी परत तथा फिर बाढ़ आने के खतरे के कारण बचावकर्मी अब भी कुछ प्रभावित इलाकों तक नहीं पहुंच पाए हैं।
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