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    पॉक्सो केस में पिता समेत दो आरोपियों को बरी:लखनऊ कोर्ट बोली- संदेह से परे साबित नहीं कर पाया अभियोजन

    6 hours ago

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    लखनऊ की विशेष पॉक्सो अदालत ने बहुचर्चित नाबालिग यौन शोषण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी पिता और सह-अभियुक्त महिला को दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है और प्रस्तुत साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास पाए गए हैं। कोर्ट ने कहा-सिर्फ बयान के आधार पर नहीं हो सकता दोष सिद्ध विशेष न्यायाधीश ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल पीड़िता के मुख्य बयान और पॉक्सो एक्ट की धारा 29 के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में अभियोजन का दायित्व होता है कि वह आरोपों को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर संदेह से परे साबित करे, जिसे इस मामले में पूरा नहीं किया जा सका। डीपीओ रिपोर्ट में उत्पीड़न से इनकार, बयान की विश्वसनीयता पर उठे सवाल अदालत ने जिला प्रोबेशन अधिकारी (DPO) की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें पीड़िता ने पूछताछ के दौरान किसी भी प्रकार के शारीरिक, मानसिक या लैंगिक उत्पीड़न से इनकार किया था। इस तथ्य को अदालत ने महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि इससे पीड़िता के मुख्य बयान की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है। एफआईआर में देरी और घटनाक्रम पर कोर्ट ने जताई शंका निर्णय में कहा गया कि एफआईआर काफी देरी से दर्ज कराई गई और देरी का संतोषजनक कारण भी प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने यह भी माना कि सामान्यतः यौन अपराधों में सामाजिक दबाव के कारण देरी हो सकती है, लेकिन इस मामले की परिस्थितियां अलग हैं, जिससे संदेह की स्थिति उत्पन्न होती है। मां के जीवित रहते नहीं लगाया आरोप, कोर्ट ने माना अहम तथ्य अदालत ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि जब तक पीड़िता की मां जीवित थीं, तब तक उसने किसी भी प्रकार का आरोप नहीं लगाया। कोर्ट के अनुसार, यदि इस प्रकार का गंभीर उत्पीड़न होता, तो पीड़िता अपनी मां या अन्य करीबी परिजनों को इसकी जानकारी जरूर देती। बयानों में लगातार बदलाव, साक्ष्यों में गंभीर विसंगतियां फैसले में कहा गया कि पीड़िता के बयानों में समय-समय पर बदलाव और सुधार किए गए, जिससे उनकी स्वाभाविकता प्रभावित हुई। अदालत ने इसे अभियोजन के लिए कमजोर कड़ी माना और कहा कि ऐसे विरोधाभासी बयानों के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। विवेचना और साक्ष्य पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल न्यायालय ने विवेचना अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि कई महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच नहीं की गई। साथ ही, सह-अभियुक्त महिला के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जा सका, जिससे अभियोजन का पक्ष और कमजोर हुआ। 302 केस के बाद दर्ज हुई एफआईआर, साजिश की आशंका पर विचार अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पीड़िता के खिलाफ पहले से दर्ज एक दोहरे हत्याकांड (धारा 302) के बाद यह एफआईआर दर्ज कराई गई। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए अदालत ने माना कि मामले में द्वेष या अन्य कारणों से आरोप लगाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ, जमानत बंधपत्र निरस्त एडवोकेट प्रयांशु अग्रवाल ने बताया कि अदालत ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में विफल रहा है, इसलिए आरोपी राजेश दत्त बाजपेयी और पिंकी तिवारी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया जाता है। साथ ही, दोनों के जमानत बंधपत्र निरस्त कर दिए गए हैं और उन्हें कानूनी दायित्वों से मुक्त कर दिया गया है।
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