Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    प्रोजेक्ट ब्रीद: हवा से वायरस और एलर्जी पकड़ने वाली तकनीक:बीमारियों से खुद लड़ेंगी इमारतें; सेंसर की भनक लगते ही घर-ऑफिस में खत्म हो जाएंगे वायरस

    21 hours ago

    1

    0

    कोरोना ने हमें सिखाया कि खुली हवा जितनी ही अहम बंद कमरों की हवा भी है। इसी सबक को ध्यान में रखते हुए, अब वैज्ञानिक ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जिससे इमारतें इंसानी शरीर की तरह खुद ही हवा में मौजूद बीमारियों से लड़ सकेंगी। अमेरिकी सरकार की एजेंसी एआरपीए-एच (एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी फॉर हेल्थ) इसे हकीकत में बदलने के लिए 1250 करोड़ रुपए खर्च कर रही है। इस प्रोजेक्ट को ‘ब्रीद’ नाम दिया गया है। फिलहाल हवा में मौजूद बैक्टीरिया या वायरस की जांच करने में लैब को कई घंटे या दिन लग जाते हैं। तब तक संक्रमण फैल चुका होता है। वर्जीनिया टेक यूनिवर्सिटी की पर्यावरण इंजीनियर डॉ. लिंसी मार ने ऐसा सेंसर बनाया है, जो ‘रियल-टाइम’ में हवा में मौजूद खतरनाक कणों को पहचान लेता है।हाल ही में इस प्रोजेक्ट के डेमो में दिखाया गया कि सेंसर ने हवा में मौजूद ‘डस्ट माइट’ (अस्थमा बढ़ाने वाले धूल के कणों में मौजूद बारीक जीव) को तुरंत पकड़ लिया। यह सेंसर फिलहाल कोरोना वायरस, इन्फ्लूएंजा और ई-कोलाई सहित 10 तरह के पैथोजन्स (रोगजनकों) को पहचान सकता है। वैज्ञानिक जल्द ही इसकी क्षमता बढ़ाकर 25 और आगे चलकर 100 पैथोजन्स तक करने में जुटे हैं। हालांकि, कुछ वैज्ञानिक इस तकनीक को थोड़ा पेचीदा और खर्चीला मान रहे हैं। इटली के इंजीनियर जियोर्जियो बुओनान्नों का कहना है कि सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड सेंसर लगाना और वेंटिलेशन सुधारना ज्यादा व्यावहारिक है। इस प्रोजेक्ट से जुड़े एरोबायोलॉजिस्ट जोशुआ सेंटार्पिया का मानना है कि बड़े बदलावों के लिए बड़े कदम उठाने पड़ते हैं। उन्होंने कहा, ‘हमें सिर्फ ज्यादा डाक (चिठ्ठियां) भेजने से इंटरनेट नहीं मिला, उसके लिए नई खोज करनी पड़ी।’ इस तकनीक का पहला वास्तविक परीक्षण 2028 में वॉल्टर रीड नेशनल मिलिट्री मेडिकल सेंटर और अमेरिका के कुछ डे-केयर सेंटर्स में किया जाएगा। इसकी सटीकता के बाद भविष्य में हमारे घर, स्कूल और दफ्तर सिर्फ कंक्रीट के ढांचे नहीं, बल्कि बीमारियों के खिलाफ सुरक्षा कवच बन जाएंगे। फायर अलार्म और स्प्रिंकलर की तरह काम करती है तकनीक प्रोजे​क्ट की प्रोग्राम मैनेजर डॉ. जेसिका ग्रीन कहती हैं, ‘यह तकनीक बिल्डिंग में लगे फायर अलार्म और स्प्रिंकलर की तरह काम करती है। सेंसर को हवा में वायरस या एलर्जी बढ़ाने वाले तत्व की भनक लगते ही बिल्डिंग का कंट्रोल सिस्टम सक्रिय हो जाएगा। ये सिस्टम अस्पताल व स्कूल में वायरस का पता चलते ही वेंटिलेशन में लगी यूवी लाइट और एयर फिल्टर चालू कर देंगे। डे-केयर के लिए सॉफ्टवेयर अनुमान लगाएगा कि हवा किस कमरे से कहां बह रही है और खतरा बढ़ते ही बाहर की ताजी हवा अंदर भेजना शुरू कर देगा। हमारा लक्ष्य इमारतों को इस तरह तैयार करना है कि वे सांस संबंधी बीमारियों को 25% तक घटा सकें।
    Click here to Read more
    Prev Article
    मेटा, अमेजन जैसी कंपनियों में एआई का उपयोग सीमित:तेजी से आ रहे नए मॉडल महंगे होने से बढ़ा खर्च; उपयोग को लेकर बढ़ी अनिश्चितता
    Next Article
    AI टीचर्स के लिए चुनौती,असाइनमेंट में जानबूझकर गलतियां:एआई पकड़ने वाले टूल्स ही सिखा रहे बचने के तरीके; अब हार्वर्ड में होगी मौखिक परीक्षा

    Related साइंस & टेक्नॉलजी Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment