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    राहुल-अखिलेश जोड़ी की काट निकालने लखनऊ आ रहे अमित शाह:सीट बंटवारा बड़ी चुनौती; 2027 के लिए क्या होगी स्ट्रैटजी

    15 hours ago

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    विधानसभा चुनावों को लेकर अमित शाह की एक सेट रणनीति रही है। वे चुनाव से 4 से 6 महीने पहले एक्टिव होते हैं और भाजपा के खिलाफ चल रही हवा को पलटकर रख देते हैं। हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और हालिया पश्चिम बंगाल इसके उदाहरण हैं। यूपी विधानसभा चुनाव में करीब 4 महीने बाकी हैं। राहुल-अखिलेश की जोड़ी ने इस चुनाव को मुश्किल बना दिया है। अब अमित शाह 30-31 अक्टूबर को लखनऊ आ रहे हैं। तो अमित शाह इस जोड़ी का तोड़ कैसे खोजेंगे? साथ ही सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने की कौन-सी जुगत लगाएंगे? आज इसे ही यूपी एक्सप्लेनर में समझेंगे… सवाल 1: अमित शाह सपा-कांग्रेस गठबंधन की काट कैसे निकालेंगे? जवाब: विपक्षी गठबंधन की काट के लिए 4 तरीके अपना सकते हैं… I) सपा-कांग्रेस में सिर फुटौव्वल का फायदा उठाना II) अखिलेश के PDA फॉर्मूले का जातिगत काउंटर III) 2017 का 'बूथ जिताओ' फॉर्मूला लागू करना IV) मुस्लिम तुष्टिकरण बनाम कानून-व्यवस्था सवाल 2: शाह टिकट कटने पर नाराज विधायकों को कैसे संभालेंगे? जवाब: भाजपा इस बार करीब 40% विधायकों के टिकट काट सकती है। ऐसे में बगावत और भीतरघात बढ़ जाएगा, लेकिन अमित शाह इसे संभालने में माहिर हैं। वे मुख्य रूप से 3 रणनीतियां अपनाते हैं… I) दिल्ली और लखनऊ में पद का एडवांस ऑफर II) अमित शाह की वन-टू-वन काउंसलिंग अमित शाह की सबसे बड़ी ताकत है उनकी सीधी और साफ बातचीत। टिकट कटने से नाराज नेता के साथ वे खुद बैठते हैं। उसके सामने IB, प्राईवेट एजेंसियों और संगठन की सर्वे रिपोर्ट रखते हैं। शाह समझाते हैं कि पार्टी का ‘लक्ष्य’ बड़ा है। अगर हम यह सीट नहीं जीते, तो विपक्ष मजबूत हो जाएगा। यह भावनात्मक और राजनीतिक दबाव अक्सर काम कर जाता है। III) नए उम्मीदवार के खर्च और जिम्मेदारी सौंपना सवाल 3: सहयोगी दलों को सीटों के बंटवारे पर कैसे राजी करेंगे? जवाब: ये भी एक बड़ा टास्क है। सहयोगी दल अपनी ताकत बढ़ाने के लिए ज्यादा सीटें मांग रहे हैं, जबकि भाजपा उन्हें 50 से 60 सीटों में समेटना चाहती है। सीट-शेयरिंग प्रेशर संभालने के लिए अमित शाह 2 फॉर्मूले अपनाते रहे हैं… I) सिंबल भाजपा का, चेहरा सहयोगी का II) स्ट्राइक रेट और वोट ट्रांसफर का हिसाब शाह पुराने परफॉर्मेंस के आधार पर सीट का बंटवारा करते हैं। वे याद दिलाते हैं कि भाजपा का एकमुश्त कैडर वोट भी सहयोगी को ट्रांसफर होता है, जिससे उनकी जीत आसान हो जाती है। 100 सीट लड़कर 20 जीतने से बेहतर है, 45 सीट लड़कर 35 जीती जाएं। राजनीति में इसी को 'स्ट्राइक रेट' बेहतर करना कहते हैं। सवाल 4: यूपी में सत्ता विरोधी लहर का मुकाबला करने के लिए क्या स्ट्रैटजी हो सकती है? जवाब: जब कोई सरकार लंबे समय तक सत्ता में रहती है, तो स्थानीय विधायकों, अधिकारियों और कुछ सरकारी फैसलों से जनता में नाराजगी पैदा हो जाती है। इसे ही सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इंकम्बेंसी) कहते हैं। यूपी में भाजपा 10 साल से सत्ता में है। ऐसे में ये 3 पॉइंट अहम होंगे… I) बड़े पैमाने पर विधायकों के टिकट काटना सत्ता विरोधी लहर का सबसे ज्यादा असर मुख्यमंत्री के बजाय स्थानीय विधायकों के खिलाफ होता है। जनता अपने विधायक के काम न करने या क्षेत्र में न आने से नाराज होती है। इस बार तय है कि भाजपा 40% विधायकों के टिकट काट सकती है। II) लाभार्थी वर्ग का एक नया साइलेंट वोट बैंक अमित शाह जातिगत राजनीति के एक कदम आगे बढ़कर 'लाभार्थी राजनीति' पर फोकस करते हैं। यूपी में करोड़ों परिवारों को केंद्र और राज्य सरकार की मुफ्त राशन, पीएम आवास, उज्ज्वला गैस कनेक्शन, आयुष्मान कार्ड और किसानों सम्मान निधि जैसी योजनाओं का फायदा मिला है। शाह कार्यकर्ताओं को टास्क देते हैं कि वे इन लाभार्थियों के घर-घर जाएं और उन्हें याद दिलाएं कि यह मदद मोदी-योगी सरकार ने भेजी है। III) स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय मुद्दों से दबाना अगर चुनाव नाली, खड़ंजे, बेरोजगारी पर लड़ा गया, तो भाजपा को नुकसान होगा, लेकिन अमित शाह चुनावी नैरेटिव (माहौल) पूरी तरह बदल देते हैं। चुनाव प्रचार में राष्ट्रवाद, राम मंदिर, काशी-मथुरा का विकास और सख्त कानून-व्यवस्था की तरफ मोड़ दिया जाता है। जब चुनाव गुंडाराज और मुस्लिम तुष्टिकरण पर आ जाता है, तो लोग स्थानीय स्तर की छोटी समस्याएं भूलकर भाजपा के पाले में लामबंद हो जाते हैं। ----------------------------------------------- ये एक्सप्लेनर भी पढ़ें… भाजपा को राजा भैया की जरूरत क्यों पड़ी: कुंडा में क्षत्रिय 6%, दलित 26% फिर भी 33 साल से विधायक; गठबंधन हुआ तो किसे फायदा राजा भैया और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की मुलाकात की खूब चर्चा हो रही है। इसे हालिया MLC चुनाव में समर्थन जुटाने से जोड़ा जा रहा है। राज्यसभा चुनाव या MLC चुनाव हो, राजा भैया बिना शर्त भाजपा को समर्थन देते रहे हैं। तो अचानक भाजपा को ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी कि खुद प्रदेश अध्यक्ष को राजा भैया से मिलने उनके घर जाना पड़ा? इस मुलाकात के मायने क्या हैं? पढ़िए यूपी एक्सप्लेनर में…
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