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    राहुल बोले-नेहरू जिंदा होते तो कांशीराम कांग्रेस के CM होते:यूपी में पहली बार कांशीराम जयंती से पहले कांग्रेस का मेगा इवेंट

    3 hours ago

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    कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा, राहुल गांधी जिंदाबाद करने से कोई फायदा नहीं है। इससे कुछ होता नहीं है। होता कैसे है, जो मन बना लेता है कि ये जो हो रहा है, उसे मैं एक्सेप्ट नहीं करने वाला हूं। भाषण देने से पहले मैं सोच रहा था कि आंबेडकर शिक्षा की बात करते थे। संगठित होने की बात करते थे। आज हम काशीराम को याद करते हैं। समाज में को 15 और 85 बांट दिया गया है। फायदा सिर्फ 15% वालों को मिल रहा है। 50% को अलग-अलग कर दिया गया। राहुल गांधी ने कहा कि जवाहरलाल नेहरू जिंदा होते तो कांशीराम उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर होते। इससे पहले एयरपोर्ट पर कांग्रेस के पदाधिकारियों ने उनका स्वागत किया। पहली बार है जब राहुल गांधी कांशीराम जयंती से 2 दिन पहले कोई बड़ा इवेंट लखनऊ में करने आए हैं। कार्यक्रम में करीब 4 हजार लोग शामिल हैं। दलित वोटर्स की सियासत में कांग्रेस का यह बड़ा कदम माना जा रहा है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सपा के साथ गठबंधन था, तब यूपी में NDA की सीटों की संख्या 36 पर सिमट गई थी। महागठबंधन 43 सीटों पर जीतने में कामयाब रहा। महागठबंधन इसी सफलता को 2027 के विधानसभा चुनाव में भी दोहराना चाहता है। सपा भी कांशीराम जयंती को PDA दिवस के रूप में मनाने का ऐलान कर चुकी है। यूपी के 75 जिलों में पार्टी के जिला मुख्यालयों पर 15 मार्च को कार्यक्रम होंगे। 3 तस्वीरें देखिए… यूपी में कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां हैं। दलित राजनीति में बसपा का प्रभाव अब भी बरकरार है, खासकर जाटव समुदाय में उसका भावनात्‍मक जुड़ाव मजबूत है। दूसरी ओर, भाजपा ने भी पिछले 10 बरसों में दलित वर्गों के बीच संगठन मजबूत किया है और सरकारी योजनाओं के जरिये समर्थन बढ़ाया है, इसलिए कांग्रेस के लिए इस वोट बैंक में बड़ी जगह बनाना आसान नहीं है। बसपा-भाजपा के दबाव में, इसका दूसरी पार्टियों को फायदा वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- मौजूदा समय में बसपा सबसे कमजोर हालत में है। लोकसभा में उसका कोई भी सदस्य नहीं। यूपी के विधानसभा में मात्र एक विधायक है। राज्यसभा में भी दिसंबर के बाद उसके जीरो होने का आसार हैं। सपा-कांग्रेस दोनों ही पार्टियों को लगता है कि कमजोर बसपा का वो विकल्प बन सकती हैं। दोनों पार्टियां बसपा को भले ही कमजोर कहने से बचती हैं, लेकिन मायावती पर भाजपा के दबाव में काम करने के आरोप लगाकर इसी कमजोरी को उजागर करने की कोशिश करती हैं। क्या बसपा वाकई कमजोर है? हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- ऐसा नहीं है। मायावती भले ही खुद बहुत ज्यादा नहीं निकलती हों, लेकिन उनका संगठन जमीनी स्तर पर सक्रिय है। पार्टी के कोऑर्डिनेटर खामोशी से संगठन का काम कर रहे हैं। 9 अक्टूबर, 2025 को लखनऊ में कांशीराम की पुण्यतिथि पर उमड़ी लाखों की भीड़ इसकी बानगी भी है। बसपा का कोर वोटर्स फिर तेजी से जुड़ रहा। राहुल के कार्यक्रम से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग पढ़िए…
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