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    Reservation पर Supreme Court का बड़ा सवाल, पिछड़े वर्गों के Creamy Layer को आरक्षण क्यों?

    11 hours ago

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     उच्चतम न्यायालय ने पिछड़े वर्गों के भीतर आर्थिक और शैक्षिक रूप से उन्नत परिवारों के बच्चों को आरक्षण का लाभ लगातार दिए जाने पर सवाल उठाते हुए शुक्रवार को कहा कि शैक्षिक और आर्थिक सशक्तीकरण के साथ-साथ सामाजिक गतिशीलता भी आती है। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें याचिकाकर्ता को आरक्षण से बाहर रखने के फैसले को सही ठहराया गया था। याचिकाकर्ता के माता-पिता दोनों ही राज्य सरकार के कर्मचारी हैं। पीठ ने इस मामले में नोटिस जारी करते हुए कहा, ‘‘अगर माता-पिता दोनों ही आईएएस अधिकारी हैं, तो उन्हें आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? शैक्षिक और आर्थिक सशक्तीकरण के साथ-साथ सामाजिक गतिशीलता भी आती है।’’ उसने कहा, ‘‘तो फिर, अगर ऐसे बच्चों के लिए भी आरक्षण की मांग की जाती रही, तो हम इस चक्र से कभी बाहर नहीं निकल पाएंगे।’’ उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की कि अगर छात्रों के माता-पिता अच्छी नौकरियों में हैं और उनकी आय भी अच्छी-खासी है, तो ऐसे बच्चों को आरक्षण के दायरे से बाहर हो जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि सरकार द्वारा जारी किए गए कई आदेशों में पहले से ही यह प्रावधान है कि ऐसे समृद्ध वर्गों को आरक्षण के लाभों से बाहर रखा जाए, लेकिन अब उन आदेशों को ही चुनौती दी जा रही है। पीठ ने कहा, ‘‘आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) और वंचित समूहों के मामले में, सामाजिक पिछड़ापन नहीं होता, बल्कि केवल आर्थिक पिछड़ापन होता है। इसलिए, इस मामले में किसी न किसी तरह का संतुलन होना चाहिए।’’ याचिकाकर्ता को आरक्षित श्रेणी के तहत कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड में सहायक अभियंता (विद्युत) के पद पर नियुक्ति के लिए चुना गया था। हालांकि, जिला जाति और आय सत्यापन समिति ने यह निष्कर्ष निकालते हुए कि वह क्रीमी लेयर के अंतर्गत आता है, उसे जाति वैधता प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया। अधिकारियों ने पाया कि माता-पिता दोनों सरकारी कर्मचारी हैं और उनकी संयुक्त आय निर्धारित क्रीमी लेयर की सीमा से अधिक थी। याचिकाकर्ता को क्रीमी लेयर में वर्गीकृत करने का आधार उसके माता-पिता की आय थी जो वेतनभोगी कर्मचारी हैं और कथित तौर पर उनकी संयुक्त आय 8,00,000 रुपये से अधिक थी। परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता को जारी किया गया जाति प्रमाण पत्र, जिसमें उसे कुरुबा समुदाय का बताया गया था, रद्द कर दिया गया।
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