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    स्पेन से 4,884-मील की दूरी तय करके काशी पहुंची माफलदा:कत्थक के जादू से श्रोताओं को झूमाया,बोले-शिव का दर्शन हुआ

    13 hours ago

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    विश्व की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली काशी के पावन गंगा घाटों पर आयोजित घाट संध्या कार्यक्रम में उस समय विशेष आकर्षण का माहौल बन गया, जब स्पेन से आईं नृत्यांगना माफलदा ने शास्त्रीय गीतों पर भावपूर्ण प्रस्तुति दी। विदेशी धरती से आई इस साधिका ने अपनी साधना और समर्पण से उपस्थित दर्शकों का मन मोह लिया। 20 वर्षों से कर रहीं हैं कत्थक की साधना माफलदा ने बताया कि वह पिछले 20 वर्षों से कथक का अभ्यास कर रही हैं। वर्ष 2004 में स्पेन में उन्होंने कत्थक सीखना शुरू किया और धीरे-धीरे यह नृत्य उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। उन्होंने कहा कि कत्थक उनके लिए केवल एक कला नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव है। उन्होंने बताया कि पिछले 10 वर्षों से वह काशी में रहकर अपने गुरु रविशंकर से प्रशिक्षण ले रही हैं। इससे पहले उन्होंने बेंगलुरु में माया राव तथा अहमदाबाद में भी कत्थक की शिक्षा ग्रहण की। गंगा तट पर प्रस्तुति को बताया सौभाग्य घाट संध्या में प्रस्तुति देने के बाद माफलदा ने कहा कि गंगा जी के समक्ष नृत्य करना उनके जीवन का अत्यंत शुभ और भावनात्मक क्षण है। उन्होंने कहा काशी में आकर मुझे शिव और गंगा के दिव्य स्वरूप का दर्शन हुआ। यहां की ऊर्जा अद्भुत है। इस पावन मंच पर प्रस्तुति देना मेरे लिए आशीर्वाद समान है। शास्त्रीय गीतों पर मनमोहक प्रस्तुति कार्यक्रम के दौरान माफलदा ने पारंपरिक शास्त्रीय गीतों पर भाव, ताल और लय के साथ आकर्षक प्रस्तुति दी। उनके पद संचालन, मुद्राएं और अभिव्यक्ति ने यह साबित कर दिया कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य की सीमाएं केवल भारत तक नहीं हैं, बल्कि इसकी गूंज विश्वभर में सुनाई देती है। उन्होंने शिव धुन पर विशेष नृत्य प्रस्तुत की। विदेशी श्रोताओं की भी रही उपस्थिति कार्यक्रम में विभिन्न देशों से आए विदेशी पर्यटक और श्रोता भी मौजूद रहे। उन्होंने भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का आनंद लिया। गंगा तट पर दीपों की रोशनी, मंत्रोच्चार और नृत्य की मोहक प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। स्पेन से आई माफलदा की प्रस्तुति ने यह सिद्ध कर दिया कि काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि विश्व संस्कृति का संगम है। यहां आकर विदेशी कलाकार भी भारतीय परंपरा में रच-बस जाते हैं।
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