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    शिक्षक समायोजन पर 19 फरवरी को हियरिंग:इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को लखनऊ बेंच रिव्यू करेगी, सुनवाई टली

    4 hours ago

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    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्राथमिक और कंपोजिट विद्यालयों में शिक्षकों के तीसरे चरण के समायोजन (समायोजन 3.0) को वैध ठहराते हुए 14 नवंबर 2025 के शासनादेश को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने 131 याचिकाओं को रूल 21 के तहत निस्तारित करते हुए कहा कि छात्र-शिक्षक अनुपात संतुलित करना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है और स्थानांतरण सेवा का सामान्य हिस्सा है। इस मामले में 17 फरवरी को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में सुनवाई हुई। जज ने कहा- इलाहाबाद बेंच के आदेश को पढ़ने के बाद अब 19 फरवरी को इस पर सुनवाई होगी। पहले अंतरिम रोक, फिर विस्तृत सुनवाई इससे पहले न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह की एकल पीठ ने अंतरिम रोक लगाई थी। 17 फरवरी को हुई सुनवाई के दौरान लखनऊ खंडपीठ ने बताया कि इलाहाबाद बेंच ने भी इस मामले में आदेश पारित किया है। आदेश का अध्ययन करने के बाद अगली सुनवाई 19 फरवरी 2026 तय की गई थी और तब तक अंतरिम रोक जारी रखी गई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि उन्हें राज्य सरकार की ओर से दाखिल जवाबी शपथपत्र प्राप्त हो गया है और उसका प्रत्युत्तर भी दाखिल कर दिया गया है। इसके बाद विस्तृत बहस के उपरांत न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की पीठ ने अंतिम फैसला सुनाते हुए सभी याचिकाएं निस्तारित कर दीं। क्या था पूरा विवाद राज्य सरकार ने 14 नवंबर 2025 को शासनादेश जारी कर प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों का पुनः समायोजन करने का निर्णय लिया था। सरकार का कहना था कि कई स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात (प्यूपिल-टीचर रेशियो) असंतुलित है। कुछ विद्यालय एकल शिक्षक के सहारे चल रहे हैं तो कहीं शिक्षक ही नहीं हैं। इसी आदेश को शिक्षकों ने चुनौती दी। उनका तर्क था कि जुलाई 2025 में स्थानांतरण प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, ऐसे में नवंबर में दोबारा समायोजन क्यों किया गया। शासनादेश में स्पष्ट प्रक्रिया का उल्लेख नहीं था और अलग-अलग जिलों में अलग तरीके अपनाए गए, जिससे अव्यवस्था की स्थिति बनी। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि “लास्ट कम, फर्स्ट गो” सिद्धांत का गलत इस्तेमाल किया गया, बिना सुनवाई ट्रांसफर कर दिए गए और सत्र के बीच में स्थानांतरण से पढ़ाई प्रभावित होगी। अंग्रेजी माध्यम के शिक्षकों को भी हटाए जाने पर आपत्ति जताई गई। सरकार ने क्या रखा पक्ष राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) के तहत प्रत्येक विद्यालय में न्यूनतम शिक्षक उपलब्ध कराना अनिवार्य है। संविधान के अनुच्छेद 21A के अनुसार बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देना राज्य का दायित्व है। सरकार ने कहा कि यदि किसी विद्यालय में केवल एक शिक्षक है या कोई शिक्षक नहीं है तो वहां शिक्षक भेजना जरूरी है। स्थानांतरण सेवा का सामान्य हिस्सा है और यह एक ही जिले के भीतर किए गए हैं। किसी शिक्षक को किसी एक विद्यालय में स्थायी रूप से बने रहने का कानूनी अधिकार नहीं है। कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां हाईकोर्ट ने कहा- 14 नवंबर 2025 का शासनादेश मनमाना या दुर्भावनापूर्ण नहीं है। यह शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अनुपालन के लिए जारी किया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही नियमों में जुलाई से पहले समीक्षा की बात कही गई हो, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर सरकार बाद में भी कार्रवाई कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि ट्रांसफर प्रशासनिक अधिकार है और जब तक आदेश कानून के विपरीत या दुर्भावना से प्रेरित न हो, न्यायालय उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा। कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में गठित जिला स्तरीय समिति को भी उचित माना। यदि किसी शिक्षक को व्यक्तिगत शिकायत है तो वह समिति के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि केवल व्यक्तिगत असुविधा या कठिनाई के आधार पर स्थानांतरण आदेश को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। ट्रांसफर आदेश बरकरार अंतिम फैसले में हाईकोर्ट ने 14.11.2025 के शासनादेश को वैध घोषित करते हुए ट्रांसफर आदेश रद्द करने से इनकार कर दिया। साथ ही शिक्षकों को व्यक्तिगत शिकायतों के निस्तारण के लिए जिला स्तरीय समिति में आवेदन करने की छूट दी गई है। फैसले से साफ हो गया है कि सरकार छात्र-शिक्षक अनुपात संतुलित करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती है और समायोजन 3.0 अब प्रशासनिक स्तर पर प्रभावी रहेगा।
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