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    श्रीराम-भरत का प्रेम आत्मा और परमात्मा के अद्वैत का प्रतीक:जगद्गुरु रत्नेश प्रपन्नाचार्य बोले- जहाँ प्रेम है, वहाँ शक्ति है,जहाँ समर्पण है, वहाँ मर्यादा

    11 hours ago

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    श्रीमद् वाल्मीकि रामायण कथा में पांचवें दिन जगद्गुरु रत्नेश प्रपन्नाचार्य ने कहा कि भगवान श्रीराम–लक्ष्मण का यह दिव्य स्नेह आज भी हमें स्मरण कराता है कि जहाँ प्रेम है, वहाँ शक्ति है।जहाँ समर्पण है, वहाँ मर्यादा है; और जहाँ राम हैं, वहाँ लक्ष्मण की अटूट सेवा अनिवार्य है। केवल राजपरिवार ही नहीं, समस्त नगरी आनन्द-विभोर हो उठी रामायण बेला में चल रही रामकथा में उन्होंने कहा कि अयोध्या की पुण्यधरा पर जब महाराज दशरथ के महल में परम तेजस्वी बालकों का किलकारियों से भरा जीवन आरम्भ हुआ, तब केवल राजपरिवार ही नहीं, समस्त नगरी आनन्द-विभोर हो उठी। उन बालकों में अग्रज के रूप में अवतीर्ण हुए मर्यादा के मूर्त स्वरूप श्रीराम और उनके अनन्य अनुज, सेवा और समर्पण की साक्षात् प्रतिमा लक्ष्मण। वे बिना राम के न तो अन्न ग्रहण करते, न निद्रा लेते कथा में यही मधुर प्रसंग सजीव हो उठता है—कैसे बालक राम की प्रत्येक क्रीड़ा में लक्ष्मण की छाया साथ रहती थी। बाल्यावस्था से ही लक्ष्मण का हृदय राम में ऐसा अनुरक्त था कि वे बिना राम के न तो अन्न ग्रहण करते, न निद्रा लेते। यह केवल भ्रातृ-स्नेह नहीं, आत्मा और परमात्मा के अद्वैत का प्रतीक है। राम अग्रणी और लक्ष्मण उनके अनुकरण में समर्पित दिखाई देते राजमहल के प्रांगण में जब चारों भाइयों की क्रीड़ा चलती, तब राम की गंभीर मधुर मुस्कान और लक्ष्मण की चंचल तत्परता अद्भुत दृश्य उपस्थित करती। कभी धनुष-बाण की खेल-रचना, कभी अश्वारोहण की बाल-लीला, तो कभी गुरुजनों के समीप बैठकर विनम्रता से शास्त्र-श्रवण—इन सबमें राम अग्रणी और लक्ष्मण उनके अनुकरण में समर्पित दिखाई देते। माता कौशल्या की गोद में राम की छवि जहाँ शीतल चन्द्रमा सी शान्ति देती, वहीं लक्ष्मण की दृष्टि निरंतर राम के मुखमण्डल पर टिकी रहती। मानो उनका समस्त अस्तित्व यही कह रहा हो—“मेरा जीवन आपके चरणों की सेवा के लिए है।” यह प्रेम किसी अपेक्षा पर आधारित नहीं, अपितु निष्काम भक्ति का प्रारम्भिक रूप है। वाल्मीकि रामायण में वर्णित यह बाल-प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम अधिकार नहीं, समर्पण मांगता है। राम और लक्ष्मण का संबंध केवल भ्रातृत्व का उदाहरण नहीं, आदर्श मानव-जीवन का पथ-प्रदर्शन है—जहाँ मर्यादा और सेवा साथ-साथ चलती हैं। पंचम दिवस की कथा का सार यही है कि बाल्यकाल की ये सरल क्रीड़ाएँ आगे चलकर धर्मसंस्थापन की महान भूमिका की तैयारी थीं। जिस प्रेम की नींव राजमहल की क्रीड़ाओं में पड़ी, वही वनवास में त्याग, संघर्ष और विजय का आधार बनी।
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