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    Shaurya Path: पुराने BMP की छुट्टी! युद्धभूमि में उतरेगा भारत का सबसे घातक योद्धा Future Infantry Combat Vehicle

    16 hours ago

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    भारतीय सेना अब पुराने और कमजोर पड़ चुके बख्तरबंद वाहनों के भरोसे नहीं है। भारतीय सेना तेजी से ऐसी घातक और आधुनिक युद्ध शक्ति में बदल रही है, जो दुश्मन को हर मोर्चे पर जवाब देने के लिए तैयार है। इसी बदलाव का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरा है भविष्य पैदल युद्धक वाहन कार्यक्रम, जिसके जरिए भारतीय सेना अपने पुराने बीएमपी बेडे की जगह नई पीढ़ी के अत्याधुनिक युद्धक वाहन उतारने जा रही है। करीब साठ हजार करोड़ रुपये की यह विशाल योजना केवल नए वाहन खरीदने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय सेना को और ज्यादा ताकतवर, तेज, आत्मनिर्भर और भविष्य के युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार बनाने का बड़ा अभियान है।हम आपको बता दें कि भारतीय सेना दशकों से बीएमपी दो और बीएमपी दो के सारथ संस्करणों पर निर्भर रही है। इन वाहनों ने अपने समय में सेना को तेज गति, आक्रामक हमला क्षमता और बख्तरबंद पैदल सेना की ताकत दी थी। लेकिन आज का युद्धक्षेत्र बदल चुका है। अब केवल टैंक और तोपें युद्ध नहीं जीततीं। अब आसमान में मंडराते ड्रोन, दूर से हमला करने वाली मिसाइलें, लक्ष्य खोजने वाली स्मार्ट गोला बारूद प्रणाली और सटीक मारक क्षमता वाले हथियार युद्ध का चेहरा तय कर रहे हैं। ऐसे में पुराने बीएमपी अब आधुनिक युद्ध में सैनिकों की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकते।देखा जाये तो भविष्य पैदल युद्धक वाहन को केवल सैनिक ढोने वाली मशीन नहीं माना जा रहा। यह ऐसा बख्तरबंद दानव होगा जो टैंकों के साथ सीधे मोर्चे पर लड़ेगा, दुश्मन की चौकियां तोड़ेगा और सैनिकों को गोलाबारी के बीच सुरक्षित पहुंचाएगा। लगभग बीस टन वजन वाले इस वाहन में छह सौ हॉर्स पावर का इंजन लगाया जाएगा, जिससे यह रेगिस्तान से लेकर ऊंचे पहाड़ी इलाकों तक तेज गति से संचालन कर सकेगा। सबसे अहम बात यह है कि यह वाहन नदियां और जल अवरोध पार करने में भी सक्षम होगा, जो भारतीय सेना की सामरिक जरूरतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।इस वाहन में चालक, निशानेबाज और कमांडर सहित तीन सदस्यीय दल होगा, जबकि आठ पूरी तरह हथियारबंद सैनिक इसमें सवार रह सकेंगे। इसकी मारक क्षमता भी बेहद घातक रखी जा रही है। तीस मिलीमीटर की स्वचालित तोप, सहायक मशीनगन, टैंक भेदी निर्देशित मिसाइलें और भविष्य में ड्रोन तथा मंडराते विस्फोटक हथियारों का उपयोग इसकी युद्ध क्षमता को कई गुना बढ़ा देगा। इसका मतलब साफ है कि भारत अब केवल रक्षा नहीं, बल्कि आक्रामक यांत्रिक युद्ध की तैयारी कर रहा है।इस पूरे कार्यक्रम की जड़ें उस ऐतिहासिक सोच में हैं जिसकी शुरुआत 1975 में गठित कृष्णा राव समिति से हुई थी। उसी समिति ने भारतीय सेना को अधिक यंत्रीकृत और तेज गति वाली शक्ति बनाने की सिफारिश की थी। इसके बाद 1989 में यंत्रीकृत पैदल सेना रेजिमेंट का गठन हुआ और फिर बीएमपी वाहनों का दौर शुरू हुआ। लेकिन दुनिया ने खाड़ी युद्ध में देख लिया कि सोवियत शैली के भारी संख्या वाले बख्तरबंद वाहन आधुनिक तकनीक के सामने किस तरह मिट्टी साबित हुए। इराक के बीएमपी वाहनों को पश्चिमी गठबंधन सेनाओं ने दूर से ही तबाह कर दिया। बेहतर दृष्टि प्रणाली, उन्नत अग्नि नियंत्रण और मजबूत सुरक्षा तकनीक ने पुराने बख्तरबंद सिद्धांतों की पोल खोल दी। भारत ने उसी समय समझ लिया था कि भविष्य का युद्ध केवल संख्या से नहीं, तकनीक से जीता जाएगा।देखा जाये तो भारत की चुनौती और भी गंभीर है क्योंकि उसे एक साथ पाकिस्तान और चीन दोनों मोर्चों पर तैयार रहना पड़ता है। लद्दाख की ऊंचाइयों पर युद्ध, राजस्थान के रेगिस्तान में तेज बख्तरबंद धावा और नदी वाले क्षेत्रों में गतिशील संचालन, हर क्षेत्र अलग प्रकार की सैन्य क्षमता मांगता है। इसी कारण भविष्य पैदल युद्धक वाहन को हर भूभाग में सक्षम बनाने पर जोर दिया जा रहा है।इसे भी पढ़ें: 22 मिनट, गहरा प्रहार... Army Chief ने खोला 'Operation Sindoor' का राज, इसे बताया Smart Strategyवैसे इस कार्यक्रम की असली नींव अभय परियोजना ने रखी थी। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने 1990 के दशक में अभय नाम से स्वदेशी पैदल युद्धक वाहन विकसित करने की शुरुआत की थी। भले ही वह परियोजना बड़े पैमाने पर सेना में शामिल नहीं हो सकी, लेकिन उसने भारत को बख्तरबंद तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा दे दी। अग्नि नियंत्रण प्रणाली, मिश्रित कवच, तापीय दृष्टि प्रणाली, जलगतिकीय निलंबन और अग्नि शमन तकनीक जैसी अनेक क्षमताएं इसी परियोजना से विकसित हुईं।अभय वाहन की मारक क्षमता अपने समय से आगे मानी जाती थी। इसमें चालीस मिलीमीटर की शक्तिशाली स्वचालित तोप लगाई गई थी जो कवच भेदी और विस्फोटक दोनों प्रकार के गोले दाग सकती थी। साथ ही टैंक भेदी मिसाइलें और स्वचालित ग्रेनेड प्रक्षेपक इसे बेहद घातक बनाते थे। सबसे खतरनाक बात यह थी कि इसका अग्नि नियंत्रण तंत्र चलते वाहन से भी सटीक निशाना लगाने में सक्षम था। यही तकनीक आज भविष्य पैदल युद्धक वाहन के लिए आधार बन चुकी है।देखा जाये तो जीवित रहने की क्षमता यानी सर्वाइवल अब आधुनिक युद्ध की सबसे बड़ी जरूरत है। अभय परियोजना में मिश्रित कवच, सिरेमिक सुरक्षा, टाइटेनियम परत और विस्फोट रोधी सुरक्षा प्रणाली विकसित की गई थी। इसके साथ अग्नि शमन प्रणाली, लेजर चेतावनी प्रणाली और परमाणु, जैविक तथा रासायनिक हमलों से बचाव की व्यवस्था भी जोड़ी गई। अब यही तकनीक अगले पीढ़ी के भारतीय बख्तरबंद वाहनों में और अधिक उन्नत रूप में दिखाई दे रही है।हम आपको बता दें कि हाल ही में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने उन्नत बख्तरबंद मंच नाम से नई पीढ़ी के वाहन प्रस्तुत किए हैं। इनका विकास टाटा और भारत फोर्ज जैसी भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर किया गया है। इन वाहनों में बिना चालक वाला बुर्ज लगाया गया है जिसमें तीस मिलीमीटर की तोप, मशीनगन और टैंक भेदी मिसाइलें मौजूद हैं। बिना चालक वाले बुर्ज का सबसे बड़ा फायदा यह है कि वाहन के भीतर अतिरिक्त जगह मिलती है, जहां सैनिक ड्रोन और मंडराते विस्फोटक हथियार लेकर चल सकते हैं। यह सीधे संकेत देता है कि भारतीय सेना भविष्य के ड्रोन युद्ध को केंद्र में रखकर तैयारी कर रही है।देखा जाये तो सामरिक दृष्टि से यह कार्यक्रम भारत के लिए बेहद निर्णायक है। यदि यह परियोजना सफल होती है तो भारत न केवल अपनी सेना को आधुनिक बनाएगा, बल्कि विदेशी हथियार निर्भरता की जंजीर भी तोड देगा। यही कारण है कि इस दौड़ में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र की कंपनियां उतर चुकी हैं। लार्सन एंड टुब्रो, टाटा, महिंद्रा और बख्तरबंद वाहन निगम जैसी कंपनियां इस परियोजना के लिए संघर्ष कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भूमिका भारत की आत्मनिर्भर सैन्य शक्ति की कुंजी बनेगी।अमेरिका के स्ट्राइकर जैसे विदेशी विकल्पों पर भी चर्चा हुई, लेकिन भारतीय सैन्य रणनीतिकारों ने साफ संकेत दे दिए कि भारत को ऐसा वाहन चाहिए जो उसकी भौगोलिक और युद्धक जरूरतों के अनुसार बना हो। जल अवरोध पार करने की क्षमता, ऊंचे इलाकों में संचालन और मिश्रित युद्ध परिस्थितियों में जीवित रहने की ताकत विदेशी वाहनों में सीमित मानी गई। इससे स्वदेशी मंचों के पक्ष में माहौल और मजबूत हुआ।बहरहाल, भविष्य पैदल युद्धक वाहन केवल सेना का नया हथियार नहीं है। यह भारत की उस आक्रामक सैन्य सोच का प्रतीक है जो अब रक्षात्मक ढांचे से बाहर निकल चुकी है। आने वाले समय में भारतीय सेना के टैंक, ड्रोन, तोपखाना और बख्तरबंद पैदल सेना एकीकृत डिजिटल युद्ध प्रणाली के रूप में काम करेंगे। युद्धक्षेत्र में निर्णय लेने की गति बढ़ेगी, दुश्मन पर हमला अधिक सटीक होगा और सैनिकों की सुरक्षा कई गुना मजबूत होगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत अब तकनीक आधारित, तेज, घातक और आत्मनिर्भर युद्ध शक्ति बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।
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