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    ट्रेड डील से कश्मीरी सेब बागानों पर मंडराया खतरा! Omar Abdullah बोले- अमेरिकी सेब आने से घटेगी कश्मीरी सेबों की माँग

    3 hours from now

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    भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते को लेकर जम्मू-कश्मीर के बागवानी क्षेत्र में गहरी बहस छिड़ गई है। एक ओर कई फल उत्पादक और व्यापारी इसे स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरा मान रहे हैं, वहीं कुछ किसान और कारोबारी इसे प्रतिस्पर्धा, गुणवत्ता सुधार और कीमतों में स्थिरता का अवसर भी बता रहे हैं। इस समझौते का असर खास तौर पर सेब, अखरोट और बादाम जैसे उत्पादों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है, जिन पर जम्मू कश्मीर की बड़ी आबादी की जीविका निर्भर है।बागवानी विभाग के अनुमान के अनुसार जम्मू कश्मीर में करीब बीस लाख लोग सीधे या परोक्ष रूप से बागवानी से अपनी रोजी रोटी कमाते हैं। ऐसे में आयात नीति में किसी भी बदलाव का असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गांवों की आय, रोजगार और सामाजिक ढांचे तक जाता है।इसे भी पढ़ें: Kashmir Security Review | आगामी महत्वपूर्ण आयोजनों से पहले सुरक्षा व्यवस्था सख्त, IGP VK Birdi ने की संयुक्त समीक्षा बैठकदक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले के अखरोट उत्पादक और व्यापारी जावेद अहमद लोन का नजरिया कुछ अलग है। उनका मानना है कि बाहरी उत्पादों का आना स्थानीय किसानों को अपनी गुणवत्ता बेहतर करने के लिए प्रेरित करेगा। उनके अनुसार संरक्षण की नीति लंबे समय तक किसानों को सुस्त बना देती है, क्योंकि उन्हें तय बाजार मिल जाता है। लोन कहते हैं कि कश्मीर में बादाम और अखरोट की कीमतें अक्सर बिना साफ कारण ऊपर नीचे होती रहती हैं, जिससे किसान और खरीदार दोनों असमंजस में रहते हैं। उनका तर्क है कि यदि अमेरिका से बेहतर गुणवत्ता के मेवे लगातार आएंगे तो स्थानीय दाम भी एक दायरे में रहेंगे और किसानों को छंटाई, पैकिंग और किस्म सुधार पर ध्यान देना होगा।हालांकि यह सोच पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करती। फल उत्पादक संगठनों के बड़े वर्ग में गहरी चिंता है। फल उगाने वालों और व्यापारियों की एक प्रमुख यूनियन के अध्यक्ष बशीर अहमद बशीर ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आयात शुल्क घटाने का विरोध किया है। उनका कहना है कि ईरान, अमेरिका और दूसरे देशों से सेब के आयात ने पहले ही छोटे किसानों पर दबाव डाला है। बढ़ती लागत, अनिश्चित मौसम, कीट हमले और परिवहन की दिक्कतों से बागवानी क्षेत्र पहले से वित्तीय दबाव में है। ऐसे में शुल्क में कमी ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकती है।बशीर की मांग है कि विदेशी सेबों पर सौ प्रतिशत से अधिक आयात शुल्क लगाया जाए ताकि कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के उत्पादक भारतीय बाजार में टिक सकें। उनका कहना है कि जब भी सस्ते आयातित सेब बाजार में आते हैं तो व्यापारी स्वाभाविक रूप से उन्हें तरजीह देते हैं, जिससे स्थानीय सेब का मूल्य गिरता है और किसानों को लागत निकालना भी कठिन हो जाता है।सोपोर फल मंडी, जो घाटी की सबसे बड़ी फल मंडी मानी जाती है, वहां के अध्यक्ष फैयाज अहमद मलिक भी इस समझौते को सेब उद्योग के लिए खराब खबर मानते हैं। उनके अनुसार अमेरिकी सेब बड़े पैमाने पर, उन्नत तकनीक और बेहतर भंडारण के साथ आते हैं, जिनसे स्थानीय किसान मुकाबला नहीं कर पाते। वे सरकार से इस नीति पर दोबारा विचार की मांग कर रहे हैं।राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा गर्म है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में इस विषय पर गंभीर चिंता जताई। उनका कहना है कि यदि सेब, अखरोट और बादाम जैसे उत्पादों का आयात निशुल्क या बहुत कम शुल्क पर होने लगा तो जम्मू कश्मीर के किसानों को सीधा नुकसान होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब यह क्षेत्र इन उत्पादों का प्रमुख उत्पादक है तो बाहरी माल को खुली इजाजत देना किस तरह स्थानीय हित में माना जा सकता है।कुछ अन्य विधायकों ने भी इसे कश्मीरी सेब उद्योग के लिए बड़ा झटका बताया है। वाम दल के नेता एमवाई तारिगामी ने कहा कि अलग अलग देशों के साथ हो रहे व्यापार करार कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सेब उद्योग के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर रहे हैं। पीडीपी के विधायक वहीद पर्रा ने बागवानी उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की मांग उठाई ताकि किसानों को दाम गिरने से सुरक्षा मिल सके।पीडीपी के प्रवक्ता मोहम्मद इकबाल ट्रंबू ने भी आशंका जताई कि यदि अमेरिकी कृषि उत्पादों पर जीरो शुल्क रहा तो स्थानीय सेब और अखरोट का भविष्य संकट में पड़ सकता है। उनका आरोप है कि समझौते करते समय जम्मू कश्मीर के बागवानी क्षेत्र की खास स्थिति पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।कुल मिलाकर भारत अमेरिका व्यापार समझौते ने कश्मीर की बागवानी अर्थव्यवस्था को लेकर एक अहम बहस शुरू कर दी है। एक पक्ष इसे सुधार और स्थिरता का अवसर मानता है, तो दूसरा पक्ष इसे आजीविका पर सीधा खतरा बता रहा है। आने वाले समय में सरकार की आयात नीति, शुल्क दरें और किसानों के लिए सहायक कदम तय करेंगे कि यह समझौता घाटी के बागों के लिए चुनौती बनता है या बदलाव का मौका।
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