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    दिल दिया है, जां भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए...:कव्वाल अनीस ने लखनऊ में दी परफॉर्मेंस, बोले- यह शहर कलाकारों से मोहब्बत करने वाला

    14 hours ago

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    लखनऊ में रविवार रात 'जश्न-ए-अदब' मंच सजा। इसमें कव्वाल अनीस ने समा बांध दिया। उन्होंने जब 'दिल दिया है, जां भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए...' गाया तो सुनने आए युवा थिरक उठे। 'कल्चरल कारवां–विरासत' की महफिल में परफॉर्मेंस देने के बाद कव्वाल अनीस ने कहा- यह शहर कलाकारों से मोहब्बत करने वाला है। कार्यक्रम में देशभर के कवियों, शायरों और कव्वालों ने हिस्सा लिया। कविताओं और शायरी में देशप्रेम के साथ सेना के शौर्य को बयान किया गया। साथ ही हास्य, व्यंग्य, गजल, गीत समेत विभिन्न रंग देखने को मिले। कार्यक्रम में कविता और शायरी की परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ समाज में आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक मूल्यों को भी मजबूत करने का संदेश दिया। कार्यक्रम की 4 तस्वीरें- 2 घंटे चली कव्वाली की महफिल प्रसिद्ध कव्वाल अनीस साबरी ने 2 घंटे तक लगातार कव्वाली और बॉलीवुड के गीत सुनाए। उन्होंने ‘काली-काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो…’, ‘दिल गलती कर बैठा है…’, ‘तू बोल कफारा क्या होग…’, ‘ना छेड़ो हमें, हम सताए हुए हैं…’ समेत एक दर्जन से ज्यादा बॉलीवुड के गीत और कव्वाली सुनाई। प्यारा है हिंदुस्तान हमारा, भारत का तिरंगा न झुका है न झुकेगा, जब गाया तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़हट से गूंजने लगा और सभी दर्शक खड़े होकर मंच के पास आकर नाचने लगे। लखनऊ कला का सम्मान करने वाला शहर अपनी परफॉर्मेंस के बाद अनीस ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। अनीस ने कहा- इस संसार को 25 साल से लगातार कव्वाली सुना रहा हूं। 7 साल की उम्र से गाना शुरू कर दिया था। मगर पूरे जितना प्यार लखनऊ में मिलता है उतना कहीं नहीं। इस शहर में कव्वाली गाने में इसलिए भी मजा आता है क्योंकि यहां के लोग शायरी को और उर्दू जुबान को बहुत अच्छे से समझते हैं। हमेशा इंतजार रहता है कि लखनऊ में प्रोग्राम कब होगा। शहर की खासियत है कि कलाकार को बहुत ध्यान से सुनते हैं। उम्मीद से ज्यादा मोहब्बत देते हैं। कवि सम्मेलन में पढ़े गए शेर… लोकेश त्रिपाठी ने कहा… चीज कोई नहीं, दूसरी चाहिए, बात जिसकी हुई थी, वही चाहिए आदर्श श्रीवास्तव ने पढ़ा … पत्थर को छू के पांव से इंसान कर दिया, मुश्किल था काम, आपने आसान कर दिया। उसके लबों से कट गए मेरे सभी गिले, उसकी तपिश ने खाक को लोबान कर दिया। सैय्यद नवाज कमर ने कहा… कब पूरे करूंगा मैं गजल तेरे तकाजे, होता ही नहीं खत्म ये दफ्तर का तमाशा। कुंवर रंजीत चौहान ने पढ़ा… दरिया तलाशना, कहीं सहरा तलाशना, मुश्किल है खुद के जैसी ही दुनिया तलाशना।
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