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    दालमंडी में सरकारी ध्वस्तीकरण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज:हाईकोर्ट ने कहा-किरायेदार परिसर को खाली कर दे तो उसका अधिकार खत्म

    2 hours ago

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    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी किरायेदार का अधिकार तभी तक रहता है जब तक वह किराया देता है, कब्जे में रहता है और बेदखली के आदेश का सामना करता है। यदि किरायेदार परिसर को खाली कर देता है तो उसका अधिकार समाप्त हो जाता है। उसे बेदखली नोटिस देना जरूरी नहीं है। वाराणसी के फरमान इलाही की याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति अजित कुमार तथा न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की है। याचिका में दालमंडी में सरकारी ध्वस्तीकरण को चुनौती दी गई थी। राज्य सरकार के पक्ष में निष्पादित बिक्री पत्र को चुनौती याची कुंडिगढ़ टोला दलमंडी स्थित मकान नंबर सीके 39/5 में किरायेदार था। उसने मकान मालिक शहनवाज खान पुत्र शमशुद्दीन खान द्वारा 27 दिसंबर 2025 को राज्य सरकार के पक्ष में निष्पादित बिक्री पत्र को चुनौती दी थी। उसका कहना था कि वह एससीसी रिवीजन नंबर 176 ऑफ 2024 में इस कोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम सुरक्षा के तहत आता है, जो जज स्मॉल कॉजेज ने 16 नवंबर 2024 को सूट नंबर 24 ऑफ 2017 में पारित बेदखली आदेश के खिलाफ दायर किया गया था। याची के अनुसार वह लैंड एक्विजिशन, रिहैबिलिटेशन एंड रीसेटलमेंट एक्ट, 2013 की धारा 2(10) के तहत "इंटरेस्टेड पर्सन" की परिभाषा में आता है। नोटिस देना जरूरी नहीं राज्य सरकार को भूमि अधिग्रहण करने से पहले उसे धारा 21 के तहत नोटिस देना था। राज्य सरकार की अधिवक्ता श्रुति मलविया ने कहा कि किरायेदार है और उसके पास संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है। इसलिए वह बिक्री पत्र को चुनौती नहीं दे सकता है, क्योंकि भूमिकर्ता को अपनी संपत्ति बेचने से कोई रोक नहीं है। सरकार ने यह भी कहा कि याची ने जानबूझकर आंशिक रूप से ध्वस्त की गई संपत्ति की तस्वीरें प्रस्तुत की हैं ताकि अंतरिम राहत प्राप्त की जा सके, जबकि वास्तव में संपत्ति पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी थी। तस्वीरों में कोई तिथि या समय नहीं है, इसलिए उन्हें विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। किरायेदार को अंतरिम सुरक्षा का कोई महत्व नहीं कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों को सुनने और रिकॉर्ड की जांच करने के बाद पाया कि राज्य सरकार ने वाराणसी शहर के दलमंडी क्षेत्र में सड़क को चौड़ा करने के लिए 30 जुलाई 2025 को आदेश जारी किया था। इसमें जमीन को स्वामियों के सहमति से खरीदने का प्रविधान था। शहनवाज खान जो घर के मालिक थे राज्यपाल के पक्ष में बिक्री पत्र निष्पादित किया और कब्जा सौंप दिया। परिसर खाली होने पर अधिकारियों ने इसे ध्वस्त कर दिया। याची ने बिक्री पत्र को चुनौती दी है। कोर्ट ने पाया कि याची यह नहीं बता सका है कि उसने अंतरिम आदेश का पालन किया था या नहीं और क्या उसे इसके उल्लंघन के कारण बेदखल किया गया था। कोर्ट ने कहा,ध्वस्तीकरण कब हुआ, यह तथ्यात्मक प्रश्न है जिसका निर्धारण उचित प्रक्रिया में किया जाना चाहिए, न कि रिट जुरिस्डिक्शन में। यदि संरचना ही ध्वस्त हो गई है तो किरायेदार को दी गई अंतरिम सुरक्षा का कोई महत्व नहीं है।
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