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    US Global Dominance | युद्ध से कैसे प्रॉफिट कमाता है अमेरिका |Teh Tak Chapter 2

    3 hours from now

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    बीआर चोपड़ा के निर्देशन में बनी महाभारत का वो दृश्य जिसमें योद्धा अपना सधा हुआ बड़े से बड़ा अस्त्र छोड़ता था और सामने वाला योद्धा उसकी काट में अपना अस्त्र। दोनों आसमान में जाकर एक दूसरे से टकराते। ज्यादा मारक वाले अस्त्र सामने वाले के अस्त्र को नष्ट कर देता। तकनीक के क्षेत्र में दुनिया काफी तरक्की कर रही है। इसी तरक्की के साथ हथियारों की रेस में भी अलग-अलग प्रयोग हो रहे हैं। 1991 में जब दुनिया में शीत युद्ध खत्म हुआ था तो लोगों को लगा था कि हथियारों की स्पर्धा खत्म हो जाएगी। उस वक्त किसी ने इस बात पर गौर नहीं किया कि शीत युद्ध तो खत्म हो गया है। लेकिन हथियारों को बनाने वाले उनकी फैक्ट्रियां और बाजार खत्म नहीं हुआ है। दुनिया की सबसे सुपर पावर अमेरिका जल, थल और वायु में सबसे खतरनाक हथियारों से सजी सेना है। दुनिया के सबसे घातक हथियारों से लैस अमेरिका एटम बम का भी इस्तेमाल कर चुका है। किसी को आश्चर्य नहीं कि संयुक्त राज्य अमेरिका किसी भी अन्य देश की तुलना में युद्ध पर अधिक पैसा कमाता है। दुनिया में चल रहे बड़े विवादविदेशी सरकारें अमेरिका से दो तरीकों से हथियार खरीद सकती हैं। पहला डायरेक्ट कंपनी से डील कर सकती है। ये तरीका कम पारदर्शी है और इसको लेकर बहुत कम जानकारी पबल्कि डोमेन में आती है। दूसरा तरीका होता है कि डिप्लोमैटिक चैनल्स के जरिए रिक्वेस्ट किया जाए। आम तौर पर सरकारें अपने देश में अमेरिकी दूतावास से संपर्क करती हैं और फिर उसके माध्यम से ऑर्डर दिए जाते हैं। एक दौर करने वाली बात ये है कि दोनों ही सूरतों में अमेरिकी सरकार की अनुमति अनिवार्य है। 2023 में अमेरिका से सबसे बड़ा रक्षा सौदा पोलैंड ने किया। उसने 1 लाख 90 हजार करोड़ रुपए देकर अपाचे हेलीकॉप्टर और रॉकेट लिए हैं। पोलैंड यूक्रेन की सीमा से सटा हुआ है। रूस यूक्रेन युद्ध के बाद उसकी सुरक्षा पर भी भारी संकट खड़ा हुआ। इसलिए वो अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ाने की चाह रखता है। पोलैंड एक उदाहरण है। जिन भी देश में तनाव की स्थिति बन रही है वहां हथियारों की रेस शुरू हो गई है। अमेरिका कैसे उठा रहा फायदारूस हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर रहा है। चीन, मिस्र और भारत उसके सबसे  बड़े खरीदारों में से हैं। यूक्रेन जंग के बाद रूस के ऊपर कई प्रतिबंध लगे हैं। उसके लिए  बुनियादी चीजें मंगाना महंगा और मुश्किल हो गया है। इसका सीधा असर हथियार उद्दोग पर भी पड़ा। उसकी उत्पादक क्षमता प्रभावित हो गई है और एक प्रमुख निर्यातक के रूप में रूस की भूमिका अब खतरे में है। अमेरिका इस स्पेस को भरने कि फिराक में है। वो इसका इस्तेमाल अपनी रक्षा उद्योग को मजबूत करने के लिए कर रहा है। लगातार बढ़ाया जा रहा डिफेंस बजटयूरोपीय देश भी तेजी से रक्षा बजट बढ़ा रहे हैं। आंकलनों में साफ बताया जा रहा है कि युद्ध की नौबत आने पर उनके हथियार कितनी जल्दी खत्म हो जाएगे। एक तरफ यूक्रेन को मदद भेजने की जरूरत और खुद के रक्षा को भी बढ़ाना है दूसरी तरफ चीन की इस युद्ध पर गहरी नजर है और वह अपने लिए जरूरी सबक ले रहा है जो ताइवान के मामले में काम आ सकते हैं। वहीं भारत की भी जरूरतें चीन के लिहाज से बढ़ रही है जिसमें आत्मनिर्भरता एक प्रमुख तत्व है।
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