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    वाराणसी-BHU के दो प्रोफेसर को आज मिलेगा पदम-पुरस्कार:डा. श्याम सुंदर और एसिड अटैक पीड़िता मंगला को अवार्ड देंगी राष्ट्रपति

    1 day ago

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    सरकार की ओर से 2026 के पद्म पुरस्कारों के लिए नामित बीएचयू के दो प्रोफसरों को आज राष्ट्रपति अलंकृत करेंगी। काशी को गौरवान्‍व‍ित करने वाले दोनों प्रोफेसरों को आज पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया जाएगा। राष्ट्रपति भवन में आज नागरिक अलंकरण समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सभी विजेताओं को सम्मानित करेंगी। इसमें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय आईएमएस के मेडिसिन विभाग में मानद प्रोफेसर प्रो. श्याम सुन्दर और संगीत की पूर्व प्रोफेसर मंगला कपूर को पदमश्री अवार्ड दिया जाएगा। प्रो. श्याम सुंदर को कालाजार के निदान और उपचार में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए इस बार पद्मश्री सम्‍मान जा रहा है। इसके पूर्व राष्ट्रपति द्वारा 'विजिटर पुरस्कार' और 'डा. पीएन राजू ओरेशन' सम्मान से सम्मानित किया गया है। बीएचयू के संगीत विभाग की पूर्व प्रोफेसर डॉ. मंगला कपूर को भी पदम श्री से नवाजा जाएगा। प्रोफेसर मंगला कपूर एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका, शिक्षाविद और एसिड अटैक सर्वाइवर हैं। 12 वर्ष की उम्र में हुए जानलेवा एसिड हमले और 36 सर्जरी के असहनीय दर्द को झेलने के बाद उन्होंने शिक्षा और संगीत को अपनी ढाल बनाया। सबसे पहले जानिए प्रो. श्याम सुंदर के बारे में बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान (IMS) के मेडिसिन विभाग में प्रसिद्ध प्रोफेसर श्याम सुंदर ने लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी की एक खुराक से कालाजार के उपचार की विधि विकसित की है, जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा मान्यता प्राप्त है। लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी को डब्ल्यूएचओ ने अनुमोदित किया। पेरेमोमाइसीन और मिल्टेफोसीन दवा भारत, नेपाल और बांग्लादेश समेत दुनिया भर में इस्तेमाल की जा रही है। प्रो. श्याम ने ही सबसे पहले आरके-39 स्ट्रीप जांच का परीक्षण किया था। संक्रामक रोगों विशेषकर कालाजार जैसे उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग के अनुसंधान का वैश्विक केंद्र स्थापित किया है। 2022 में एसोसिएशन ऑफ फिजिसियन्स ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रहे। उन्हें 2002 में रैनचेक्सी रिसर्च फाउंडेशन अवार्ड तथा वर्ष 2010 में स्विट्‌‌ज़रलैंड का एन्त्री मारेर केशिनी फाउंडेशन अवार्ड भी प्रदान किया गया है। 40 सालों तक लड़ाई के बाद खत्म हुई बीमारी 1980 में ‘कालाजार’ से जूझ रहे पूर्वांचल के लोगों की जान बचाने के लिए डॉक्टर श्याम सुंदर अग्रवाल ने काम शुरू किया। करीब 4 दशक यानी 40 सालों तक लम्बी मेहनत के बाद अब इस खतरनाक बीमारी को लगभग जड़ से खत्म किया जा सका। उन्होंने कालाजार जैसी खतरनाक बीमारी को डायग्नोज करने के लिए उन्होंने ऐसी तकनीक इजाद की, जिससे 10 मिनट में इसका पता लगाया जा सकता है। उस वक्त इस जांच के लिए 300 से 400 रुपये खर्च होते थे, लेकिन अब इस तकनीक के जरिए सिर्फ 50 रुपये खर्च होते हैं। इस बीमारी से बचाव के लिए टैबलेट भी बनाई जिसे साल 2002 में भारत सरकार ने एप्रूव्ड कर दिया। इसके पहले इस बीमारी के लिए इंजेक्शन का प्रयोग होता था, 2010 में उन्होंने इस बीमारी की सिंगल डोज दवा को भी तैयार किया, जिसके बाद काफी हद तक इस बीमारी के इलाज में मदद मिली। इस सिंगल डोज दवा के बाद कालाजार जैसी बीमारी में भी मरीज शाम को हॉस्पिटल आता और 10 मिनट में उसकी जांच और फिर इस दवा को देकर अगले दिन उसे छुट्टी मिल जाती है. उनकी इस तकनीक को साल 2014 में नेपाल और बांग्लादेश में भी अपनाया गया। मूलत: बिहार के निवासी डॉ. श्याम सुंदर अग्रवाल डॉ. श्याम सुंदर अग्रवाल मूलतः बिहार के मुज्जफरपुर के निवासी हैं। उनकी माने तो कभी भी अवॉर्ड के लिए काम नहीं किया बल्कि देश और अपनी जन्मभूमि के बारे में हमेशा सोचा। देश-विदेश में इसके पहले भी उन्हें कई अवॉर्ड मिले हैं लेकिन पदम अवार्ड हम सबका गौरव बढ़ाएगा। अब आइए जानते हैं कौन हैं प्रोफेसर मंगला बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संगीत विभाग की पूर्व प्रोफेसर डॉ. मंगला कपूर प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका, शिक्षाविद और एसिड अटैक सर्वाइवर हैं। 12 वर्ष की उम्र में हुए जानलेवा एसिड हमले और 36 सर्जरी के असहनीय दर्द को झेलने के बाद उन्होंने शिक्षा और संगीत को अपनी ढाल बनाया। उन्होंने बीएचयू से स्नातक, परास्नातक और पीएचडी पूरी की। इसके बाद वे उसी विश्वविद्यालय में संगीत की प्रोफेसर बनीं और लगभग 30 वर्षों तक संगीत शिक्षा का प्रसार किया। ग्वालियर घराने से प्रो. मंगला कपूर जुड़ी शास्त्रीय संगीत की शिक्षिका हैं। सेवानिवृत्ति (2019) के बाद भी डॉ. कपूर नि:शुल्क संगीत सिखाती हैं । संगीत में योगदान के लिए उन्हें 1982 में 'तरंग' संस्था की ओर से "काशी की लता" और राज्यसभा की ओर से रोल मॉडल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके संघर्ष, साहस और कला-शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की। 12 साल में परिवार की व्यापारिक रंजिश में फेंका गया तेजाब प्रो. मंगला कपूर ने अपनी जीवन यात्रा में बताया कि 12 साल की थी जब मुझ पर तेजाब फेंका गया, मेरी कोई गलती नहीं थी। बिजनेस की रंजिश में प्रतिद्वंदियों के इशारे पर मेरे नौकर ने ही मुझ पर तेजाब फेंका था। आज भी शरीर गलाने वाली तेजाब की घटना को याद करती हूं तो आंखों में आंसू आ जाते हैं। शरीर में सिहरन होने लगती है, छह साल तक इलाज चला। 6 साल मेरे लिए घुटन, अवसाद और कुढ़न में बीते। किसी से न मिलना और एक कमरे में सिकुड़े रहना जैसे मेरे जीवन का हिस्सा बन गया था। उनके जीवन पर आधारित "मंगला" नाम की एक मराठी फिल्म भी बनी है। पेरेंट्स ने दी हिम्मत की खुराक, फिर संगीत को बनाया वह बताती हैं कि- पिता जी की दी हुई हिम्मत को जुटाते हुए संगीत में ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और फिर पीएचडी की। इस समय तक घर की आर्थिक स्थिति भी बिगड़ चुकी थी। मुझे पैदल कॉलेज जाना पड़ता। पढ़ाई के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा। लोग मजाक बनाते थे, लेकिन पेरेंट्स ने इतनी हिम्मत दी कि आगे बढ़ पाई। संगीत को प्रोफेशन का हिस्सा इसलिए चुना, क्योंकि पिता जी सितार बजाते थे और मेरी आवाज भी अच्छी थी। बीएचयू में 30 साल पढ़ाया 1989 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में पढ़ाना शुरू किया और 30 साल विद्यार्थियों को संगीत पढ़ाया। वर्षों तक बीएचयू में पढ़ाने के साथ-साथ कई मौके मिले जहां मैं अपनी आवाज दूसरों को सुना सकती थी। संगीत मेरे जीवन की संजीवनी बना। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही एक बार एक मंदिर में लोगों ने मुझे भजन गाते हुए सुना और उसके बाद मुझे स्टेज परफॉर्मेंस मिलने लगीं। प्रोफेसर कपूर निशुल्क संगीत शिक्षा प्रदान करती हैं, जिससे वे समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास कर रही हैं।
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