Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    विधानसभा जिताने की ताकत रखने वालों को मिलेगा राज्यसभा टिकट:यूपी में भाजपा की 7 सीटें तय, सपा तीसरी सीट पर दांव खेलेगी

    4 hours ago

    1

    0

    देश में इन दिनों राज्यसभा चुनाव की चर्चा है। बिहार के सीएम नीतीश कुमार और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया है। यूपी में साल के अंत में राज्यसभा चुनाव होगा। लेकिन अभी से अटकलें शुरू हो गई हैं। सवाल उठने लगे हैं कि भाजपा अपने मौजूदा सदस्य एवं केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, बृजलाल, डॉ. दिनेश शर्मा, गीता शाक्य और नीरज शेखर जैसे दिग्गज नेताओं पर फिर दांव लगाएगी या नए चेहरे की तलाश करेगी। यूपी में कितनी सीटों पर राज्यसभा चुनाव होना है। चुनाव का गणित क्या है? किन नेताओं का दावा मजबूत है और क्यों? पढ़िए… राज्यसभा में यूपी कोटे की कुल 31 सीटें हैं। यूपी के 10 राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल इसी साल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है। यूपी में अक्टूबर-नवंबर में राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले होने वाले राज्यसभा चुनाव में भाजपा सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन बैठाते हुए प्रत्याशी तय करेगी। जानकार मानते हैं कि कुछ मौजूदा सदस्यों को फिर से मौका दिया जा सकता है, वहीं कुछ सदस्यों की जगह नए चेहरों को राज्यसभा भेजा जाएगा। चुनाव के बाद उच्च सदन में सपा की एक सीट बढ़ जाएगी, वहीं बसपा शून्य हो जाएगी। यूपी में राज्यसभा का गणित जानिए… भाजपा के सात और सपा के दो विधायकों की जीत तय यूपी विधानसभा में NDA के 290 विधायक हैं। इनमें भाजपा के 257, अपना दल (एस) के 13, राष्ट्रीय लोकदल के 9, सुभासपा के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायक हैं। समाजवादी पार्टी के 102, जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के 2, बसपा के एक विधायक हैं। जबकि तीन सीटें खाली हैं, लेकिन चुनाव तक तीनों सीटें भर जाएंगी। राज्यसभा चुनाव में एक सीट के लिए करीब 36 से 40 विधायकों के मत की आवश्यकता होगी। ऐसे में राज्यसभा की दस सीटों पर होने वाले चुनाव में भाजपा की सात और सपा की दो सीटों पर जीत तय है। सपा को तीसरी और भाजपा को आठवीं सीट के लिए संघर्ष करना होगा। बसपा का भविष्य बाकी पार्टियों के भरोसे लोकसभा के बाद अब राज्यसभा में भी बसपा की सदस्य संख्या शून्य हो जाएगी। बसपा की स्थापना के बाद से यह पहला अवसर होगा, जब संसद के दोनों सदनों में पार्टी का एक भी सदस्य नहीं रहेगा। बसपा के एक मात्र राज्यसभा सदस्य रामजी का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है। विधानसभा में बसपा के एक मात्र विधायक उमाशंकर सिंह हैं, जबकि राज्यसभा सदस्य चुनाव में नामांकन के लिए भी कम से कम दस सदस्यों का समर्थक और प्रस्तावक होना आवश्यक है। ऐसे में एक विधायक के भरोसे बसपा राज्यसभा चुनाव में नामांकन दाखिल करने के लिए भी पात्र नहीं होगी। भाजपा या सपा के समर्थन से बन सकती है बात राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं, आगामी राज्यसभा चुनाव में भाजपा या सपा के समर्थन से बसपा के उम्मीदवार नामांकन दाखिल कर सकते हैं। भाजपा यह भी रणनीति अपना सकती है कि वह सीधे तौर पर बसपा का समर्थन करने की जगह सहयोगी दलों और असंबद्ध विधायकों से समर्थन दिला सकती है, ताकि बसपा पर भाजपा की बी टीम होने का आरोप नहीं लगे। अब जानिए दावा किसका मजबूत और क्यों? बृजलाल हो सकते हैं रिपीट भाजपा के राज्यसभा सांसद और यूपी के पूर्व डीजीपी बृजलाल का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त होगा। बृजलाल भाजपा का दलित चेहरा हैं। दलितों और कानून व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर बृजलाल ही सपा और बसपा पर हमलावर होकर भाजपा का पक्ष रखते हैं। जानकार मानते हैं कि पार्टी उन्हें राज्यसभा जाने का एक मौका और दे सकती है। यदि राज्यसभा जाने का मौका नहीं दिया तो फिर उन्हें यूपी में एससी के लिए आरक्षित किसी सीट से विधानसभा चुनाव भी लड़ाया जा सकता है। ब्राह्मण चेहरे डॉ. दिनेश शर्मा भी मजबूत पूर्व डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा को राज्यसभा सदस्य हरद्वार दुबे के निधन से खाली हुई सीट पर राज्यसभा भेजा गया था। यूपी में इन दिनों ब्राह्मणों की नाराजगी का मुद्दा छाया हुआ है। बीते दिनों ब्राह्मण समाज की बैठक में डॉ. शर्मा को खुद यूजीसी के मुद्दे पर समाज की नाराजगी का सामना करना पड़ा था। जानकार बताते हैं कि डॉ. शर्मा बीजेपी के ब्राह्मण चेहरे हैं, इन दिनों लखनऊ के साथ पूरे प्रदेश में समाज में सक्रिय हैं। ऐसे में पार्टी डॉ. शर्मा को राज्यसभा जाने का एक मौका और देगी। एपस्टीन फाइल्स के बाद हरदीप पुरी पर संशय केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी दूसरी बार यूपी से राज्यसभा सदस्य हैं। उनके पास शहरी विकास के साथ पेट्रोलियम जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी है। हाल ही में उनका नाम एपस्टीन फाइल्स में भी नाम आया है। उससे पहले भी एक विवादित मामले में उनका नाम आया था। जानकार मानते हैं कि यदि आगामी समय में प्रस्तावित मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार में हरदीप सिंह को ड्राप किया गया तो उन्हें फिर राज्यसभा भी नहीं भेजा जाएगा। यदि उनका मंत्री पद बरकरार रहा तो नवंबर में हरदीप पुरी तीसरी बार यूपी से राज्यसभा जा सकते हैं। नीरज शेखर को मिल सकता है फिर मौका पूर्व पीएम चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति के दौरान राज्यसभा में आवश्यक बहुमत जुटाने के लिए सपा से भाजपा में शामिल कराया गया था। उसके बाद भाजपा ने एक बार 2020 में फिर उन्हें राज्यसभा भेजा। 2024 में उन्हें बलिया से चुनाव भी लड़ाया गया, लेकिन वह चुनाव हार गए। पूर्वांचल में नीरज शेखर और उनके परिवार का दबदबा है। संभावना है कि पार्टी उन्हें तीसरी बार फिर राज्यसभा भेज दे, एक संभावना विधानसभा चुनाव लड़ाने की भी है। शाह के करीबी बीएल वर्मा का राज्यसभा जाना तय केंद्रीय सहकारिता राज्यमंत्री बीएल वर्मा भी दूसरी बार राज्यसभा सदस्य हैं। वर्मा यूपी के बड़े लोधी नेता होने के साथ ही पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के करीबी हैं। वर्मा यूपी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद के भी प्रबल दावेदार थे। केंद्र सरकार में मंत्री होने के कारण उन्हें राज्यसभा भेजा जाना तय है। संगठन में गए तो अरुण सिंह का रिपीट होना मुश्किल अरुण सिंह बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। आगामी दिनों में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की नई टीम का गठन होना है। यदि अरुण सिंह महासचिव या उपाध्यक्ष पद पर नहीं नियुक्त होते हैं तो उन्हें फिर से राज्यसभा भेजा जा सकता है। गीता शाक्य की जगह किसी और को मिलेगा मौका महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष गीता शाक्य को मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते राज्यसभा भेजा गया था। उन्हें राज्यसभा भेजकर भाजपा ने महिला कोटे के साथ शाक्य समाज का कोटा भी पूरा किया था। जानकार मानते हैं कि राज्यसभा चुनाव तक महिला मोर्चा की नई प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति हो जाएगी। ऐसे में संभावना है कि गीता शाक्य की जगह किसी अन्य महिला को पार्टी राज्यसभा में भेज सकती है। सीमा द्विवेदी की जगह किसी और को मिल सकता है मौका जौनपुर की सीमा द्विवेदी को 2020 में राज्यसभा भेजा गया था। सीमा जौनपुर की गड़वारा विधानसभा सीट से विधायक भी रही हैं। बड़ी संभावना है कि मौजूदा राजनीतिक समीकरण में भाजपा उनकी जगह किसी अन्य महिला कार्यकर्ता को राज्यसभा जाने का मौका दे। विपक्ष और बसपा की स्थिति जानिए रामगोपाल यादव अखिलेश के भरोसेमंद, राज्यसभा जाना तय रामगोपाल यादव सपा के वरिष्ठ राष्ट्रीय महासचिव हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के सबसे करीबी और भरोसेमंद हैं। केंद्र सरकार और सपा के बीच सेतु की भूमिका भी अदा करते हैं। उनका राज्यसभा जाना तय है। रामजी गौतम का भविष्य मायावती के हाथ राज्यसभा में रामजी बसपा के एक मात्र सदस्य हैं। बसपा के पास राज्यसभा चुनाव में नामांकन दाखिल करने के लिए भी विधायक नहीं हैं। रामजी लाल गौतम का राजनीतिक भविष्य पार्टी की सुप्रीमो मायावती के हाथ है। मायावती ने यदि राज्यसभा चुनाव में भाजपा, एनडीए के सहयोगी दलों से समर्थन हासिल किया तो बसपा नामांकन दाखिल करने योग्य बनेगी। ऐसे में मायावती रामजी पर भी भरोसा जताती हैं या फिर कोई नया चेहरा लाती हैं यह उसी समय देखने को मिलेगा। राजनीति के जानकारों की नजर से जानिए… भाजपा और सपा के बीच होगा मुकाबला वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय का मानना है कि राज्यसभा चुनाव में सीधा मुकाबला भाजपा और सपा के बीच होगा। दोनों ही दल विधानसभा चुनाव सहित राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर ही प्रत्याशी तय करेंगे। जहां तक बसपा का सवाल है तो बसपा के पास नामांकन भरने लायक भी संख्या बल नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश बाजपेयी का कहना है कि बसपा राजनीति के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। ऐसा पहली बार होगा, जब बसपा के पास राज्यसभा चुनाव में नामांकन दाखिल करने के लिए भी संख्याबल नहीं होगा। विधान परिषद और लोकसभा में बसपा का एक भी सदस्य नहीं हैं। 25 नवंबर के बाद राज्यसभा में भी बसपा शून्य हो जाएगी। जहां तक भाजपा का सवाल है तो भाजपा आठ सीट जीतने में ताकत लगाएगी। ------------------ ये खबर भी पढ़ें… सपा का नारा PDA, 70% मुस्लिम-यादव जिलाध्यक्ष:अखिलेश को संगठन में क्यों किसी और पर भरोसा नहीं सपा 2022 में यूपी की सत्ता की दौड़ में पिछड़ने के बाद से PDA (पिछड़ा-दलित-मुस्लिम) का नारा दे रही है। 2024 में उसे इस नारे के बलबूते यूपी की 80 लोकसभा सीटों में 37 पर सफलता मिली। उसके साथ गठबंधन में लड़ी कांग्रेस के भी 6 सदस्य जीतने में सफल रहे थे। तब माना गया था कि सपा PDA को संगठन में आत्मसात कर राजनीति में नई लकीर खींचेगी। लेकिन, आज भी सपा के 97 जिलाध्यक्षों/महानगर अध्यक्षों में 70% यादव-मुस्लिम (M-Y) हैं। पढ़ें पूरी खबर
    Click here to Read more
    Prev Article
    यूपी में भीषण गर्मी पड़ने वाली है:2023 के बाद सबसे गर्म रहा मार्च का पहला सप्ताह; जल्द पारा 40 डिग्री तक जाएगा
    Next Article
    मेरठ में देर रात पुलिस ने हटाया व्यापारियों का धरना:आवास विकास के कार्यालय के सामने बैठ कर ध्वस्तीकरण का विरोध कर रहे थे सेंट्रल मार्केट के व्यापारी

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment