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    यूपी में एक दिन में लगेंगे 35 करोड़ पौधे:'एक पेड़ मां के नाम' अभियान पर जोर; नवग्रह और नक्षत्र वाटिकाओं से पारंपरिक संतुलन साध रही सरकार

    8 hours ago

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    कभी-कभी कुछ तिथियां केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि किसी व्यक्तित्व के जीवन-दर्शन से भी गहराई से जुड़ जाती हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं गोरखपुर स्थित गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ के साथ 5 जून का ऐसा ही विशेष संबंध है। यह वही दिन है जब पूरी दुनिया विश्व पर्यावरण दिवस मनाती है और संयोग से इसी दिन योगी आदित्यनाथ का जन्म भी हुआ था। शायद यही कारण है कि उनके सार्वजनिक जीवन में पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सतत सरोकार के रूप में दिखाई देता है। प्रकृति प्रेम और पर्यावरण का असर प्रकृति की गोद में बचपन 5 जून 1972 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जनपद के पंचुर गांव में जन्मे योगी आदित्यनाथ का बचपन प्राकृतिक रूप से समृद्ध देवभूमि के वातावरण में बीता। उनके पिता स्वर्गीय आनंद सिंह बिष्ट वन विभाग में रेंजर थे। पहाड़, जंगल, नदियां और वन्य जीवन से घिरे परिवेश ने उनके व्यक्तित्व में प्रकृति के प्रति सहज अनुराग विकसित किया। यही कारण है कि पर्यावरण के प्रति उनकी संवेदनशीलता राजनीतिक जीवन में भी निरंतर दिखाई देती है। मंदिर की हरित परंपरा को भी दिया विस्तार साल 1994 में गोरखपुर आगमन और नाथपंथ में दीक्षा के बाद उन्होंने गोरक्षपीठ की हरित परंपरा को और समृद्ध किया। लगभग 50 एकड़ में विस्तृत गोरखनाथ मंदिर परिसर की हरियाली, उद्यान, भीम सरोवर, स्वच्छ एवं पॉलिथीन मुक्त वातावरण इसकी स्पष्ट झलक प्रस्तुत करते हैं। पीठ के उत्तराधिकारी और बाद में पीठाधीश्वर बनने के बाद भी योगी आदित्यनाथ ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। गोशाला के गोबर से बनती है वर्मी कंपोस्ट, जल संरक्षण की भी व्यवस्था गोशाला में वर्मी कम्पोस्ट इकाई, जल संरक्षण के लिए आधुनिक सोख्ता प्रणाली तथा मंदिर में चढ़ने वाले फूलों से अगरबत्ती निर्माण जैसी पहलें पर्यावरण के प्रति उनकी व्यावहारिक सोच को दर्शाती हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद यूपी को हरित प्रदेश बनाने पर शुरू हुआ काम मुख्यमंत्री बनने के बाद बढ़ा हरित अभियान का दायरा साल 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद पर्यावरण संरक्षण उनकी सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हुआ। वृक्षारोपण, जैव विविधता संरक्षण, वेटलैंड विकास, वन्यजीव संरक्षण और ईको-टूरिज्म को लेकर राज्य स्तर पर कई महत्वाकांक्षी पहलें शुरू हुईं। प्रदेश के पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। दुधवा टाइगर रिजर्व को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। गोरखपुर, लखनऊ और कानपुर के प्राणि उद्यानों में बटरफ्लाई पार्क स्थापित किए गए। पहली बार ईको-टूरिज्म बोर्ड का गठन किया गया। महराजगंज में गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र स्थापित हुआ, जबकि लखनऊ के कुकरैल क्षेत्र में देश की पहली नाइट सफारी परियोजना पर कार्य जारी है। इटावा, रायबरेली, उन्नाव, गोंडा, हरदोई, आगरा, बिजनौर और संतकबीरनगर सहित अनेक जिलों में वेटलैंड संरक्षण की दिशा में भी विशेष प्रयास किए गए। वृक्षारोपण को बनाया जनांदोलन योगी सरकार की पर्यावरणीय पहलों में सबसे अधिक चर्चा वृक्षारोपण अभियान की रही है। वर्ष 2017 से लेकर 2025 तक विभिन्न अभियानों के माध्यम से उत्तर प्रदेश में 242 करोड़ से अधिक पौधे लगाए जाने का दावा किया गया है। सरकार के अनुसार इससे प्रदेश के वन एवं वृक्षावरण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट-2023 के अनुसार उत्तर प्रदेश में वन एवं वृक्षावरण में 559 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई, जो देश में सर्वाधिक वृद्धि वाले राज्यों में शामिल है। राज्य सरकार ने वर्ष 2030 तक प्रदेश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 15 प्रतिशत हिस्से को हरित आवरण के अंतर्गत लाने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जबकि दीर्घकालिक लक्ष्य वर्ष 2047 तक इसे 20 प्रतिशत तक पहुंचाने का है। वर्ष 2026 में भी उत्तर प्रदेश सरकार ने एक दिन में 35 करोड़ पौधे लगाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस अभियान को जनभागीदारी आधारित हरित आंदोलन का स्वरूप देने की रणनीति बनाई गई है। इसके तहत विद्यालयों, महाविद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों, ग्राम पंचायतों और विभिन्न विभागों को जोड़ा जा रहा है। "एक पेड़ मां के नाम" अभियान को भी इस वर्ष विशेष रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। सरकार का जोर केवल पौधारोपण पर नहीं, बल्कि उनके संरक्षण और संवर्धन पर भी है। केवल पौधारोपण नहीं, प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की सोच योगी आदित्यनाथ लगातार इस बात पर बल देते रहे हैं कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व भी है। इसी सोच के तहत नवग्रह वाटिका, नक्षत्र वाटिका, पंचवटी, अमृतवन, गंगावन तथा विरासत वृक्ष संरक्षण जैसी योजनाएं विकसित की गई हैं। बरगद, पीपल, पाकड़, नीम, बेल, आंवला, आम, कटहल और सहजन जैसे देशज पौधों को विशेष प्राथमिकता दी जा रही है। इन पहलों का उद्देश्य केवल हरित क्षेत्र बढ़ाना नहीं, बल्कि जैव विविधता और पारंपरिक पर्यावरणीय संतुलन को भी मजबूत करना है। विश्व पर्यावरण दिवस और योगी आदित्यनाथ के जन्मदिवस का यह संयोग केवल तिथि का मेल नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण के उस संदेश की भी याद दिलाता है जिसमें विकास और पर्यावरण को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे का पूरक माना गया है। क्यों जरूरी है पर्यावरण संरक्षण आज जब जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के सामने गंभीर चुनौती बनकर खड़ा है, तब पर्यावरण संरक्षण को जनांदोलन बनाने की सोच आने वाले समय की सबसे बड़ी आवश्यकता प्रतीत होती है। ऐसे समय में यह संयोग भी उल्लेखनीय लगता है कि जिस दिन दुनिया पर्यावरण बचाने का संकल्प दोहराती है, उसी दिन उत्तर प्रदेश का नेतृत्व कर रहा एक ऐसा व्यक्तित्व भी अपना जन्मदिन मनाता है, जिसकी सार्वजनिक पहचान में हरित विकास एक महत्वपूर्ण आयाम बन चुका है।
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