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    10 दिन बाद संत प्रेमानंद महाराज ने की पदयात्रा:पुराने मार्ग पर एक किलोमीटर पैदल चले, तबीयत बिगड़ने के बाद पदयात्रा बंद थी

    4 hours ago

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    मथुरा में संत प्रेमानंद महाराज जी एक बार फिर पदयात्रा पर निकले। संत प्रेमानंद महाराज अपने आश्रम केली कुंज से निकलकर NRI ग्रीन बिल्डिंग के सामने पहुंचे। यहां से उन्होंने अपने शिष्यों के साथ पदयात्रा शुरू की। संत प्रेमानंद महाराज ने यह पदयात्रा अपने पुराने मार्ग पर की। करीब एक किलोमीटर पदयात्रा कर वापस श्रीराधा केली कुंज आश्रम पहुंचे। पदयात्रा के दौरान सड़क पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। 17 मई से स्वास्थ्य कारणों के चलते उनकी पदयात्रा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई थी। अब संत प्रेमानंद महाराज ने दोबारा पदयात्रा की है। आश्रम के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भक्तिमार्ग पर पदयात्रा पुराने मार्ग पर शुरू होने की जानकारी दी गई है। लेकिन अभी यह तय नहीं है कि यात्रा आगे नियमित रूप से जारी रहेगी या नहीं। 17 मई से नहीं कर रहे पदयात्रा 17 मई यानी 10 दिन से प्रेमानंद महाराज की रात्रि पदयात्रा बंद थी। एकांतिक दर्शन और वार्तालाप भी नहीं हो रहा है। 17 मई की रात हजारों की संख्या में भक्त महाराज जी के दर्शन के लिए पहुंचे थे, लेकिन प्रेमानंदजी हर दिन की तरह तड़के 3 बजे पदयात्रा पर नहीं निकले। उनकी जगह उनके शिष्य पहुंचे थे। शिष्यों ने लाउडस्पीकर से अनाउंस कर बताया था- आप सभी से निवेदन है कि महाराजजी का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण आज से पदयात्रा रद्द की जा रही है। कृपया रोड किनारे खड़े होकर भीड़ न लगाएं। इसके बाद भक्तों को महाराजजी के दर्शन किए बिना मायूस लौटना पड़ा था। शिष्यों ने तब बताया था कि प्रेमानंद महाराज की तबीयत ठीक नहीं है। वह भक्तों से एकांतिक मुलाकात भी नहीं कर रहे हैं। प्रेमानंद महाराज की दोनों किडनी खराब हैं। उनकी हफ्ते में 2-3 बार डायलिसिस होती है। सौभरी वन तक कर रहे थे पदयात्रा संत प्रेमानंद महाराज 17 मई से पहले नियमित रूप से सौभरी वन तक पदयात्रा किया करते थे। तड़के करीब 3 बजे वह श्रीराधा केली कुंज आश्रम से निकलते और करीब डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर सुनरख खादर स्थित सौभरी वन पहुंचते थे। इस वन की देखरेख वन विभाग के अधीन है। सौभरी वन पहुंचने के बाद संत प्रेमानंद महाराज वहां बने कुंड के चारों ओर बैठे श्रद्धालुओं को दर्शन देते थे। इसके बाद वह वापस आश्रम लौटकर सत्संग करते थे। उनकी पदयात्रा के दौरान रास्ते में हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ पड़ते थे। आम दिनों में दर्शन करने वालों की संख्या करीब 20 हजार तक रहती थी, जबकि वीकेंड और बड़े पर्वों पर यह आंकड़ा लाखों तक पहुंच जाता था। हालांकि, बुधवार रात संत प्रेमानंद महाराज पुराने मार्ग पर स्थित NRI ग्रीन बिल्डिंग के सामने पहुंचे और वहीं से पदयात्रा कर भक्तों को दर्शन दिए। प्रेमानंदजी की अपील- मैं रहूं न रहूं, हमेशा साथ रहूंगा 24 मई को संत प्रेमानंद महाराज ने वीडियो जारी कर अपने शिष्यों और भक्तों से भावुक अपील की थी। 1 मिनट 19 सेकेंड का वीडियो रविवार को केली कुंज आश्रम ट्रस्ट के यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया गया था। इसमें संत प्रेमानंद महाराज ने कहा था- बिल्कुल चिंता मत करो। हम मिलें न मिलें, बोलें न बोलें, हम आप सबको बहुत प्यार करते हैं। अंतिम बात यही कि चिंता नहीं करनी। न ये चिंता करनी है कि कैसे हमारा उत्थान होगा। बिना बोले तुम्हारे दिमाग में हम होंगे। प्रेमानंद महाराज ने आगे कहा- देख लेना तुम वही करोगे, जो गुरुदेव कहेंगे। आप बिल्कुल निश्चिंत रहिएगा। जो जहां जिस सेवा में आए, उस सेवा में रहिएगा। खूब नाम जप करो। मंगल होगा। तुम्हारे गुरुदेव तुम्हारे दिमाग में बैठे रहेंगे। आप निर्भय, निश्चिंत, निशोक होकर भजन करो। हमारा जब मन होगा, तब हम बोल देंगे। अब संत प्रमानंद महाराज की कहानी- 13 साल की उम्र में घर छोड़ा प्रेमानंद महाराज का जन्म यूपी में कानपुर जिले की नरवल तहसील के अखरी गांव में हुआ था। पिता शंभू नारायण पांडे और मां रामा देवी हैं। 3 भाई हैं, प्रेमानंद मंझले हैं। बचपन में प्रेमानंद जी का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। वह बचपन से ही आध्यात्मिक रहे। कक्षा 8 तक पढ़ाई की है। बचपन में अनिरुद्ध ने अपनी सखा टोली के साथ शिव मंदिर के लिए एक चबूतरा बनाना चाहा। इसका निर्माण भी शुरू करवाया, लेकिन कुछ लोगों ने रोक दिया। इससे वह मायूस हो गए। उनका मन इस कदर टूटा कि घर छोड़ने का फैसला कर लिया। वह कानपुर होते हुए काशी पहुंचे। जब 13 साल के हुए तो उन्होंने ब्रह्मचारी बनने का फैसला किया। शुरुआत में प्रेमानंद महाराज का नाम 'आरयन ब्रह्मचारी' रखा गया। काशी में उन्होंने करीब 15 महीने बिताए। उन्होंने गुरु गौरी शरण जी महाराज से गुरुदीक्षा ली। फिर वह मथुरा आ गए। संन्यासी से राधावल्लभी संत बन गए प्रेमानंद महाराज प्रेमानंद महाराज वृंदावन पहुंचकर हर रोज बांके बिहारी जी के दर्शन करते। फिर रासलीला रास आई और राधावल्लभ के कार्यक्रमों में जाने लगे। वहां घंटों खड़े रहते। एक दिन एक संत ने श्री राधारससुधानिधि से एक श्लोक पढ़ा, लेकिन महाराज उसे समझ नहीं पाए। फिर एक दिन वृंदावन की परिक्रमा करते समय एक सखी को एक श्लोक गाते हुए सुना। उसे सुनकर महाराज ठिठक गए। श्लोक ऐसा रास आया कि अपना संन्यास धर्म तोड़कर वो उस सखी के पास गए। उससे श्लोक का मतलब पूछा। सखी ने कहा- इसका मतलब समझने के लिए राधावल्लभी होना जरूरी है। इस तरह महाराज राधावल्लभी हो गए। ------------------------- यह खबर भी पढ़िए- सबसे सीनियर IPS के पास 2 साल से काम नहीं:DGP समेत कई के पास एक्स्ट्रा चार्ज; यूपी पुलिस में अफसरों की कमी या भरोसे की? यूपी के पुलिस विभाग में बड़ी जिम्मेदारियां कुछ अफसरों तक सीमित हैं। सीनियर होने के बाद भी कई अधिकारियों को काम नहीं दिया गया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1990 बैच की IPS रेणुका मिश्रा हैं, जो पिछले 2 साल से बिना किसी जिम्मेदारी के हैं। 7 साल से सस्पेंड चल रहे जसवीर सिंह भी इसी लिस्ट में शामिल हैं। पढ़ें पूरी खबर…
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