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    अखिलेश यादव बोले लाल-इमली शुरु कराएंगे:कर्मचारी बोले 10 महीने से सैलरी नहीं...2024 में योगी कह गए थे नट बोल्ट नहीं हिला

    1 hour ago

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    कानपुर की औद्योगिक पहचान कही जाने वाली लाल इमली (कानपुर वूलेन मिल) एक बार फिर सियासत के केंद्र में है। कभी अपनी मशीनों की गूंज से पूरे शहर को रौनक देने वाली यह मिल आज खामोशी की चादर ओढ़े खड़ी है, लेकिन राजनीतिक बयानबाजी का शोर अब भी थमा नहीं है। शुक्रवार को शहर दौरे पर आए सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी सरकार बनने पर लाल इमली को फिर से चालू कराने की घोषणा कर दी। इससे पहले 29 अगस्त 2024 को जीआईसी मैदान में आयोजित कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हुंकार भरते हुए लाल इमली को दोबारा चलाने का ऐलान किया था। उस घोषणा को करीब डेढ़ साल बीत चुके हैं, मगर मिल में उत्पादन शुरू होने के कोई संकेत नहीं दिखते। कर्मचारियों ने बताई पीड़ा शनिवार को दैनिक भास्कर एप की टीम जब मिल परिसर पहुंची तो वहां मौजूद कर्मचारियों की पीड़ा साफ झलक रही थी। कर्मचारियों का कहना है कि मिल चलना तो दूर, उन्हें पिछले दस महीनों से वेतन तक नहीं मिला है। उनका आरोप है कि 2014 के बाद से उत्पादन लगभग ठप है और तब से हालात लगातार बिगड़ते गए। कर्मचारियों का मानना है कि इस मिल के पुनरुद्धार के लिए केंद्र सरकार का सीधा हस्तक्षेप जरूरी है। राज्य सरकार केवल सिफारिश कर सकती है, संचालन की ठोस पहल केंद्र स्तर से ही संभव है। योगी भी कह गए थे, एक नट बोल्ट चालू नहीं हुआ लाल इमली के कर्मचारी यशवंत कहते हैं कि कल अखिलेश आए करीब डेढ़ साल पहले सीएम योगी आदित्यनाथ आए थे। वह भी इस मिल को चालू करा रहे थे लेकिन एक नट बोल्ट भी चालू नहीं हुआ। वो केवल बोलकर चले जाते हैं, होता कुछ भी नहीं है। इसको चालू कराना केंद्र सरकार के हाथ में है। 2007 में कुछ मशीनें विदेश से आईं थी मो. रफीक बताते हैं कि 10 महीने से वेतन नहीं आया है। अखिलेश के बयान पर बोले कि हमें नहीं लगता कि वह चालू करा पाएंगे। यह केंद्र सरकार का उपक्रम है। ऐसे में हमको नहीं लगता कि उनके कहने से कुछ होगा। 2007 में कुछ मशीनें विदेश से भी आईं थी। उनमें से कुछ को फाउंडेशन में लगा दिया गया था तो कुछ सील पैक हैं। यदि मिल शुरु होती है तो मशीनें काम करेंगी। चुनावी जुमला बन चुकी कर्मचारियों का यह भी कहना है कि चुनाव आते ही नेता लाल इमली का नाम जोर-शोर से उठाते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही वादे ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। उनके शब्दों में, “लाल इमली अब चुनावी जुमला बन चुकी है। हर बार उम्मीद जगती है, लेकिन हकीकत में कुछ नहीं बदलता।” यह चुनावी जुमला है कम्यूनिस्ट नेता चमन खन्ना ने कहा कि लाल इमली को शुरु कराने की बात अखिलेश यादव की ओर से दिया गया चुनावी जुमला है। इससे पहले योगी आदित्यनाथ ने भी इसको शुरु कराने की बात कही। लाल इमली राज्य सरकार के अधीन नहीं है। यह केंद्र सरकार के अधीन है। यदि केंद्र को कोई व्यक्ति कहता तो बात समझ में आती। अगर इंडिया गठबंधन की सरकार बनती है तो अखिलेश कुछ कर सकते हैं। ब्रिटिश काल में शुरु हुई थी लाल इमली इतिहास पर नजर डालें तो लाल इमली की स्थापना वर्ष 1876 में ब्रिटिश काल में हुई थी। उस समय इसे कानपुर वूलेन मिल के नाम से जाना जाता था। सेना के लिए ऊनी कपड़े और कंबल बनाने में इस मिल की खास पहचान थी। धीरे-धीरे यह देश की प्रतिष्ठित ऊनी मिलों में शुमार हो गई। आजादी के बाद भी इसका गौरव बरकरार रहा और ‘लाल इमली’ ब्रांड देशभर में गुणवत्ता का पर्याय बन गया। एक समय था जब हजारों कर्मचारी यहां कार्यरत थे और मिल की सायरन की आवाज शहर की दिनचर्या तय करती थी। आसपास के इलाकों की अर्थव्यवस्था भी इसी मिल पर निर्भर थी। लेकिन आर्थिक संकट, प्रबंधन की कमजोरियां और बदलते बाजार ने मिल की रफ्तार थाम दी। वीरान पड़ा विशाल परिसर आज स्थिति यह है कि विशाल परिसर वीरान पड़ा है। जंग खाती मशीनें और बंद गेट उस सुनहरे दौर की याद दिलाते हैं जब लाल इमली कानपुर की शान हुआ करती थी। राजनीतिक मंचों से घोषणाएं भले ही गूंज रही हों, लेकिन कर्मचारियों की नजरें अब भी ठोस कार्रवाई और वास्तविक पुनरुद्धार योजना पर टिकी हैं।
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