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    बच्चे की कोहनी से गई आंख की रोशनी:हैलट के डॉक्टरों ने बिना चीरा लगाए लौटाई नजर, दुनिया में पहली बार अपनाई अनोखी तकनीक

    18 hours ago

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    कानपुर के गोविंद नगर निवासी 30 वर्षीय सीमा की आंख में सोते समय बच्चे की कोहनी लग गई। चोट लगने के बाद आंख में सूजन आ गई और तेज दर्द शुरू हो गया। परिजन उन्हें GSVM मेडिकल कॉलेज के हैलट अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन तब तक आंख की रोशनी जा चुकी थी। हैलट अस्पताल में डॉक्टरों ने बिना बड़ा चीरा लगाए और बिना आंख खोले इलाज किया। नेत्र रोग विभागाध्यक्ष डॉ. परवेज खान ने बताया कि चोट लगने से आंख के अंदर ब्लीडिंग हुई थी और खून का बड़ा थक्का जम गया था। अल्ट्रासाउंड जांच में पता चला कि क्लॉट की वजह से आंख की कोरॉयड परत दोनों तरफ से उखड़कर आपस में चिपक गई थी। मेडिकल भाषा में इस स्थिति को ‘किसिंग कोरॉयड’ कहा जाता है। डॉक्टरों के मुताबिक आंख का प्रेशर 80 तक पहुंच गया था, जबकि सामान्य आई प्रेशर इससे काफी कम होता है। हालत ऐसी थी कि मशीनों से भी प्रेशर मापना मुश्किल हो रहा था। सामान्य इलाज में था आंख खराब होने का खतरा डॉक्टरों के मुताबिक, आमतौर पर ऐसे मामलों में 15 से 20 दिन तक इंतजार किया जाता है, ताकि खून का थक्का अपने आप पिघल जाए। तुरंत सर्जरी करने पर पूरी आंख खराब होने का खतरा रहता है। लेकिन सीमा की आंख की रोशनी जा चुकी थी और दर्द लगातार बढ़ रहा था, इसलिए डॉक्टरों के सामने बड़ा जोखिम लेने की चुनौती थी। इसके बाद डॉ. परवेज खान ने दिल के मरीजों में इस्तेमाल होने वाली दवा ‘टेनेक्टेप्लेस’ (Tenecteplase) को आंख के इलाज में प्रयोग करने का फैसला लिया। यह दवा डॉ. राकेश वर्मा ने उपलब्ध कराई। डॉक्टरों ने काफी रिसर्च के बाद दवा की मात्रा तय की, ताकि ब्लीडिंग दोबारा न बढ़े। पेटेंट सुई से किया गया अनोखा प्रयोग सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि दवा को आंख के भीतर जमा थक्के तक कैसे पहुंचाया जाए। इसके लिए डॉ. परवेज खान ने अपनी पेटेंट कराई हुई विशेष ‘सुप्राकोरॉइडल नीडल’ का इस्तेमाल किया। दवा देने के 24 घंटे बाद थक्का पिघल गया। इसके बाद डॉक्टरों ने कोई बड़ी सर्जरी करने के बजाय उसी 26 गेज की पतली सुई से पिघला हुआ खून बाहर निकाल दिया। पूरी प्रक्रिया बिना आंख खोले की गई। खून निकलते ही आंख का प्रेशर सामान्य हो गया और मरीज को दर्द से राहत मिल गई। डॉक्टर का दावा- दुनिया में पहली बार हुआ ऐसा इलाज डॉ. परवेज खान का दावा है कि ‘किसिंग कोरॉयड’ जैसी गंभीर स्थिति में इस तकनीक और दवा का इस्तेमाल दुनिया में पहली बार किया गया है। उनका कहना है कि इस तरह का केस अब तक मेडिकल साहित्य या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी दर्ज नहीं है। अब डॉक्टर इस तकनीक और विशेष सुई के व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए डीजीसीआई (DGCI) से मंजूरी लेने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि भविष्य में दूसरे आई सर्जन भी इस तकनीक का इस्तेमाल कर सकें। मरीज सीमा ने बताया- मेरी आंख से दिखना पूरी तरह बंद हो गया था। डॉक्टरों ने सुई के जरिए जमा खून निकाला। अब मुझे टॉर्च की रोशनी साफ दिखाई देने लगी है। डॉक्टरों के मुताबिक, प्राइवेट अस्पताल में इस तरह के इलाज पर करीब एक लाख रुपये तक खर्च आ सकता था, लेकिन हैलट अस्पताल में यह पूरा इलाज मुफ्त किया गया।
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