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    भगत सिंह के भतीजे बोले-आज उनके सपनों का भारत नहीं:वे धर्म-जाति की राजनीति के खिलाफ होते, Gen-Z का सरकार से सवाल करना देशद्रोह नहीं

    6 hours ago

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    देश 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। शहीद भगत सिंह आज भी देश के युवाओं के सबसे लोकप्रिय क्रांतिकारी चेहरों में शामिल हैं। राजनीतिक दल उनके नाम, तस्वीर और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे का इस्तेमाल करते रहे हैं। दैनिक भास्कर से बातचीत में सहारनपुर में भगत सिंह के भतीजे किरणजीत सिंह संधू ने कहा कि भगत सिंह किसी एक राजनीतिक दल की विरासत नहीं हैं, बल्कि जनता के नायक हैं। उन्होंने कहा कि आज राजनीति में भगत सिंह का नाम तो लिया जाता है, लेकिन उनके विचारों पर चलने की कोशिश नहीं होती। भगत सिंह के सपनों का भारत अभी नहीं बना है। सामाजिक असमानता, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, धार्मिक कट्टरता और अंधविश्वास जैसी चुनौतियां आज भी हैं। किरणजीत ने कहा कि भगत सिंह धर्म और जाति के आधार पर राजनीति के खिलाफ थे। वे वैज्ञानिक सोच और सामाजिक बराबरी वाले समाज का सपना देखते थे। अगर भगत सिंह आज होते तो वे सरकार से देश में गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को लेकर सवाल करते। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में Gen-Z का सरकार से सवाल करना देशद्रोह नहीं, बल्कि नागरिकों का अधिकार है। पढ़िए सवाल-जवाब.... सवाल- क्या आपको लगता है कि आज का भारत भगत सिंह के सपनों का है? जवाब- नहीं, आज का भारत उनके सपनों का नहीं है। ये ठीक है कि देश ने आजादी के बाद बहुत तरक्की की है, लेकिन भगत सिंह ने जिस समतावादी समाज का सपना देखा था, वह अभी पूरा नहीं हुआ है। वो ऐसा देश चाहते थे, जिसमें अंधविश्वास न हो, धार्मिक कट्टरता न हो, प्रांत और भाषा के नाम पर भेदभाव न हो। गरीब और अमीर के बीच इतनी बड़ी खाई न हो कि उसे पाटना मुश्किल हो जाए। उन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी, जहां हर व्यक्ति बराबरी के साथ जीवन जी सके। आज का देश अभी उस मंजिल तक नहीं पहुंच पाया है। सवाल- क्या आज की राजनीति में भगत सिंह की विचारधारा बची है? जवाब- नहीं, सिर्फ भगत सिंह ही नहीं, किसी भी देशभक्त स्वतंत्रता सेनानी की मूल विचारधारा आज की राजनीति में दिखाई नहीं देती। आज अपने स्वार्थों को साधने की आपाधापी मची हुई है। भगत सिंह और उनके साथी उस दौर के लोग थे, जिन्होंने बिना किसी निजी स्वार्थ के देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। उनका उद्देश्य था कि आने वाली पीढ़ियां एक स्वर्णिम भारत में सिर उठाकर जीवन जी सकें। आज राजनीति में वह भावना दिखाई नहीं देती। सवाल- अगर भगत सिंह आज होते तो क्या वो धर्म और जाति की राजनीति से सहमत होते? जवाब- बिल्कुल नहीं, सवाल ही पैदा नहीं होता। भगत सिंह धर्म और जाति की राजनीति के खिलाफ थे। वो चाहते थे कि समाज छोटी-छोटी पहचानों और बंटवारे से ऊपर उठे और इंसानियत के आधार पर आगे बढ़े। उन्होंने धार्मिक आस्था और अंधविश्वास को लेकर भी सवाल उठाए थे। उनका सपना एक समतावादी समाज का था, जहां इंसान को उसकी जाति या धर्म से नहीं, बल्कि इंसान होने के आधार पर देखा जाए। सवाल- आज Gen-Z सरकार से अपने हक को लेकर सवाल कर रही है, इस पर क्या कहेंगे? जवाब- ये सोच ही बहुत गलत है कि सरकार से सवाल करना देशद्रोह है। देश की आजादी के लिए संघर्ष इसलिए किया गया था कि ये हमारा अपना राज होगा। अंग्रेजों के समय सबसे बड़ी समस्या यही थी कि सरकार लोगों की बात सुनने को तैयार नहीं थी और अत्याचार करती थी। भगत सिंह और उनके साथियों ने केंद्रीय असेंबली में बम फेंककर बहरी अंग्रेज सरकार तक करोड़ों दबे-कुचले हिंदुस्तानियों की आवाज पहुंचाने की कोशिश की थी। ऐसे में आज लोकतंत्र में Gen-Z का सरकार से सवाल करना देशद्रोह कैसे हो सकता है? सवाल करना लोकतंत्र का हिस्सा है। सवाल- क्या आज का युवा भगत सिंह की तरह सवाल पूछ रहा है? जवाब- हां, युवा सवाल कर रहे हैं। जहां-जहां अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आंदोलन होते हैं, वहां इंकलाब जिंदाबाद के नारे सुनाई देते हैं। भगत सिंह का यह विचार आज भी लोगों को प्रेरणा देता है। किसी भी जुल्म को चुपचाप बर्दाश्त करना बहादुरी नहीं है। उसके खिलाफ आवाज उठाना और संघर्ष करना बहादुरी की निशानी है। भगत सिंह ने भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया। उन्होंने लंबी भूख हड़ताल की और अपने साथियों के साथ जेल में यातनाएं सहीं। आज के युवा उन्हीं से प्रेरणा लेकर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हैं। सवाल- हर राजनीतिक दल भगत सिंह के नाम का इस्तेमाल करता है, लेकिन उनके पदचिह्नों पर चल रहा क्या? जवाब- ये बहुत अफसोस की बात है। राजनीतिक दल चाहे कोई भी हों, आजादी के बाद से सभी ने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस और दूसरे क्रांतिकारियों के नामों का इस्तेमाल किया है। किसी न किसी मौके पर उन्हें याद किया जाता है, लेकिन उनके विचारों और बताए रास्ते पर चलने की कोशिश नहीं हुई। सवाल- अगर भगत सिंह आज होते तो सरकार से उनका पहला सवाल क्या होता? जवाब- निश्चित रूप से वो पूछते कि देश में इतनी असमानता क्यों है? गरीबी क्यों है? बेरोजगारी क्यों है? भ्रष्टाचार क्यों है? उनका संघर्ष इन्हीं समस्याओं के खिलाफ होता। मुझे लगता है कि आज भी वह सच्चाई के लिए लड़ने वालों के साथ खड़े होते और संभव है कि वर्तमान परिस्थितियों में वह आंदोलन के मैदान में नजर आते। सवाल- बेरोजगारी और महंगाई के बढ़ते मुद्दे को आप किस तरह देखते हैं? जवाब- बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। इसके साथ भ्रष्टाचार और सामाजिक क्षेत्र में नैतिकता का गिरना भी चिंता का विषय है। देश के सामने आज कई गंभीर चुनौतियां हैं। हमें यह याद रखना होगा कि आजादी केवल सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं थी। हजारों-लाखों लोगों ने अपने जीवन का बलिदान इसलिए दिया था कि एक बेहतर भारत का निर्माण हो सके। अगर हम उनके सपनों को भूल गए तो उनके बलिदान का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। सवाल- आजादी के बाद भी भगत सिंह और दूसरे क्रांतिकारियों को क्या वो स्थान मिला, जिसके हकदार थे? जवाब- ये बहुत अफसोस की बात है। वर्षों तक भगत सिंह और दूसरे क्रांतिकारियों को पृष्ठभूमि में रखा गया और उन्हें वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। लेकिन, उन्हें सरकारें भले ही नजरअंदाज करती रहीं, लोग उन्हें अपने दिलों में जिंदा रखते रहे। इसी वजह से लोगों ने उन्हें 'शहीद-ए-आजम' कहा। चंडीगढ़ के एयरपोर्ट का नाम भगत सिंह के नाम पर रखने की मांग को लेकर पंजाब और हरियाणा की विधानसभाओं में प्रस्ताव पारित हुए। लंबे संघर्ष के बाद एयरपोर्ट का नाम उनके नाम पर रखा गया। इससे पता चलता है कि सरकारी स्तर पर भले ही देर हुई हो, लेकिन जनता के दिलों में भगत सिंह हमेशा जीवित रहे। भगत सिंह का सहारनपुर से नाता जानिए --------------------- ये खबर भी पढ़िए- योगी बोले- 1947 कत्लेआम के कांग्रेस-सपा दोषी: तब मोदी जैसा पीएम होता तो कोई भारत का बाल भी बांका नहीं कर पाता यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को लखनऊ में कहा- कांग्रेस और सपा जैसी पार्टियों के लोग ही 1947 के विभाजन और कत्लेआम के वास्तविक दोषी हैं। अगर उस समय नरेंद्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री होता, तो भारत का कोई बाल भी बांका नहीं कर पाता। पढ़ें पूरी खबर…
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