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    भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष ने रास्ता बदला:अब नीला झंडा पहचान होगी; 'हाथी' पर सवार हो विधानसभा जाने की तैयारी

    2 hours ago

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    गोरखपुर की चर्चित विधानसभा सीट चिल्लूपार में बड़ा उलटफेर होने जा रहा है। इस क्षेत्र में मजबूत प्रभाव रखने वाले चंद परिवार की बहू और लंबे समय से भाजपा की सक्रिय नेता अस्मिता चंद ने अपना रास्ता बदल लिया है। भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष रहते हुए उन्होंने अपने इर्द-गिर्द से भाजपा की पहचान हटा दी है। सोशल मीडिया पर भी भाजपा नेता की जगह उन्होंने समाजसेवी और गोरखपुर की नेता लिखना पसंद किया है। अपने बैठने के स्थान के ऊपर बसपा सुप्रीमो मायावती का चित्र लगाकर आगे की रणनीति भी सार्वजनिक कर दी है। अस्मिता अब हाथी की सवारी कर विधानसभा पहुंचने की तैयारी में हैं। 23 अगस्त को एक चिल्लूपार में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में बसपा में उनकी विधिवत ज्वाइनिंग हो सकती है। अस्मिता चंद के हालिया कदम से चिल्लूपार की राजनीति में हलचल पैदा हो गई है। बसपा का यहां अच्छा-खासा वोट बैंक है। ऐसे में यदि कोई मजबूत नेता यदि इस पार्टी से लड़ता है तो भाजपा व सपा, दोनों दलों के प्रत्याशियों के लिए कड़ी चुनौती खड़ी करेगा। लंबे समय से भाजपा में सक्रिय होने के कारण अस्मिता चंद पूरे जिले में एक चर्चित चेहरा हैं। अब बसपा से उन्हें टिकट मिलना लगभग तय है। ऐसे में दूसरी पार्टियों को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। जहां सीएम ने सभा की थी, उसी जगह अस्मिता की जनसभा होगी यह लगभग तय है कि अस्मिता चंद की पहचान अब नीला झंडा बनने जा रही है। अस्मिता चंद की मुलाकात बसपा सुप्रीमो से हो चुकी है। अब वह बसपा में अपनी ज्वाइनिंग को धमाकेदार बनाने जा रही हैं। संभावना जतायी जा रही है कि 23 अगस्त को चिल्लूपार में एक बड़ी जनसभा होगी, जहां अस्मिता का परिवार अपनी ताकत दिखाएगा। चिल्लूपार में यह सभा उसी जगह होगी, जहां कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी सभा की थी। इसे वर्तमान विधायक राजेश त्रिपाठी को एक जवाब के रूप में भी देखा जा रहा है। इस सभा के बाद भी अस्मिता चंद ने विधायक पर निशाना साधा था। माना जा रहा है कि महुआपार में होने वाले इस जनसभा में बसपा की ओर से आकाश आनंद या प्रदेश अध्यक्ष पहुंच सकते हैं। इसी कार्यक्रम के जरिए शक्ति प्रदर्शन की तैयारी है। अस्मिता चंद का परिवार, विधायक की ओर से जुटायी गई भीड़ से कहीं अधिक लोगों को वहां लाने की तैयारी कर रहा है, जिससे साफ संदेश दिया जा सके। अस्मिता चंद ने अपनी गाड़ी पर कोई झंडा नहीं लगाया है लेकिन घर में बसपा प्रमुख की फोटो जरूर लग गई है। भाजपा से जुड़े उनके कई पोस्ट भी गायब हो गए हैं। बसपा के एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह के निधन पर भी उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट किया है। परिवार का कहना है कि इस बार चुनाव लड़ेंगे और जीतेंगे भी। 2027 में हर हाल में चुनाव लड़ने की घोषण की थी अस्मिता चंद ने 10 महीना पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वह हर हाल में चिल्लूपार से मैदान में उतरेंगी। पहले भाजपा से टिकट पाने की जोर-आजमाइश शुरू हुई लेकिन इस दौड़ में खुद को पिछड़ता देख उन्होंने बसपा नेताओं से बात की। उनकी मुलाकात मायावती से कराई गई और वहां से हरी झंडी मिल चुकी है। परिवार के सदस्यों का कहना है कि बहन जी ने चुनाव लड़ने और जीतकर आने का आशीर्वाद दिया है। अस्मिता चंद का परिवार चिल्लूपार विधानसभा में काफी प्रभावी माना जाता है। वहां उनके परिवार का अच्छा-खासा वोट बैंक भी है। पिछले कई चुनावों से भाजपा से टिकट के लिए उनकी दावेदारी रहती है लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला। उनके समर्थक बताते हैं कि 2022 के चुनाव में उन्हें आश्वासन मिला है। यह कहा गया था कि राजेश त्रिपाठी का यह आखिरी चुनाव है। अस्मिता चंद से समर्थन करने को कहा गया और उन्होंने पूरी ताकत लगाकर उनके पक्ष में वोट मांगा। इसलिए इस बार अस्मिता अपनी दावेदारी सबसे मजबूत मान रही थीं लेकिन अब उन्होंने रास्ता बदल लिया है। तिवारी परिवार से मिलती है कठिन चुनौती चिल्लूपार विधानसभा ऐसी सीट है जहां पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी का दबदबा रहा। वह यहां से 5 बार विधायक रहे। उनके छोटे पुत्र विनय शंकर तिवारी एक बार विधायक रहे हैं। अभी भी इस सीट पर तिवारी परिवार सबसे बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा नजर आता है। इस सीट पर लड़ाई काफी रोचक होती है। 2017 में वह बसपा के टिकट पर विनय विधायक चुने गए। 2022 में सपा ने उन्हें प्रत्याशी बनाया लेकिन वह चुनाव हार गए। इस बार भी उनकी दावेदारी है। ऐसे में अस्मिता पर यदि भाजपा भरोसा जताती है तो लड़ाई काफी रोचक नजर आएगी। सीपी चंद कर चुके हैं दावेदारी चंद परिवार से सीपी चंद 2012 में चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके हैं। वह सपा के उम्मीदवार थे। पूर्व कैबिनेट मंत्री हरिशंकर तिवारी ने अपनी पार्टी अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस से दावेदारी की थी और राजेश त्रिपाठी बसपा से मैदान में थे। राजेश त्रिपाठी 30.81 प्रतिशत वोट पाकर चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे। सीपी चंद 25.23 प्रतिशत मतों के साथ दूसरे व हरिशंकर तिवारी 22.59 प्रतिशत वोटों के साथ तीसरे स्थान पर थे। भाजपा को यहां से 8.02 प्रतिशत वोट मिला था। 2007 में धुरियापार से ससुर के खिलाफ अस्मिता ने ठोंकी थी ताल 2007 तक चंद परिवार के प्रभाव वाला क्षेत्र धुरियापार में आता था। 2012 के परिसीमन के साथ यह विधानसभा क्षेत्र खत्म हो गया और चंद परिवार के प्रभाव वाला क्षेत्र भी चिल्लूपार में शामिल हो गया। 2007 में अस्मिता चंद ने धुरियापार से भाजपा के टिकट के लिए दावेदारी की थी लेकिन टिकट उनके ससुर मारकण्डेय चंद को मिला। इसके बाद अस्मिता ने निर्दल ही ताल ठोंक दी। इस बार जीत सपा के राजेंद्र सिंह उर्फ पहलवान सिंह को मिली थी। दूसरे स्थान पर बसपा के लाल अमीन खान उर्फ लाल शाही रहे। तीसरे स्थान पर मारकण्डेय चंद रहे। उन्हें 27686 मिले। जबकि चौथे स्थान पर अस्मिता चंद रहीं, उन्हें 7723 वोट मिले थे। फिर अलग-अलग दलों में होगा चंद परिवार वर्तमान समय में पूरा चंद परिवार भाजपा में है। सीपी चंद भाजपा से ही एमएलसी हैं। जबकि अस्मिता चंद लंबे समय से भाजपा से जुड़ी हैं। वह महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। 2007 से लेकर चंद परिवार के दोनों धड़े राजनीतिक रूप से साथ खड़े नजर नहीं आए। 2012 के चुनाव में सीपी चंद सपा में थे लेकिन अस्मिता चंद भाजपा में। 2016 में सीपी चंद पहली बार सपा के टिकट पर एमएलसी चुने गए। उस समय भी अस्मिता भाजपा में थीं। लेकिन इस बार फिर यह परिवार दो अलग-अलग दलों में नजर आएगा। अस्मिता के चुनाव लड़ने से समीकरण कैसे बदलेंगे अस्मिता को यदि बसपा से टिकट मिलता है तो यहां त्रिकोणीय लड़ाई देखने को मिलेगी। भाजपा प्रत्याशी के साथ सपा से चुनाव मैदान में उतरने वाले पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी के पुत्र विनय शंकर तिवारी के सामने भी चुनौती होगी। जिले के सर्वाधिक मतदाताओं वाले इस विधानसभा क्षेत्र में ब्राह्मण मतदाता प्रभावी भूमिका में नजर आते हैं। अपने व्यक्तिगत संबंधों के कारण ब्राह्मणों का ठीक-ठाक वोट अस्मिता को मिल सकता है। क्षत्रिय मतदाताओं की संख्या भी इस क्षेत्र में अच्छी-खासी है। ऐसे में इसका फायदा उन्हें मिल सकता है। अब यह तय है कि अस्मिता भाजपा के खिलाफ रहेंगी। ऐसे में भाजपा प्रत्याशी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। यदि उनके साथ सहानुभूति की लहर रही तो परिणाम उनके पक्ष में भी हो सकता है। लेकिन सामान्य स्थिति में उनके भाजपा के खिलाफ जाने का फायदा तिवारी परिवार को भी हो सकता है। 2007 में धुरियापार विधानसभा में उन्होंने 7723 वोट हासिल किए थे। उस समय भी उनके परिवार की ताकत बंटी थी। उनके ससुर अधिक प्रभावी पदों पर रह चुके थे। लेकिन भाजपा का टिकट होने के बाद भी वह तीसरे स्थान पर रहे। अब जानिए अस्तिमा चंद के परिवार के बारे में अस्मिता चंद के पिता इंद्र प्रकाश राव दिग्विजयनाथ डिग्री कालेज में प्रवक्ता थे। उनके ससुर स्व. राजनारायण चंद ब्लाक प्रमुख रहे हैं। उनके ससुर के बड़े भाई मारकण्डेय चंद प्रदेश सरकार में मंत्री रहे हैं। उनके जेठ रणविजय चंद जिला सहकारी बैंक के चेयरमैन रहे हैं। मारकंडेय चंद के पुत्र सीपी चंद लगातार दूसरी बार गोरखपुर-महराजगंज स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र से एमएलसी हैं। जानिए इस सीट पर बसपा की क्या स्थिति रही है इस सीट पर बसपा को अच्छा-खासा वोट मिलता रहा है। जब पूर्व कैबिनेट मंत्री हरिशंकर तिवारीके विजय रथ को रोकना हुआ तो राजेश त्रिपाठी बसपा का झंडा थामे ही 2007 के चुनाव में उतरे थे। 2012 में फिर जीत दर्ज की। 2017 में हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर ने इसी पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज की। जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ वरिष्ठ पत्रकार आलोक दुबे कहते हैं कि अस्मिता चंद लंबे समय से भाजपा से जुड़ी हैं। भाजपा महिला मोर्चा की क्षेत्रीय उपाध्यक्ष हैं। वे दक्षिणांचल की राजनीति में खासा प्रभाव रखने वाले चंद परिवार से आती हैं। अस्मिता चंद अगर बसपा में शामिल होती हैं तो यह भाजपा के लिए बड़े झटके से कम नहीं होगा। दक्षिणांचल की राजनीति में यह एक बड़े राजनीतिक उलटफेर के रूप में देखा जाएगा। भाजपा के साथ सपा को भी नए समीकरण के मुताबिक चुनावी रणनीति तैयार करनी पड़ेगी।
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