Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    भारत की डिफेंस कंपनी से डील, एक चूक और चली गई रक्षा मंत्री की कुर्सी

    20 hours ago

    1

    0

    एक तरफ रूस यूक्रेन की जंग चल रही है और दूसरी तरफ यूक्रेन को रूस के खिलाफ मदद पहुंचाने यानी कि गोला बारूद पहुंचाने के चक्कर में यूरोप के एक छोटे से देश के रक्षा मंत्री को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ गई। दरअसल यह पूरा मामला करीब 70 मिलियन यूरो यानी 768 करोड़ से ज्यादा की एक एमिनेशन डील का है और इस पूरे विवाद के बीच नाम आया है भारत की स्वामित्व वाली एक डिफेंस कंपनी का और आरोप यह नहीं है कि भारतीय कंपनी ने कोई घोटाला किया बल्कि विवाद इस बात को लेकर है कि यूरोप के इस छोटे से देश एस्टोनिया ने आखिर ऐसी कंपनी से इतनी बड़ी डिफेंस डील क्यों की जिसका आर्टिलरी शेल बेचने का पहले कोई स्थापित रिकॉर्ड नहीं था। करोड़ों रुपए एडवांस में दिए गए गोला बारूद समय पर नहीं पहुंचा। जो सामान पहुंचा उसकी क्वालिटी पर सवाल उठे। कॉन्ट्रैक्ट खत्म हुआ और अब पैसा वापस लेने के लिए कानूनी लड़ाई चल रही है। इसके बाद हुआ यह कि एस्टोनिया के डिफेंस मिनिस्टर हेनो बेवकको ने पॉलिटिकल रिस्पांसिबिलिटी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। इसे भी पढ़ें: मुस्लिम NATO की पहली मीटिंग में ऐसा ऐलान, बुरे फंसे नेतन्याहू!आखिर इस डील में हुआ क्या था?कहानी शुरू होती है साल 2024 से। उस समय यूक्रेन को आर्टिलरी एमिनेशन की भारी जरूरत थी। रूस के साथ युद्ध लंबा खींच चुका था और यूक्रेन लगातार पश्चिमी देशों से गोला बारूद की मांग कर रहा था। एस्टोनिया भी यूक्रेन का खुलकर समर्थन कर रहा था और उसकी कोशिश थी कि ज्यादा से ज्यादा एमिनेशन यूक्रेन तक पहुंचाया जाए। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए एस्टोनिया के सेंटर फॉर डिफेंस इन्वेस्टमेंट यानी आरकेआईके ने एक कंपनी के साथ आर्टिलरी शेल की सप्लाई के लिए कॉन्ट्रैक्ट किए। यह कंपनी डाटा सेल एसआरएल जो इटली में रजिस्टर्ड थी। लेकिन इस कहानी में भारत की एंट्री यहीं से हुई। डाटा सेल को मार्च 2024 में भारत की नेको डिफेंस मिनिशन ने एक्वायर कर लिया था। यानी कंपनी इटली में रजिस्टर्ड थी लेकिन उसका मालिकाना हक अब भारतीय कंपनी के पास आ गया था। और सबसे बड़ा सवाल यहीं से पैदा हुआ। रिपोर्ट्स के मुताबिक डाटा सेल के पास आर्टिलरी शेल बेचने का कोई स्थापित पिछला रिकॉर्ड नहीं था। यानी एस्टोनिया ने जिस कंपनी को इतने बड़े एमिनेशन कॉन्ट्रैक्ट के लिए चुना वो इस क्षेत्र में पहले से कोई बड़ा जाना पहचाना सप्लायर नहीं थी। अब एस्टोनिया ने इस डील में करीब 70 मिलियन यूरो यानी 768 करोड़ से ज्यादा की रकम एडवांस में दे दी। पहले डील अगस्त 2024 में हुई और करीब 15 मिलियन यूरो का एडवांस दिया गया। अक्टूबर में एक कॉन्ट्रैक्ट और हुआ और 10 मिलियन यूरो से ज्यादा की रकम आगे दी गई। इसके बाद भी कॉन्ट्रैक्ट हुए और कुल एडवांस पेमेंट करीब 70 मिलियन यूरो तक पहुंच गई। यह पैसा यूरोपीय संघ की यूरोपियन पीस फैसिलिटी से जुड़े फंडिंग मैकेनिज्म के जरिए आया था जिसका इस्तेमाल यूक्रेन की सैन्य मदद के लिए किया जा रहा था। यानी पूरा मामला सिर्फ एस्टोनिया की अपनी डिफेंस से प्रोक्योरमेंट का नहीं था। इसमें यूरोपीय फंडिंग भी जुड़ी थी और मकसद था यूक्रेन को आर्टिलरी एमिनेशन उपलब्ध कराना। लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने इस पूरी डील की तस्वीर बदल दी। इसे भी पढ़ें: पाकिस्तान से यारी पड़ी इतनी भारी, पुराना कर्ज चुकाने के लिए सऊदी ले रहा 8 अरब डॉलर का लोनभारत की कंपनी इस डील में कैसे आई? गोला बारूद कुछ महीनों के भीतर पहुंचना था लेकिन डिलीवरी लगातार टलती रही। प्रोडक्शन से जुड़ी समस्याओं का हवाला दिया गया। एस्टोनिया इंतजार करता रहा और जब 2025 में एमिनेशन की शिपमेंट पहुंची तो उसके सामान की क्वालिटी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए। एस्टोनियाई पक्ष का कहना था कि सामान निर्धारित रिक्वायरमेंट के मुताबिक पूरा नहीं था और क्वालिटी स्टैंडर्ड पर भी खरा नहीं उतरा। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक शिपमेंट में जरूरी कॉमोनेंट्स तक पूरे नहीं थे। इसके बाद एस्टोनिया ने कॉन्ट्रैक्ट टर्मिनेट कर दिए और एडवांस में दी गई रकम वापस मांगनी शुरू कर दी और यहीं से यह मामला प्रोक्योरमेंट डिस्प्यूट से निकलकर राजनीतिक संकट बन गया। मतलब जो डील हुई थी जो गोला बारूद की डील थी वो अपने तय मानक पूरे नहीं कर पाई और यहां से पूरा विवाद शुरू हुआ। एस्टोनिया के डिफेंस इन्वेस्टमेंट सेंटर के मौजूदा प्रमुख एलमार वाहेर ने तो यहां तक कह दिया कि उनकी राय में यह कॉन्ट्रैक्ट किया ही नहीं जाना चाहिए था। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई घर बनवाने के लिए ऐसी कंपनी को चुन ले जिसने पहले कभी घर बनाया ही नहीं तो पहले से ही सवाल खड़ा हो जाता है कि वो घर पूरा कर पाएगी या नहीं और इस कंपनी के साथ भी यही हुआ क्योंकि इस कंपनी के पास एमिनेशन बनाने का कोई पुराना रिकॉर्ड नहीं था और उसके साथ इतने बड़े स्तर पर एक डील हो गई। लेकिन कहानी का एक दूसरा पक्ष भी है। डाटा सेल ने एस्टोनिया के आरोपों को स्वीकार नहीं किया। कंपनी का कहना है कि उसने बड़ी मात्रा में सामान सप्लाई किया और करीब 58 मिलियन यूरो के इनवॉइसेस जमा किए।डिफेंस मिनिस्टर की कुर्सी क्यों गई?  यही एस्टोनिया की पॉलिटिक्स इस कहानी को बाकी डिफेंस प्रोक्योरमेंट मामले से अलग बनाती है। एस्टोनिया के डिफेंस मिनिस्टर हेनो पेपकोर जो 2022 से इस पद पर थे। उन्होंने 2 सितंबर 2026 को इस्तीफा देने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि डिफेंस मिनिस्टर हर एमिनेशन कॉन्ट्रैक्ट खुद नेगोशिएट नहीं करता और वह व्यक्तिगत तौर पर इस कॉन्ट्रैक्ट की बातचीत में शामिल नहीं थे। लेकिन उनके मंत्रालय के अधीन डिफेंस सेक्टर की ओवरऑल पॉलिटिकल रिस्पांसिबिलिटी उनकी थी। इसीलिए उन्होंने इसकी जिम्मेदारी स्वीकार की।
    Click here to Read more
    Prev Article
    बड़ा दिखेगा अफ्रीका, घटेगा US-यूरोप का आकार...बदल गया दुनिया का 450 साल पुराना नक्शा, UN में पास हुआ ऐसा प्रस्ताव, बौखला गया अमेरिका
    Next Article
    Nepal में बाढ़ का नया खतरा! दार्चुला में भारी भूस्खलन से चौलानी नदी का बहाव बाधित, निचले इलाकों में अलर्ट जारी

    Related विदेश Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment