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    बाल स्वरूप में भगवान कृष्ण खेलेंगे होली:नंदभवन से निकलेगा डोला, मुरलीधर घाट पर छड़ी से होली खेली जाएगी

    2 hours ago

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    बरसाना और नंदगांव में लट्ठमार होली खेली जाती है। वहीं गोकुल में छड़ी से होली खेलने की परंपरा है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण यहां बाल स्वरूप में हैं और घुटनों के बल चलते हैं। इसलिए उनके साथ लाठियों के बजाय छोटी छड़ी से होली खेली जाती है। गोकुल में होली की शुरुआत नंदभवन से निकलने वाले डोला से होती है। जब डोला यमुना के मुरलीधर घाट पहुंचता है, तो वहां गोपियां छड़ीमार होली खेलती हैं। गोकुल की छड़ीमार होली भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप और उनकी नटखट लीलाओं की स्मृति में प्रेम और उल्लास के साथ मनाई जाती है। यह उत्सव विशेष रूप से बाल गोपाल की छवि को केंद्र में रखकर आयोजित होता है, इसलिए इसमें लट्ठ के बजाय छोटी छड़ी का प्रयोग किया जाता है। छड़ीमार होली क्यों है खास? पौराणिक मान्यता के अनुसार बालकृष्ण गोकुल की गोपियों को माखन चुराकर और शरारतें करके छेड़ा करते थे। इससे नाराज़ होकर गोपियां उन्हें छड़ी लेकर दौड़ाती थीं। उसी प्रसंग की स्मृति में यह परंपरा आज भी जीवित है। गोकुल में श्रीकृष्ण को ‘लाला’ और ‘बाल गोपाल’ के रूप में पूजा जाता है, इसलिए यहां की होली में स्नेह और वात्सल्य की भावना प्रमुख रहती है। चोट से बचाने के लिए केवल छोटी छड़ी से प्रतीकात्मक और प्रेमपूर्ण होली खेली जाती है, जो इस परंपरा को अन्य स्थानों से अलग और खास बनाती है। मुरलीधर घाट से होती है शुरुआत छड़ीमार होली का प्रमुख आयोजन मुरलीधर घाट से आरंभ होता है। मान्यता है कि यहीं श्रीकृष्ण ने पहली बार मुरली बजाई थी। श्रद्धालु यहां एकत्र होकर होली उत्सव का शुभारंभ करते हैं। इससे पहले नंद भवन से भगवान का डोला निकाला जाता है। डोले के साथ होली का उल्लास चरम पर पहुंच जाता है। हुरंगा की परंपरा डोला यात्रा के दौरान गोपियों का रूप धारण किए महिलाएं हुरियारों (पुरुषों) पर प्रेमपूर्वक छड़ी बरसाती हैं। इस परंपरा को ‘हुरंगा’ कहा जाता है। इस दौरान पूरा वातावरण फाग, गुलाल और रास-रंग से सराबोर हो उठता है। यहां बरसाना और नंदगांव की लट्ठमार होली में बड़े लट्ठों का प्रयोग होता है। वहीं गोकुल की छड़ीमार होली वात्सल्य और कोमल भावनाओं का प्रतीक मानी जाती है। यहां उद्देश्य दंड नहीं, बल्कि बाल लीला की मधुर स्मृति को जीवंत करना है। गोकुल की यह अनूठी परंपरा धार्मिक आस्था के साथ ब्रज संस्कृति की सजीव झलक भी प्रस्तुत करती है।
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