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    बरेली में रावण बोले- रामलीला की रौनक मोबाइल ने छीनी:आज के रावण बेटियों पर अत्याचार करते, कलाकारों को 15 हजार मिलते हैं

    5 hours ago

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    ‘आज के दौर में भी रावण मौजूद हैं, लेकिन वे किसी दिखावे में नहीं, बल्कि समाज के बीच छिपे हुए हैं। रावण परम ज्ञानी था। उसने प्रभु श्रीराम के हाथों अपनी और अपने कुल की मुक्ति के लिए उनसे बैर ठाना था, लेकिन आज के रावण दूसरों को लूटने, कष्ट देने और बेटियों के साथ अत्याचार करने में लगे हैं।’ यह कहना है बरेली की ऐतिहासिक रामलीला में रावण की भूमिका निभाने वाले कलाकार बिंदेश्वर ठाकुर का। बिहार से आकर पिछले 20 सालों से रावण का किरदार निभा रहे बिंदेश्वर ठाकुर ने रामलीला की बदलती परंपरा, लोक कलाकारों की आर्थिक स्थिति और समाज में बढ़ती बुराइयों पर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि बरेली की 459 साल पुरानी रामलीला मुगल शासन, अंग्रेजों के दौर और कोरोना काल में भी जारी रही, लेकिन अब मोबाइल संस्कृति के कारण दर्शकों की रुचि कम हो रही है। मुगलों और अंग्रेजों के शासन में भी जारी रही रामलीला उत्तर प्रदेश की अयोध्या, काशी और बरेली की रामलीलाएं देश की प्राचीन रामलीलाओं में गिनी जाती हैं। बरेली में 459 वर्षों से चली आ रही इस रामलीला की शुरुआत चौधरी तालाब से होती है, जबकि इसका समापन हार्टमैन रामलीला ग्राउंड में किया जाता है। एक समय था, जब मनोरंजन के साधन सीमित थे। आसपास के कई जिलों से लोग यहां आकर 15 दिनों तक डेरा डालते थे और रामलीला देखते थे। इस बार दशहरे के मुख्य मेले में मंत्री, सांसद, विधायक और प्रशासनिक अधिकारियों समेत दो लाख से अधिक लोगों के जुटने का अनुमान है। मोबाइल ने बदली दर्शकों की रुचि बिंदेश्वर ठाकुर का कहना है कि पहले लोग रामलीला देखने के लिए मैदानों में बड़ी संख्या में पहुंचते थे, लेकिन अब स्मार्टफोन ने मनोरंजन के तौर-तरीके बदल दिए हैं। लोग घर बैठे मोबाइल पर ही मनोरंजन के कई विकल्प देख लेते हैं। इसका असर रामलीला के दर्शकों की संख्या और पारंपरिक लोककला पर पड़ रहा है। संरक्षण के दावे, लेकिन कलाकारों को राहत नहीं बिंदेश्वर ठाकुर ने कहा कि सरकारें बदलती रहीं, लेकिन रामलीला और लोक कलाकारों की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। उनके मुताबिक, सांस्कृतिक आयोजनों के संरक्षण की चर्चा तो होती है, पर जमीनी स्तर पर कलाकारों की समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। सालभर में 10 से 15 हजार रुपए मानदेय मिलता लोक कलाकारों की आर्थिक स्थिति पर बात करते हुए बिंदेश्वर ठाकुर ने बताया कि एक सीजन में उन्हें करीब 10 से 15 हजार रुपए मानदेय मिलता है। स्थायी रोजगार या आय का दूसरा साधन नहीं होने के कारण इतने कम पैसों में पूरे साल परिवार का खर्च चलाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि लोककला को जीवित रखने वाले कलाकारों की आर्थिक स्थिति सुधारने की जरूरत है। रावण के चरित्र को सिर्फ बुराई का प्रतीक मानना सही नहीं महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर बिंदेश्वर ठाकुर ने कहा कि पौराणिक कथाओं में रावण को प्रकांड विद्वान बताया गया है। उनके अनुसार, रावण जानता था कि भगवान श्रीराम के हाथों उसका अंत होने से उसे और उसके कुल को मुक्ति मिलेगी। उन्होंने कहा कि आज दूसरों को लूटने, कष्ट देने और महिलाओं पर अत्याचार करने वाले लोगों की प्रवृत्ति रावण जैसी है। बिंदेश्वर ठाकुर का मानना है कि रावण के चरित्र को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में देखने के बजाय उसके दूसरे पहलुओं को भी समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज के समाज में दूसरों पर अत्याचार करने वाले लोगों के आचरण पर सवाल उठाना जरूरी है। मंच पर सुनाए सीता हरण के संवाद बातचीत के दौरान बिंदेश्वर ठाकुर ने अपने अंदाज में सीता हरण प्रसंग का संवाद सुनाया। “सुन सीता सुंदरमुखी, चपल नैन चितचोर। एक बार अनुराग से, देख ले मेरी ओर... मंझधार में मेरी नौका है, सो पार लगा दे ऐ सीते। जिस राह में सच्ची राहत हो, वो राह दिखा दे ऐ सीते।” इसके बाद उन्होंने बाणासुर संवाद के दौरान रावण के रौद्र अट्टहास और गरजदार आवाज का प्रदर्शन किया। उनके अभिनय ने बातचीत के माहौल को रामलीला के मंच जैसा बना दिया। बिंदेश्वर ठाकुर जैसे कलाकार दशकों से अपने अभिनय के जरिए रामलीला की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि, उनके मुताबिक, इस सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने के लिए दर्शकों की भागीदारी के साथ कलाकारों की आर्थिक स्थिति पर भी ध्यान देना जरूरी है।
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