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    'चाइनीज मांझा रोकने को शासनादेश काफी नहीं':लखनऊ हाईकोर्ट ने कहा- कानून बनाएं; वरना पीड़ितों को मुआवजा देना होगा

    7 hours ago

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    इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने चाइनीज मांझे की खरीद-बिक्री और इस्तेमाल पर सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने कहा- इसे रोकने के लिए केवल शासनादेश पर्याप्त नहीं है, बल्कि कानूनी प्रावधान बनाने होंगे। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि मांझों की बिक्री और इस्तेमाल जारी रहा, तो पीड़ितों को सरकार को मुआवजा देना होगा। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति एके चौधरी की खंडपीठ ने स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव की जनहित याचिका पर यह आदेश पारित किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चाइनीज मांझा कहे जाने वाले लेड-कोटेड और नायलॉन मांझों पर पूर्ण प्रतिबंध के लिए मजबूत कानूनी ढांचा आवश्यक है। जवाबी शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया कोर्ट ने राज्य सरकार को 11 मार्च को अगली सुनवाई के लिए जवाबी शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने जोर दिया कि यदि प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो पीड़ितों को मुआवजा देने का आदेश देने पर विचार किया जाएगा। याचिकाकर्ता मोतीलाल यादव ने सुनवाई के दौरान न्यायालय को बताया कि फरवरी महीने में ही लगभग दस लोग ऐसे मांझों से घायल हुए या उनकी मृत्यु हुई है। राज्य सरकार की ओर से जवाब में कहा गया कि 9 और 10 अक्टूबर को शासनादेश जारी कर इन मांझों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया जा चुका है। पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया सरकार ने यह भी तर्क दिया कि ये सिंथेटिक मांझे हैं और इन्हें 'चाइनीज मांझा' गलत नाम दिया गया है, जिससे यह भ्रम होता है कि ये चीन से आयात होते हैं। हालांकि, न्यायालय सरकार की इन दलीलों से संतुष्ट नहीं हुआ। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल शासनादेश जारी करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है और अधिक ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। रोकथाम के लिए कानून बनाए न्यायालय ने कहा- जब भी ऐसे मांझे से गंभीर चोटें या मृत्यु की घटनाएं घटित होती हैं। वे मीडिया की सुर्खियां बनती हैं, तभी अधिकारी सक्रिय होते हैं। नया शपथ पत्र दाखिल कर ऐसे मांझे के निर्माण, विक्रय एवं उपयोग की रोकथाम के लिए कानून बनाए। विधिक प्रावधान लागू करने का प्रस्ताव पेश करें। अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करें साथ ही यह भी बताया जाए कि कानून का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को उत्तरदायी बनाने के लिए क्या ठोस कदम प्रस्तावित हैं। न्यायालय ने कहा कि उत्तरदायित्व का प्रश्न केवल उन व्यक्तियों तक सीमित न रहे जो मांझे के निर्माण, विक्रय या उपयोग में संलिप्त हैं। बल्कि उन अधिकारियों/कर्मचारियों तक भी विस्तारित हो जो अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफल रहते हैं।
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