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    चित्रकूट में 53वें राष्ट्रीय रामायण मेले का समापन:संतों ने धर्म और आचरण पर दिए संदेश, बताया रामायण का महत्व

    1 hour ago

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    चित्रकूट में आयोजित 53वें राष्ट्रीय रामायण मेले का पांचवें दिन विधिवत समापन हो गया। समापन अवसर पर षट्दर्शन अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता व कोषाध्यक्ष तथा तेलंगाना साधु समाज के सचिव, महामंडलेश्वर श्री महंत (बालयोगी) अमृतदास खाकी महाराज और संकादिक आश्रम के संकादिक महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित किया। महामंडलेश्वर अमृतदास खाकी महाराज ने मेले के समापन की घोषणा करते हुए कहा कि रामायण भगवान राम की प्राप्ति का सोपान है। उन्होंने कहा कि पिछले 53 वर्षों से यह मेला जन-जन को ‘राम बनने’ की प्रेरणा देता आ रहा है। आयोजन को और भव्य बनाने का आह्वान खाकी महाराज ने मेले के सफल आयोजन के लिए समिति के प्रयासों की सराहना की और साधु समाज से इसे और अधिक भव्य स्वरूप देने के लिए आगे आने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इस मेले की शुरुआत तरौहा से हुई थी और उनका भी संबंध उसी स्थान से है, इसलिए वे इसे नई ऊंचाइयों तक ले जाने का संकल्प रखते हैं। संकादिक महाराज ने आचरण आधारित धर्म पर जोर दिया समापन सत्र में संकादिक आश्रम के संकादिक महाराज ने कहा कि अब केवल रामकथा कहने का समय नहीं, बल्कि जीवन में वास्तविक रामलीला उतारने का समय है। उन्होंने प्रभु राम की लीला का उदाहरण देते हुए कहा कि यह ताड़का वध से शुरू होकर अधर्म और आतंक के प्रतीक रावण के अंत के बाद पूर्ण हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि हम जिन देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, उनके हाथों में शस्त्र दिखाई देते हैं, लेकिन समाज आत्मरक्षा और धर्माचरण के प्रति उदासीन होता जा रहा है। अपने संबोधन में उन्होंने समाज को धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहने का संदेश दिया। तुलसीदास की रचना से जन-जन तक पहुंची रामकथा इससे पूर्व वाराणसी के डॉ. छेदीलाल कांस्यकार ने कहा कि रामकथा को जन-जन तक पहुंचाने के लिए तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की, जिसने भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में बांधा। मानस किंकर रामप्रताप शुक्ल (बांदा) ने पांचवें दिन बताया कि गोस्वामी तुलसीदास ने संसार में दो पर्वतों- कामदगिरि और नीलगिरि का विशेष उल्लेख किया है। कामदगिरि दर्शन की महिमा बताई उन्होंने कहा कि चित्रकूट स्थित कामदगिरि के दर्शन मात्र से व्यक्ति के जीवन के दुखों का निवारण हो जाता है। नीलगिरि पर्वत का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि जब पक्षीराज गरुड़ वहां पहुंचे तो उनके मन से माया, मोह और शोक दूर हो गया और उनके भीतर रामकथा सुनने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। आध्यात्मिक संदेश के साथ संपन्न हुआ आयोजन पांच दिवसीय राष्ट्रीय रामायण मेले का समापन आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संदेशों के साथ हुआ। संतों ने रामायण को केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन में मर्यादा, साहस और धर्म के आचरण का मार्ग बताया।
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